समीक्षा: पीली मंद उदास साँझ

समीक्षक: अतुल्य खरे


पीली मंद उदास साँझ (लघुकथा संग्रह)
लेखक: अरविन्द कुमारसंभव 
प्रकाशक: सबलपुर प्रकाशन जयपुर 
मूल्य: ₹ 150.00 
प्रथम संस्करण: 2023 

 ख्यातिलब्ध साहित्यकार अरविन्द कुमारसंभव जी हिन्दी साहित्य जगत में, सुपरिचित नाम है, साहित्य जगत का, अथवा साहित्य से किसी भी प्रकार से सरोकार रखने वाला कोई विरला ही होगा जो उनके नाम से परिचित न हो। साहित्य जगत में उनके उल्लेखनीय योगदान हेतु साहित्य जगत के पुरोधाओं के बीच एवं साहित्य से सम्बद्ध नामचीन मंचों द्वारा भी उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है, एवं वे स्वयम ही विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए रहकर निरंतर साहित्य जगत को अपना अमूल्य योगदान प्रदान कर रहे हैं।

 वे किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं, कह सकते हैं कि उनका काम ही उनकी पहचान हो गया है। वे  “शब्द घोष” (त्रैमासिक पत्रिका ) के मुख्य संपादक हैं, वहीं विभिन्न साहित्यिक संस्थाएँ यथा जयपुर साहित्य संगीति भी उनके नेतृत्व में उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं। वे हर संभव तरीके द्वारा साहित्य से जुड़े रहकर निरंतर अपना बहुमूल्य योगदान साहित्य जगत को प्रदान कर रहे हैं।
 हाल ही में उनके द्वारा रचित पुस्तक “पीली मंद उदास साँझ ” पढ़ने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ, यह पुस्तिका 21 लघुकथाओं का संग्रह है एवं अरविन्द जी के ही शब्दों में बहुरंगी तृष्णा, वितृष्णा आभास,तपन,तड़प, स्वप्न, विषाद, खुशी को समेटती सहेजती कथाओं का छोटा सा संग्रह है । कह सकते हैं कि जीवन के अमूमन सभी रंगों को उन्होंने अपनी इन लघुकथाओं में समाविष्ट कर लिया है।
 इस संग्रह में अरविन्द जी का एहसासों को शब्द रूप में ढाल देने का हुनर, बड़ी से बड़ी बात को लघुकथा में कह जाने की कला, कथा की विषयवस्तु के प्रति गंभीर एवं गहन सोच, विषय का गंभीर विचारण, एवं सामाजिक विषमताओं पर तीखे प्रहार स्पष्ट दृष्टिगोचर हुये है।
 वाक्य विन्यास आसान व सुगम है वहीं शब्द संयोजन अत्यंत सरल है तथा कथानक को किसी विशिष्ट रूप में ढालने हेतु किसी भी तरह का अतिरिक्त प्रयास लक्षित नहीं है।
आज पद्य रूप में लिखी जा रही कविता ने लघु कथा को एक वृहद स्तर तक सीमित कर दिया है, संभवतः यही कारण भी है कि लघुकथा वर्तमान में प्रचलन में कुछ कम ही देखने में आती है किन्तु आज भी कई श्रेष्ठ साहित्यकारों द्वारा अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति हेतु इस विधा को माध्यम बनाया जाता है।
 स्वयम में ही एक अनूठी विधा है लघुकथा, एवं जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, एक ऐसी कथा जो संक्षिप्त हो, बिना किसी भूमिका के प्रारंभ हो व जिसमें कम से कम शब्दों में भाव एवं विचार स्पष्ट कर दिए गए हों एवं जिसमें पात्रों की संख्या भी सीमित हो तो उसे लघुकथा की श्रेणी में रखा जा सकता है।
 चूंकि लघुकथा को बहुत अधिक विस्तारित नहीं किया जाता अतः उसकी प्रस्तुति कुछ इस तरह से दी जाती है कि वह प्रारंभ में ही पाठक को बांधने में सक्षम हो तथा अंत भी ऐसा जो पाठक को कुछ विचारण के संग छोड़ दे अथवा विचारण हेतु विवश कर दे, हालांकि इस हेतु कोई विशेष शैली तो निर्धारित नहीं है किन्तु फिर भी देखा जाता है कि लघुकथा का अंत अमूमन हतप्रभ करने वाला चकित कर देने वाला, चौंकाने वाला होता है फिर वह सुखांत हो अथवा दुखांत एवं कथा में उल्लिखित किसी कारण विशेष का निष्कर्ष युक्त होना अथवा न होना भी अनिवार्य नहीं है।
 उपरोक्त समस्त कसौटियों पर अरविन्द जी की लघुकथाएँ खरी उतरती हैं। उनकी अमूमन हर कथा मानवीय मूल्यों व इंसानियत के ज़ज़्बे को दर्शाती है। अरविन्द जी की कहानियाँ पारिवारिक संबंधों के बीच पसरते हुए तनाव, मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा एवं हृदय की कोमल भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति है।
