असग़र वजाहत का नाटक ‘वीरगति’: एक व्यंग्यात्मक कटाक्ष

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत 


साहित्य और समाज परस्पर पूरक होते हैं, साहित्य के बिना न समाज को समझा जा सकता है और न समाज के बिना साहित्य की कल्पना की जा सकती है। लेकिन वही साहित्य प्रासंगिक और प्रामाणिक माना जाता है, जो स्वयं को समाज से और समाज को स्वयं से जोड़ता है। साहित्यकार का दायित्व अधिक होता है क्योंकि साहित्यकार का काम समाज को बेहतर बनाना होता है। मुंशी प्रेमचंद कहते हैं, “साहित्यकार का लक्ष्य महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”[1] एक साहित्यकार का जीवन व्यक्तिगत नहीं होता है, वह अपने समय, समाज और साहित्य के लिए जीवन व्यतीत करता है। समाज में दो ताक़तें समानांतर विद्यमान होती हैं। पहली, जो समाज को पीछे धकेलती हैं और दूसरी, जो समाज को आगे बढ़ाने के लिए भरसक प्रयास करती हैं। साहित्यकार का कर्तव्य है कि वह दूसरी ताकत का समर्थन करे। “जो साहित्यकार मानव नियति के संदर्भ में राष्ट्र के नव-निर्माण के प्रति अपना दायित्व अनुभव करता है, उसके लिए सबसे प्रमुख चिंता हो जाती है- सामान्य जन की मुक्ति। भारत की स्वतंत्रता तब तक सार्थक नहीं है, जब तक सामान्य जन स्वतंत्र नहीं है। सामान्य जन के स्वतंत्र होने का अर्थ यही नहीं है कि उसे भर पेट भोजन, ज़रूरत के मुताबिक कपड़ा मिल जाए। यह भी है तथा इसके अलावा और बहुत कुछ भी है। उसके मानस में जो अंध रुढियाँ हैं, कुंठाएँ हैं, अविवेक है, मुर्च्छना है, मृत परम्पराएँ आदि प्रवृतियाँ हैं, जिसके कारण यह युग-युग से दास बनता चला आया है। उनसे भी उन्हें मुक्त करना है।”[2]

          विश्व की अनेक भाषाओं में बहुत सारे साहित्य का सृजन हुआ है, जिसका विषय बनने से समाज का कोई पहलु अछूता नहीं रहा है। “साहित्य, संसार को देखने की एक संवेदित, समावेशी दृष्टि है, देश हो या व्यक्ति अथवा समाज यह हर एक के लिए ज़िंदा रहने की वकालत करता है।”[3]  भारत में भी साहित्यकारों ने साहित्य का सृजन अनेक विधाओं के रूप में किया है, जिसमें कहानी, उपन्यास, एकांकी, नाटक आदि शामिल हैं। नाटक इनमें एक ऐसी विधा रही है, जिसने समाज पर गहरा प्रभाव डाला है। स्वातंत्र्योत्तर काल में लिखे हिंदी नाटकों में समाज के यथार्थ का प्रभावी चित्रण दिखाई देता है। वर्तमान युग में समाज के सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक आदि क्षेत्रों में बदलाव बहुत तेज़ी से हुए हैं। नाटककारों ने अपने समाज के इन बदलावों का अपने नाटकों में मार्मिक चित्रण किया है। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी नाटकों में सामाजिक बदलाव और यथार्थ के चित्रण के संदर्भ में डॉ. जयदेव तनेजा ने लिखा है, “वस्तुत: नाटककार आज इस सत्यता को बड़ी ईमानदारी से स्वीकार करने लगे हैं कि सामान्य जन की दयनीय स्थिति व त्रासद नियति के लिए जिम्मेदार ताकतों के बहुरूपी चेहरों को बेनकाब करना और जनता में आत्मविश्वास व आक्रोश पैदा करके अन्याय और शोषण की शक्तियों के विरूद्ध लड़ने के लिए तैयार करना आज के सही प्रासंगिक और सार्थक नाटक का उत्तरदायित्व है। हमारा आज का नाटक और रंगमंच अपनी इस महत्त्वपूर्ण भूमिका और बुनियादी जिम्मेदारी से कतराकर आगे नहीं निकल सकता।"[4]

