कहानी: केंचुए की पीठ पर

अमिता प्रकाश

अमिता प्रकाश

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी), राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सोमेश्वर, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)

                         
आज हवा काफी तेज चल रही है। रात का दूसरा पहर, चाँद बादलों की ओट में बार बार छुप रहा है किसी शरारती बच्चे सा। बादल घने नहीं है, छितराए फटी दही से पूरे आसमान पर बिखरे हैं, दही से ही सफेद। चाँद उनकी ओट में पूरी तरह छिप भी नहीं पा रहा है और अपनी असफलता से झुंझलाकर कर वापस सामने आकर फिर एक बार प्रयास कर रहा है छुप जाने का। यह प्रयास चलता जा रहा है। चांदनी बिखरकर तारों को पूरी तरह ढक चुकी है, अपने श्वेत आंचल में। बाहर, उसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले खेतों की मेड़ों पर खड़े यूकेलिप्टिस के नए- नवेले पतले लंबे युवा पेड़ झुक- झुक कर हवा को सलामी कर रहे हैं। नहीं, नहीं, संभवतः चाँद की अठखेलियों से उल्लसित झूम रहे हैं, या….या….
  छोड़ो भी, इन कल्पनाओं का क्या है, यह तो घुमड़ती रहेंगी, बादलों के इन्हीं छितराए टुकड़ों की तरह, और यथार्थ के कठोर जमीन पर आने पर, इनका ये अस्तित्व बादलों की नन्ही बूंदों सा, बिखरा और गीला। उसे आँखों की कोर में गीलापन महसूस हुआ। क्या कोई बादल की नन्ही कतरन सघन होकर गिरी या फिर उसकी कल्पना की कोई बूंद बिखर गई? कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। अनिश्चितता के इस भयावह समय में जब मनुष्य खुद ही अनिश्चितताओं को ‘न्योत’ रहा हो, तब किसी बात को निश्चितता के साथ कहना और भी कठिन हो जाता है। निश्चितता- अनिश्चितता के इस झूले में पिछले कई सालों से झूलता रहा है वह। वह पूरा नहीं, उसका मन। दिमाग ने बराबर टोका है उसे। लेकिन दिल! पगलाए कुत्ते सा गोल-गोल घूम कर फिर उसी बिंदु पर पहुँच जाता है,  दुम को टांगों के नीचे दबाकर, कानों को लटकाकर। मुँह में कड़वाहट सी भर आई। बाहर कुत्ते के रोने की आवाज में, उसे लगा उसकी अपनी अदृश्य आवाज शामिल हो गई है, जिसे सिर्फ वह देख सकता है, जिसे खुद उसके कान नहीं सुन सकते। 
दो साल पहले ऐसे ही किसी चांदनी रात मेँ ‘वह’ उसके घर के इसी कोने पर बैठी उसके साथ तैयारी कर रही थी, इंटरव्यू की। उसके पास नोट्स ना के बराबर थे और वह केंचुए सा किताबों की मिट्टी को खोद खोदकर भुरभुरी बना रहा था। 
“हुं” फिर मुँह से अनायास निकला और उसने खिड़की के कोने से पिच्च के साथ थूक की लंबी पिचकारी बहार फेंक दी। फेंकते ही उसे लगा माँ अभी फटकारेगी, “तुझे कितनी बार कहा है, ऐसे खिड़की से बाहर न थूका कर। फूलों की नाजुक पंखुड़ियाँ जल जाती हैं।“
“क्या मां तुम भी!  मैं कोई ज़हरीला नाग हूं, जो मेरी थूक से तेरे फूल जल जाते हैं,” वह कहता। कहना वह यह भी चाहता कि मैं तो सिर्फ निरीह केंचुआ हूँ पर, उसकी आवाज गले में कहीं फंस जाती। इतनी बुरी तरह कि उसके शब्द ही नहीं निकलते। और माँ भुनभुना उठतीं,  “नकारा कहीं का! अपने बाप जैसी हरकतें है तेरी भी। कोई तो अच्छी आदत होती उनकी तुझमें?”  स्वर्ग या नरकस्थ होने के बाद भी जिस व्यक्ति को उसकी पत्नी आज भी सिर्फ उल्टे कामों के लिए ही याद करती हो, उसमें कोई गुण भी रहा होगा, इस संशय के जाले को वह कई बार साफ करना चाहता पर फिर न जाने क्या सोचकर छोड़ देता, अपनी जिज्ञासा के झाड़न को जहाँ का तहां।
 माँ इस बात पर भी भुनभुनातीं, “जाने क्यों इतना घुन्ना है बाप जैसा? कभी खुलकर कुछ बोलता क्यों नहीं?”