 लगभग एक ही प्रकार की गूढ़ भावना में अंतर्निहित कहानी है “साझी साँझ” एवं “बेटा बहू”,जहाँ बुजुर्ग अवस्था के मातापिता के एकाकीपन एवं भावनात्मक टूटन को दर्शाया गया है तथा अत्यंत अल्प शब्दों में बहुत गंभीर संदेश देने में सफल हुए हैं।
 “नीम का पेड़” भी मन के खालीपन को दर्शाती है जो कि बड़े शहरों की आपाधापी से परिपूर्ण ज़िंदगी व व्यस्तता के बावजूद भीतर कहीं अकेला ही है और बुजुर्ग अवस्था की मुश्किलात कैसे विकराल हो जाती हैं जब बेटा जिसके लिए माँ बाप ने अपना सर्वस्व होम किया वही उनको दो पल का समय न दे, उनका यही दर्द दर्शाती है “कैसी विवशता”।
 विधा के अंतर्गत बेशक उनकी रचनाओं को लघुकथा कह दिया जाए लेकिन वास्तविकता तो यही है कि ये सभी कथाएँ उनके तजुर्बे एवं सूक्ष्म अवलोकन से उपजे कुछ ऐसे पल होते है जिन्हें वे शब्दों में पिरो कर प्रस्तुत कर देते है। बेहद मामूली सी बातों पर भी अरविन्द जी की पैनी दृष्टि एवं लेखकीय सोच पहुँच जाती है। उनकी प्रस्तुति कहीं भी चौंकाती नहीं है अपितु सहज ही कथानक में पाठक को समाविष्ट कर लेती है।
 लघु कथाओं को पढ़ कर प्रतीत होता है कि वे कहानी के लिए किसी विषय विशेष का इंतज़ार नहीं करते, वे किसी भी अनुभव को या छोटी सी बात को भी कहानी में बदलने का हुनर रखते हैं एवं पात्र तथा स्थान के लिए उपयुक्त भाव एवं भाषा का प्रयोग सहजता एवं खूबसूरती से करते हैं जैसा कि उन्होंने कहानी “क्यों नहीं आया आज” में किया है। तो आगंतुक कैसे खुशियों की सौगात दे जाते हैं जब दिल से दिल जुड़े हुए हो साथ ही रिश्तों की सुंदरता एवं जटिलता को सहज ही बयान करती है “भाई दूज”।
 उनके कथानक लघुकथाओं हेतु पूर्णतः उपयुक्त हैं। ये लघुकथाएँ बेहद सीमित शब्द सीमा लिए हुए हैं, व कथानक विषय पर सटीक वार करता है एवं सभी कहानियाँ मानवीय संवेदनाओं के ताने-बाने में बुनी गई है, मर्मस्पर्शी कहानियाँ है।
 बहुत ही सरल व काम शब्दों में पहाड़ों के वाशिंदों के जीवन की कठिनाइयाँ और बेरोजगारी व गरीबी जैसे मुद्दे दर्शाती है कहानी “पहाड़”। कहानी “कटी पतंग” इस कथा संग्रह की श्रेष्ट रचनाओं के बीच सर्वश्रेष्ट का दर्ज़ा पाती है। एक महिला की कटी हुई पतंग से इतने काम शब्दों में इतनी सुंदर तुलना, निश्चय ही अरविन्द जी की कलम का कमाल ही है। कितने भाव समेटे हुए हैं ये चार शब्द कि “लड़की तू ज्यादा हवा में मत उड़।” कुछ ऐसे ही भाव दर्शाती व जीवन का सूनापन एवं घर और मकान का अंतर बतलाती है।
 “खाली हाथ”, जिसमें दाम्पत्य जीवन में पैर पसारती कड़वाहटों व बढ़ती दूरियों को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। पुस्तक की अन्य सुंदर रचनाएँ जो कहीं भीतर तक सोचने पर मजबूर करती हुई विचारों के भंवर में छोड़ जाती है व पाठक कथानक को चलचित्र की अनुभूति कराती हैं “अगरबत्ती” एवं “सब्जी का ठेला” जहाँ भाव की समानता है किन्तु संदेश भिन्न एवं अत्यंत प्रभावी।
 संग्रह की शीर्षक कहानी “पीली मंद उदास साँझ” मन के खालीपन को बहुत गंभीरता से अवलोकित करती एवं प्रकृति के रंगों के बीच खुद की तलाश करती हुई ज़िंदगी की कहानी है जो अक्सर एक आम इंसान अपने जीवन में किसी न किसी मोड़ पर अनुभव करता ही है।
“गागर में सागर”, मुहावरे को, मुहावरे से जुदा वास्तविक रूप में देखा इस लघुकथाओं के संग्रह में, एवं यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हर लघुकथा ने बगैर बहुत ज्यादा कुछ कहे अल्प शब्दों में ही गंभीर संदेश दिए एवं अमूमन प्रत्येक कथा कुछ सोचने को विवश करती हुई विचारों के अथाह झंझावात में ले जाती है।
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अतुल्य खरे
उज्जैन
 

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