      असग़र वजाहत का नाट्य साहित्य डॉ. जयदेव तनेजा द्वारा व्यक्त की गई उत्तरदायित्व संबंधी भूमिका को निभाते हुए समकालीन समाज, समय, सत्ता और राजनीति के यथार्थ का मार्मिक अंकन करने वाला सशक्त साहित्य है। वजाहत जी ने अपने समकालीन नाट्य लेखन परंपरा को अपनाते हुए समाज के हर पहलू पर अपनी लेखनी चलाई है। उनके प्रारंभिक नाटकों में 'फिरंगी लौट आए', 'इन्ना की आवाज' और 'वीरगति' ऐतिहासिक तथा काल्पनिक कथानकों पर आधारित नाटक रहे हैं। इन नाटकों में भी तत्कालीन समाज की परिस्थितियों और विषमताओं का यथार्थवादी चित्रण मिलता है। वे लिखते हैं, “वीरगति लिखने के बाद मन में इच्छा जगी कि प्रतीकात्मकता, लाक्षणिकता तथा ऐतिहासिक परिवेश में न लिखकर ऐसा नाटक लिखा जाए जो यथार्थवादी हो, वर्तमान परिवेश तथा आज के पात्रों को सामने लाता हो। उस जमाने में मुझे लगा था कि हिंदी नाटक को सीधे जीवन से साक्षात्कार करना चाहिए। जबकि प्रायः नाटक घूम-फिरकर जीवन तक पहुँचे थे... मैं सीधे यथार्थवादी तथा वर्तमान जीवन और पात्रों को नाटक में लाना चाहता था।”[5]

असग़र वजाहत के नाटक ‘वीरगति’ में अभिव्यक्त समय की धड़कन, समाज की हलचल और राजनीति के प्रत्येक बदलाव को समझने के लिए उनके नाटक में निहित तथ्यों को जानना बहुत आवश्यक है।

वीरगति : संपत्ति का वर्चस्व

आज हम उस समाज में रह रहे हैं जहां अर्थ केंद्र में स्थापित होकर सभी आयामों को संचालित और नियंत्रित कर रहा है। इसलिए अगर हम आज की आधुनिक सभ्यता को वित्तीय सभ्यता कहें तो कोई बुराई नहीं है। मनुष्य के जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएँ जैसे भोजन, वस्त्र और आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएँ हैं, जिन पर आज पूंजी का आधिपत्य स्थापित हो चुका है। "जीवन में पूर्णत्व की उपलब्धि अर्थ के अभाव में हो ही नहीं सकती ।"[6] आज अर्थ इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि जहाँ मनुष्य का हर फैसला अर्थ से प्रभावित है, वहीं हमारे सारे संबंध भी अर्थ के आधार पर बनते-बिगड़ते हैं।

          अर्थ अर्थात पूंजी ने भारतीय समाज में शोषणों के नए-नए तरीके निर्मित किए हैं। जहां अर्थ के कारण जीवन में अनेक सुख-सुविधाएँ सुलभ हुई हैं, वहीं कई समस्याएँ भी पैदा हुई हैं। समाज में पूंजीवाद ने कई कुरीतियों और दोषों को जन्म दिया है, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण घटक है - वर्ग वैषम्य। इसका परिणाम यह हुआ है कि पूंजीपति और धनी होते जा रहे हैं तथा सर्वहारा निरंतर निर्धन होते जा रहे हैं । यही नहीं "पूंजी के कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाने के कारण जन सामान्य की अवस्था की उन्नति नहीं हो सकी।"[7] आज इन आर्थिक स्थितियों, विषमताओं एवं शोषणों के कारण आम जनमानस त्रस्त हो चुका है। मनुष्य पहले से ही समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था शोषण से ग्रसित था लेकिन अब इस पूंजीवादी व्यवस्था से उत्पन्न हुई आर्थिक विषमताओं और उत्पीड़नों से भी जूझ रहा है। अगर मनुष्य इस पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाता है तो सत्ता वर्ग उसकी आवाज़ को दबाकर व्यवस्था की ही पैरवी करता है। "व्यक्तियों वर्गों और समाजों में पड़े हुए भावों को द्वंद्व और संघर्ष की सीमा तक विकसित करके सामाजिक शासन करने वाली शक्ति अपना हित साधन करती है ।"[8] पूंजीपति वर्ग के प्रभाव से समाज का कोई वर्ग अछूता नहीं रह गया है। सत्ता भी आज इसी पूंजीवादी गोद में पल रही है। पूंजी की जादुई शक्ति के संबंध में सुधीश पचौरी का मत है कि "पूंजी के स्वामित्व की पागल इच्छाएँ समाज का संचालन करने लगती हैं।"[9] इन्हीं विषमताओं और परिस्थितियों को आधार बनाकर असग़र वजाहत ने ‘वीरगति’ नामक नाटक का सृजन किया है।