 क्यों नहीं? यह प्रश्नवाचक चिह्न उसे भी अपनी आकृति अनुरूप हमेशा ही फन फैलाए मिलता मुँह सामने। वह लाख कोशिश करता उसके फन को कुचलने की, पर फन फैलाए नाग के सामने बैठे व्यक्ति की तरह हतप्रभ हो जाता वह हर बार।
 दो साल तक लगातार उसके बगल में बैठकर साक्षात्कार की तैयारी करती उसको जब कभी वह देखता तो देखता रह जाता। ना! ना! खूबसूरती जैसी कोई बात नहीं थी। सामान्य चेहरे मोहरे वाली वह लड़की सुंदरता में उससे कमतर ही थी। यह उसकी खुशफहमी या गलतफहमी नहीं थी। जब वह कॉलेज में था और वह उसकी जूनियर थी तब भी जब कभी उसने उसको देखा और देखता रहा तो उसके साथी टोक देते, “नहीं यार तेरे मैच की नहीं है, इससे तो लाखों गुना सुन्दर है तू, कहीं और देख ट्राई करके, लाखों बैठी हैं तेरे लिए।“
 सिर्फ मित्रों के कहने पर उसने यह बात नहीं मान ली थी। क्योंकि मित्रों की असलियत वह जानता था। वह स्वयं भी तो उन्हीं का मित्र था। उसने स्वयं भी जब कभी खुद को आईने में देखा और आईने के प्रतिबिंब के बगल में उसकी तस्वीर को लगाकर देखा तब उसे उन्नीस और खुद को बीस ही पाया था। यह बात प्रमाणित कर दी थी माँ ने। जब लड़कियाँ ढूंढ-ढूंढकर वह थक गई, इतना कि उसने सारी अपेक्षाओं को आँसुओं के गंगाजल में तिरोहित कर दिया था।  अब तो मात्र एक ही इच्छा थी कि बस किसी तरह उसके बेटे को एक लड़की मिल जाये, उसकी गृहस्थी बस जाए  और वह अपनी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाए। उसी माँ ने एक दिन जब साथ  में बैठकर पढ़ती उसे देखा तो काफी देखने पर, हर एंगल से परखने के बाद बोला था, “वैसे तो तुझसे उन्नीस ही है पर, नौकरी लग जाती है तेरे साथ इसकी भी, तो बुरी भी नहीं है। क्या हुआ यदि वह पैंतीस का हो गया है? क्या हुआ यदि अभी तक कोई उसे नहीं मिला है? है तो वह सुंदर ही। उसे उम्मीद बंधी, पर माँ के इस एक वाक्य से फिर टूट गई। 
“छोटी है उम्र में, पर उससे क्या? मैं खुद तेरे बाप से पूरे ग्यारह साल छोटी थी।“ 
“कहीं यह माँ की तरह न कोसती रहे मुझे, मरने के बाद भी,” इस विचार ने उसे हटात् काफी पीछे धकेल दिया, उस लड़की से। यह साक्षात्कार की तैयारी के शुरुआती दिनों की बात है। वैसे, सिर्फ इस एक बात ने पीछे धकेला हो, इस बात की तथ्यता पर उसे संदेह था। कहीं…. मन के किसी कोने में, कॉलेज की कई सारी धूमिल तस्वीरें कोलाज के रूप में उभर आती थीं- कैंटीन की, लाइब्रेरी की, लवर्स कॉर्नर की, फील्ड की, जहाँ वह प्रणव के साथ बैठी दिखती थी, उसे। तो क्या हुआ? फिर प्रश्नचिह्न! वह नहीं बैठता था अपने साथियों के साथ इन जगहों पर अकेले? कभी कभी आरती के साथ भी।