‘वीरगति’ नाटक विजयदान देथा की लोक आस्वादन वाली राजस्थानी कथा ‘खोजी’ पर आधारित है, जिसमें सत्ता के स्वरूप को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। नाटक की विषयवस्तु पूंजीवाद के कारण समाज में उत्पन्न विसंगतियों तथा उसकी दमनकारी नीतियों को उद्घाटित करती है। इसका केंद्रीय पात्र सुकुमार है जोकि राज्य के सबसे धनवान साहूकार का इकलौता पुत्र है। वह बहुत ही भावुक और ईमानदार स्वभाव का है। उसका मन समाज की प्रतिकूल परिस्थितियों में नहीं लगता है। उसके शब्दों में- "हैं कुछ लोग दुनिया में जिन्हें पाकर मजा आता है तो कुछ लोग खोकर खुश होते हैं। किसी के लिए जहर मौत है तो किसी के लिए जिंदगी। किसी को दौलत बेहद अजीज है तो किसी के लिए कूड़े का ढेर। किसी का खाकर पेट भरता है तो किसी का भूखे रहकर।"[10] पिता को लगता है कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए वह उसका इलाज करवाने के लिए हकीम, वैद्य, ओझा, पीर को बुलावाता है। लेकिन इलाज के बावजूद भी कोई फायदा नहीं होता। अंत में उसका विवाह कर दिया जाता ताकि परिवार की जिम्मेदारियों से उसका मन बदले और उसकी सारी पीड़ाएँ समाप्त हो जाएँ। किंतु उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है। अर्थ के अधिष्ठित माहौल में वह घुटता जाता है। सुकुमार कुछ नया करना चाहता है। इसके लिए वह चोरी करता है ताकि उस आनंद को महसूस कर सके। लेकिन जब उसे चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया जाता है तो लोग उसे चोर मानने को तैयार ही नहीं होते क्योंकि समाज की अवधारणा में चोरी केवल गरीब लोग करते हैं और जो स्वयं धनवान हो वो भला चोरी क्यों करेगा? पुत्र की चोरी छुपाने के लिए पिता वस्तुओं की दुगनी कीमत देता है। अतः चोरी करके सुकुमार सबके लिए दानी एवं कृपालु बन जाता है।

नाटक के अंतिम दृश्य में सुकुमार भरे दरबार में राजा को गालियाँ देता है, जूता मारता है और उसकी पगड़ी उतारकर फेंक देता है। किंतु उसकी ऐसी हरकतों को राजा अपने लिए हितकर मानता है तथा प्रसन्न होकर अपनी बेटी और राज्य सौंप उसे सम्मानित करता है ।

4.4.2 अर्थ/पूंजी का समाज पर प्रभाव

आज बदले समाज में भावुकता का कोई स्थान नहीं रह गया है। अब मनुष्य का मशीनीकरण और आर्थिकरण हो गया है। उसका स्वभाव अब स्वार्थी और आत्मकेंद्रित होता है। सुकुमार की वाणी में आधुनिक मानव की बेचैनी दिखाई देती है- "बंद करो, परमात्मा का वास्ता है, बंद करो। बचपन से लेकर आज तक हजारों लाखों बार मेरे कानों में यही आवाज़ पड़ती है कि आज करोड़ों किसी के पास हैं तो मेरे पास हैं। दौलत, बेपनाह, बेहिसाब दौलत, बेइंतेहा दौलत... लेकिन इस खुशनसीबी के बोझ से मेरी सांस घुटी जा रही है, मेरा दिमाग फटने लगता है, रग-रग चटकने लगती है।"[11]

आलोच्य नाटक में सुकुमार के माध्यम से तत्कालीन मनुष्य की मनोवैज्ञानिक स्थिति और दशा का विश्लेषणात्मक प्रस्तुतीकरण हुआ है। उसकी बेचैनी के द्वारा समाज के मनुष्य की स्थिति को दर्शाया है जो इस पूंजीवादी और अर्थचक्र में फँसा हुआ है। अगर एक पंक्ति में कहा जाए तो यह पूंजी के समक्ष एक आम आदमी और उसकी आदमियत की ‘वीरगति’ है।