 आरती, नाम के साथ ही एक चेहरा चमका और फिर किसी टूटते तारे सा बिला गया दिमाग के ब्रह्मांड में। क्यों सोचे वह विगत को? इस सोच ने मजबूर किया उसे भविष्य को सोचने के लिए और वह सोचता रहा भविष्य को। सोचते-सोचते एक साल से ऊपर बीत गया।  वह साक्षात्कार जो मात्र कुछ माह में होने वाला था कभी कोरोना की वजह से, तो कभी अभ्यर्थियों द्वारा कोर्ट में डाली गई याचिकाओं की सुनवाई और निर्णय की प्रतीक्षा में च्युइंगम  की तरह खिंचता चला गया सिर्फ साक्षात्कार ही नहीं, उसकी आशा भी। इसी बीच कोरोना ने ले लिया उसके एकमात्र सहारे को। माँ को बुखार आया। बुखार से अधिक कुछ और भी हुआ होगा, लेकिन उसने बताया नहीं। और उसने, संदेह के बावजूद गले में फंसी बात को मुँह से बाहर निकाला नहीं। तपते तन पर पैरासिटामोल के छींटे पड़ते ही माँ का ताप उतर जाता। लक्षण और भी रहे होंगे, किंतु छोटे से इस कस्बे में यह बीमारी, अभी भी छुआछूत के साथ साथ विस्मय का विषय बनी हुई थी। माँ की मौत को वह लोगों की उपेक्षा का शिकार नहीं बनाना चाहता था, इसलिए न उसने टैस्ट करवाया और न अस्पताल में भर्ती। उसे यकीन था कि जिंदगी की जंग को अकेले अपने दम पर जीतने वाली माँ इस नामुराद सूक्ष्मदर्शी वायरस से हार ही नहीं सकती।
 कैसे हार जाएगी वह? इस प्रश्नचिन्ह ने पुनः उसे मात दे दी। बड़ा भाई, हर छोटे कस्बे के युवा की तरह महानगर की किसी फैक्टरी के कलपुर्जों से जूझता, फेफड़ों में धुआं भरता, रिश्तों की शुद्ध ऑक्सीजन को यूं भी भुला चुका था। पत्नी के साथ दो बच्चों यानि कुल जमा चार पेटों को भरते और तन मन की जरूरतें पूरी करते-करते, वह नो गेन, नो लॉस वाले मनोभाव से जिंदगी के हथठेले को ढो रहा है। इसलिए उसने भाई को  भी कुछ नहीं बताया और जब माँ ने अंतिम सांसें लीं तो शुगर पेशेंट माँ की दमा के खतरनाक अटैक से मृत्यु का समाचार सुना दिया।
 दमा? फिर एक प्रश्नचिन्ह फन फैलाये खड़ा था। पर इस बार वह भयभीत न होकर पूरी ताकत से बोला, “हाँ, पिछले एक साल से माँ को सांस की बीमारी हो गई थी।“ भले ही उसका दिल पराश्रव्य ध्वनि के साथ चीख रहा था, ‘दमा नहीं, ऑक्सीजन की कमी से उसका दम निकला,’ लेकिन दिमाग ने मान लिया और मनवा लिया सबको। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार टीवी चैनल्स ने अपने रंग-बिरंगे संसार में चमकती लाइट्स और बड़े-बड़े स्क्रीन्स पर तथ्यों को मनवा लिया है कि ‘सब चंगा सी’, हम विश्व गुरु हो गये हैं और सारी दुनिया बस हमारे पदचिह्नों पर चलने को बेताब हमारा मुँह ताक रही है कि कब हम अपने श्री चरणों को आगे बढ़ाएं और पदचिन्ह बनाएँ, उनके अनुकरण के लिये। यह अलग बात है कि दुनिया ताकती रह जाएगी और हम मायावी तरीके से बिना पद चिन्हों के आगे बढ़ जाएंगे। वह भी आगे बढ़ गया। तेरहवीं के बाद, पैंतालीस दिनों में वार्षिक श्राद्ध कर। आखिर गम में डूबा भी कब तक रहता? इस प्रश्नचिह्न ने पुनश्च भयभीत नहीं किया उसे और वह प्रश्नों के अनंत सागर में गोते लगाकर उत्तरों के मोती ढूंढ कर लाता और उस लड़की की लटों में गूंथ देता। उसे पता था कि मोतियों की आभा द्युतिमान कर देगी उसके मस्तिष्क को।
 उसका अनुमान सच साबित हुआ भी। दोनों चयनित हो गए थे। कॉलेज के व्याख्याता पद के लिए। पहली बार केंचुए को उसकी महीन कारीगरी के लिए इनाम मिला था, यह बात तितलियों  वाले इस जमाने में किसी आठवें अजूबे से भी अधिक अजूबी है उसने अपने को चिंगोटी काटी थी।  लेकिन वह सपने में नहीं था। उसने देखा सामने से लड़की आ रही है। खुशी से दमकते चेहरे और लापरवाह कदमों के साथ। निश्चित ही वह उसका धन्यवाद करेगी। वह जानता था। उसने रात में ही रिज़ल्ट देख लिया था और पूरी रात यह सोचने में गुजार दी थी कि सुबह जब लड़की उसे विगत दो सालों से तैयारी करवाने, अपने अमूल्य नोट्स उपलब्ध करवाने, मॉक इंटरव्यू करवाने और सबसे बढ़कर उसकी पढ़ाई डिस्टर्ब न हो, इस ख्याल में बिना आवाज उसके लिए भोजन थाल परोसने, समय-समय पर फल काटकर उसकी मेज पर रख देने, हर घंटे आधे घंटे में उसे पानी पीने की याद दिलाने, देर रात तक बैठे रहने पर कॉफी के मग पकड़ाने के लिए धन्यवाद देगी  तो वह क्या क्या कहेगा? कहेगा! नहीं, नहीं, कहेगा नहीं, पूछेगा। पूछेगा कि वह भविष्य के बारे में क्या सोचती है? भविष्य के नहीं, उसके साथ भविष्य के बारे में क्या सोचती है? दिमाग ने  टोका, ‘तो क्या वह अपने किए गए उपकार के बदले? छिः! छि! कितना ‘मीन’ शब्द है यह उपकार? उसने सिर को ऐसा झटका जैसे किसी जबरैल घोड़े ने सवार को अपनी पीठ से जमीन पर पटका हो। मदद! हाँ, यह शब्द कितना उदार है अपनी अर्थवत्ता में। मदद के बदले अगर वह अपने डिप्रेशन से उबरने के लिए मदद मांगेगा तो वह मना थोड़े ही ना करेगी। वैसे भी दो साल के दिन- रात…, रात पूरी नहीं, मात्र दो पहरों तक हर रात, साथ बिताने के बाद इतना तो जान ही गया है वह उसको। कई बार अपने लिए उसकी आँखों में उसने करुणा मिश्रित प्यार देखा है। माँ जब भी उसे कुछ लेती देती, कितने प्यार और आदर से स्वीकार करती थी वह, ठीक नई नवेली बहू की तरह! उसकी आंखों के सामने कई चित्र कोलाज की शक्ल में उभर आए, “आंटी जी! मुझे आज परांठे खाने का मन है,” वह साधिकार कहती और माँ तुरंत गरमागर्म परांठे परोस देती। “आंटी जी! आज पढ़ते पढ़ते सिर दर्द हो रहा है बहुत,” वह किताबों से नजर हटाए बिना कहती और माँ चाय लेकर हाजिर। कितना मान देती थी वह भी तो माँ को? कभी माँ के सिर में तेल की मालिश, तो कभी बालो में मेहंदी। मेहंदी जब उसके हाथों में निखरती तो माँ जानबूझकर ऊँचे स्वर में कहतीं, “जिस घर में जाएगी, भाग जग जाएंगे उस घर के।“ और वह लजा जाती। चेहरा सुर्ख, होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट और नजरें नीची। उसे लड़कियों की ये सारी अदाएँ फ़रेब लगती थीं, शुरू से ही, पर न जाने आज कल क्यों गुदगुदाने लगीं थीं यही अदाएँ। 