4.4.3 पूंजीवाद पर व्यंग्यात्मक प्रहार

नाटक के पात्र सुकुमार का इलाज करने के लिए देश-विदेश से जो हकीम, वैद्य, पंडित, ओझा तथा ज्ञानी मुनि बुलाये जाते हैं, उन सब पर इसमें व्यंग्य किया गया है। वे सुकुमार का इलाज करने के स्थान पर स्वयं आपस में झगड़ा करने लगते हैं। वे सभी एक-दूसरे से उत्तम और दूसरे को निम्न सिद्ध करने लगते हैं जिसका उदाहरण है -

"हकीमों से बचो यह जान ले लेते हैं लोगों की

 दवा देते हैं पर इनको नहीं पहचान रोगों की

 न रोगी से, न रोगों से, इन्हें पैसे से मतलब है

 हकीमो से बचें यह जान ले लेते हैं लोगों की।"[12]

नाटक के तीसरे दृश्य में समाज में व्याप्त स्वयंवर प्रथा पर व्यंग्य है। नारी को वस्तु मानकर उसकी बिक्री और बिक्री के उपयुक्त चीज को मानने वाले समाज का चित्रण भी किया गया है । हम जैसे बाज़ार में देखते हैं कि दुकानदार ग्राहकों के समक्ष अपनी वस्तुओं का उनका बखान करते हैं ठीक उसी तरह बाप अपनी बेटी की खूबियों का वर्णन करता है। लड़की का पिता-

" लड़की लड़की है हमारी बहुत अच्छी लड़की

 नाचती गाती है और खाना पकाती है

 लड़की लड़की है हमारी बहुत अच्छी लड़की।"[13]

4.4.4 समाज बनाम पूंजीपति

 हमारे समाज में पूंजीपतियों को प्रतिष्ठा दी जाती है।  साहूकार का कथन इस बात को उजागर करता है- "धर्म, ज्ञान, बुद्धि, रूप क्या है जो दौलत से नहीं खरीदा जा सकता? मान, सम्मान, प्रतिष्ठा - क्या है जो दौलत से नहीं खरीदा जा सकता? प्रेम, घृणा, पाप, पुण्य क्या है जो दौलत से नहीं खरीदा जा सकता?"[14] इस नाटक में पूंजीपतियों की निरंकुशता और अहंकार का बेबाक चित्रण है ।

हमारा समाज श्रमजीवी से शनैः शनैः पूंजीवादी समाज में परिवर्तित हो गया है। सेठ साहूकारों ने अपने प्रभाव के माध्यम से समस्त राजनीति पर हावी होने का प्रयास किया है। फलतः गुनाहगार भी बेगुनाह साबित हो जाता है। साहूकार का बेटा यदि चोरी करे, पूरे गांव में तहलका मचाए तो भी वह बेगुनाह साबित होता है। यही है, सत्ताधारियों की जालसाजी। धन की पोटली उनके झूठ को सच और नामुमकिन को मुमकिन बनाती है।  साहूकार का कथन देखिए- "धन दौलत से असंभव को संभव बनाया जा सकता है।"[15] आज के समय में अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी पूंजीपति का बेटा किसी गरीब की जान ले ले तो भी उस जुर्म को पैसे की आड़ में दबा दिया जाता है।

4.4.5 अर्थ में लिप्त समाज पर कटाक्ष

नाटक में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार आज हमारे समाज में पूंजीवादी व्यवस्था ने सत्ता पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। साहूकार अपने बेटे की सेवा अच्छे से हो सके इसके लिए राज्य के महामंत्री को पैसे देकर फँसा लेता है। उसके बाद महामंत्री राजा के समक्ष सुकुमार का बखान करता है। इस तरह उजागर होता है कि जो सत्ता पूंजीवाद के आधारों पर खड़ी होती हैं वो पूँजीपतियों के द्वारा किए जा रहे अन्याय, अत्याचार और शोषणों को अनदेखा कर देती है। नाटक में राजा के रूप में उस सत्ता का चित्रण किया गया है जिसकी स्थिति किसी बंदर जैसी है। इस बंदर का मदारी पूंजीपति है। जो अपने इशारों पर बंदर रूपी सत्ता को आसानी से नचाता है।

आज हमारे समाज में यह धारणा बन गई है कि निम्न वर्ग के लोग ही चोरी करते, डाका डालते हैं। इसलिए नाटक का पात्र सुकुमार, जो साहूकार का बेटा है, जब वह चोरी करता है तो समाज के लोग मानने से इनकार कर देते हैं पर चोर का कथन स्पष्ट है, "जो राजाओं का राजा है, जो धनवानों का धनवान है, जो दानियों का दानी है, जो परोपकारियों का परोपकारी है, जिसकी हवेली में हजारों को रोजगार मिलता है, जो भूखों का पेट भरता है, जो करोड़ों का दान-धर्म करता है, वह चोरी क्यों नहीं कर सकता?"[16]

4.4.6 भ्रष्ट अर्थव्यवस्था और असफल विद्रोह

नाटक का पात्र सुकुमार समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों और विषमताओं जैसे- वर्ण-व्यवस्था, सभ्यता को बचाने, पूंजीवादी अराजकता आदि को समाप्त करने के लिए संघर्ष करता है और समाज से लड़ता है। वह समाज को पूंजीवादी व्यवस्था और भ्रष्ट नीतियों के चंगुल से छुड़ाना चाहता है लेकिन उसके सभी प्रयास निरर्थक साबित हो जाते हैं जो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि अकेला मनुष्य समाज में बदलाव नहीं ला सकता है, जब तक समाज स्वयं बदलना न चाहे।

 इस नाटक से दो बिंदु उभरते हैं पहला, समाज में जब भी क्रांति का बिगुल बजे तो उस क्रांति की बागडोर किसी अभिजात्य वर्ग के हाथ में नहीं होनी चाहिए, बल्कि आम मनुष्य के हाथ में होनी चाहिए। दूसरा, अभिजात्य वर्ग से आने वाला क्रांतिकारी अपने अव्यावहारिक विचारों के कारण, अपनी जन्मजात संस्कृति के कारण हमेशा सुकुमार की तरह असफल होगा और उसके समस्त प्रयासों का लाभ व्यवस्था को ही मिलेगा। नाटककार ने इस नाटक में यह चित्र उकेरा है कि किस प्रकार धन द्वारा राजसत्ता को खरीदा जा सकता है। पूंजीवादी व्यवस्था चाहे कितने भी जूते सत्ता को मारे लेकिन सत्ता उफ़्फ़ तक नहीं करती है। उल्टा उसको सम्मान देती है। भारतीय समाज से पूंजीवादी व्यवस्था और भ्रष्टाचार समाप्त होना असंभव-सा प्रतीत होता है।

उपरोक्त नाटक का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर यह बात सम्मुख आती है कि समाज में आम व्यक्ति की ईमानदारी का कोई मोल नहीं है। सत्ता उसकी ईमानदारी को षड्यंत्रों और अत्याचारों से बेईमानी में परिवर्तित कर देती है। यह नाटक पूंजी को ही एकमात्र शक्ति उद्घोषित करता है। जयदेव तनेजा के शब्दों में यह नाटक, "सत्ताधारी वर्ग के घाघ चरित्र और उसके षड्यंत्र के साथ-साथ आज के युग और समाज में पूंजीवादी को ही एकमात्र एवं वास्तविक शक्ति (सत्ता)  के रूप में रेखांकित करता है।"[17]



[1] प्रेमचंद- कुछ विचार, पृ-20

[2] धर्मवीर भारती- मानव मूल्य  और साहित्य, पृ-74

[3] प्रभाकर श्रोत्रिय- समय समाज साहित्य,  पृ 99

[4] -डॉ.दिनेशचंद्र वर्मा- समकालीन हिंदी नाटक एवं नाटककार, पृ.46

[5] असगर वजाहत- आठ नाटक(कर्म की सार्थकता), पृ. 3

[6] नरेंद्र मोहन- भारतीय संस्कृति, पृ-142

[7] सुभाष कुमार- आधुनिक हिन्दी कविता, पृ-5

[8] त्रिलोचन- काव्य और अर्थबोध , पृ-58 

[9] सुधीर पचौरी- आलोचना से आगे (उत्तर आधुनिकतावादी और उत्तर संरचनवादी विमर्श), पृ-59

[10] असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ-109

[11] असगर वजाहत- आठ  नाटक- असगर वजाहत, पृ-109

[12] असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ- 110

[13] असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ -115

[14] असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ– 134

[15] असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ -135

[16] असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ-129

[17] जयदेव तनेजा- हिन्दी के आठ  मौलिक नाटक, नटरंग, पृ-51, अंक-49,1995

 

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