   “अरे, क्या हुआ जनाब? लीजिए मुँह मीठा करिये, कि मेरी बदौलत आप का चयन भी हो गया है। धन्यवाद दीजिए कि मैं अपनी सारी सुख सुविधाओं को दरकिनार कर आंटीजी को आग्रह पर आ जाती थी आपके पास, ताकि आप नल्ले लोगों की तरह लेटे ही ना रहें, और मेरे साथ थोड़ा बहुत डिस्कशन से ही सही, कुछ पल्ले पड़ जाए आपकी भी।” वह मुस्कुराता रहा। उसे पता है यह भी उसकी अदा है मजाक करने की। मुँह में लड्डू की वजह से वह धन्यवाद भी नहीं बोल पाया। “धन्यवाद, तो आप देंगे नहीं, मुझे पता है अकड़ू और घुन्ने जो ठहरे। ठीक ही कहती थीं आंटी जी चलो कोई बात नहीं! मैंने मान लिया कि आपने कहा होगा मन ही मन धन्यवाद।”
   वह अभी भी अपनी आशा के समुद्र में गोते लगाता, उम्मीदों की लहरों में कभी इधर तो कभी उधर तैर रहा था, गुरुत्व विहीन। 
  “लीजिए एक लड्डू और खाइए,” उसने एक लड्डू और मुस्कुराहट में खिंचे उसके होंठो के भीतर धकेलते हुए कहा।
 “अरे, बस! इतना क्यों? उसने कहना चाहा पर लड्डू ने प्रश्न को पीछे धकेल दिया और लड्डू से पहले प्रश्न पेट की खाई में लुढ़कता चला गया।
“मेरी और प्रणव की बात भी पक्की हो गई है। कल रिज़ल्ट के बाद उसके पिताजी का, बधाई देने के लिए फ़ोन आया था। बधाई के साथ ही उन्होंने पूछ लिया, अब तो मुझे शादी से इनकार नहीं है ना? मैं क्या करती, मैंने कह दिया ‘नहीं’। मेरी ना सुनते ही उन्होंने पिताजी को फ़ोन लगा दिया। मामला तय कर लिया है सबने मिलकर।” वह साँस लेने के लिए रुकी पलभर, “दरअसल उसके घर से तो लगातार दबाव बन ही रहा था कि शादी कर लो, लेकिन मैंने ही कहा था कि जब तक मैं इंटरव्यू नहीं दे देती तब तक वे लोग शादी की बात भी ना करें। भला हो कमीशन वालों का, उन्होंने मेरा चयन कर दिया, वरना तानों के साथ दुल्हन बनकर कौन जाता उस घर में?” वह बोले जा रही थी किसी बांध के चैनल खुलते ही जैसे पानी की धारा बह निकलती है, पूरी ताकत और प्रवाह के साथ वैसे ही शब्द उसके मुँह से निकल रहे थे, आवेग से। 
लड्डू और प्रश्न दोनों ही उसके पेट की तलहटी में लावे से खौलने लगे, बाहर आने को बेताब। लेकिन शब्दों की पानी की धार से वह लावा काला होता जा रहा था, सुलगता सा...कुछ धुआँ सा।। सघन होता, बादल बनता चारों ओर। उसने देखा बादल के छोटे छोटे खरगोश आकाश की ओर उड़ रहे हैं। धूप अठखेलियाँ कर रही है उन खरगोशों से, और यूकेलिप्टिस झुक-झुक कर सलामी ठोक रहे हैं केंचुए की पीठ पर खड़े-खड़े इतराए से।

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