गीतों के राजकुमार एवं आवाज़ के जादूगर कविद्वय को विनम्र श्रद्धांजलि

शशि पाधा
मेरिका के पूर्वी तट पर स्थित तीन राज्यों की त्रिवेणी को आम बोलचाल की भाषा में डी एम वी (DC, Maryland, Virginia) के नाम से जाना जाता है। इस त्रिवेणी की यह परम्परा रही है कि यहाँ की काव्य गोष्ठियों में, कवि सम्मेलनों में तीनों राज्यों के कविगण बड़े उत्साह के साथ भागीदारी करते हैं। ऐसी गोष्ठियों में राकेश जी और गुलशन जी की रचनाओं को श्रोता बहुत प्रेम से सुनते रहे हैं। किन्तु नियति की विडंबना देखिये कि 11 फ़रवरी, 2024 के दिन साहित्य जगत के आकाश में दमकते हुए ये दोनों सितारे एक साथ, एक ही दिन तिरोहित हो गये। यह दुखद सूचना पाते ही हम सब मित्र अचम्भित हो गये। क्या ऐसा भी हो सकता है? लेकिन, ऐसा हुआ और हम सब विधि के विधान के आगे नतमस्तक हो कर खड़े रहे।

राकेश खंडेलवाल जी से मेरा परिचय वर्ष 2007 में न्यू यॉर्क में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में हुआ था। वहाँ एक शाम एक अनौपचारिक गोष्ठी में उनकी रचनायें सुन कर मैं अभिभूत हो गयी थी। अमेरिका में मुझे पन्त, निराला, महादेवी जैसे रचनाकारों जैसे ही सुन्दर, कोमल भावों से ओतप्रोत रचनों को सुनने/ पढने का सौभाग्य मिलेगा, ऐसा मैंने कभी सोचा नहीं था। मैं कुछ वर्ष पहले ही भारत से आई थी और राकेश जी से मिलकर उनकी रचनाओं को सुनकर मैं अभिभूत हो गयी थी।

माँ सरस्वती का तो उन पर वरदहस्त रहा ही है, लेकिन उनके गीतों को पढ़ते हुए इस बात का आश्चर्य होता था कि या तो उनके पास बिम्ब, उपमान, अलंकार, सुर, लय, ताल की अनमोल निधि थी या शब्द उनकी लेखनी के अन्तरंग सखा थे। प्रत्येक सोमवार को वह अपने ब्लॉग गीत कलश पर एक नया गीत साझा करते थे| हम सब को उनके गीतों की प्रतीक्षा रहती थी।

मैं जब भी कभी गीत लिखते-लिखते शब्दशून्य हो जाती थी तो उनके गीतों को पढने बैठ जाती थी। एक बार मैंने उन्हें फोन कर के कहा कि मेरी माँ की ओढ़नी का रंग मुझे आपकी कविता में मिल गया। उनकी कविता में एक शब्द था ’संदली’। मेरी माँ की ओढ़नी का भी वही रंग होता था। मेरी बात सुन कर वह इतने खुश हुए कि उन्होंने मेरी कविता की केवल चंद पंक्तियों से मेरे मनोभावों को पहचान कर एक पूरा भावपूर्ण गीत लिख कर भेज दिया। आशुकवि होने के नाते वह कविता में उत्तर-प्रत्युत्तर देकर सब को चमत्कृत कर जाते थे। उनके पास कल्पना के साथ-साथ शब्दों का भी अपार भंडार था और हर रचना नए बिम्बों से सजी होती थी। उनके चले जाने पर मेरे मन में यह विचार आया कि ऐसी कालजयी रचनाओं के रचनाकार संसार से चाहे चले जायें लेकिन,अपने पीछे अपनी रचनाओं की एक अमूल्य धरोहर छोड़ जाते हैं।

जैसे एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बना कर ही धनुर्विद्या सीख ली थी, ठीक वैसे ही राकेश जी के गीतों को पढ़ कर आने वाली पीढी गीत विधा की सारी बारीकियाँ सीख लेगी, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।
उनके रचे कालजयी गीतों की कुछ लड़ियाँ आपके साथ साझा कर रही हूँ —

“पता नहीं तूलिका रंग कल भरे न भरे किसी शब्द में
इसीलिए मैं आज साँझ में अंतिम रंग भरे जाता हूँ
जब किशोर से यौवन की सीढ़ी पर पाँव रखा था मैंने
तब ही से छंदों ने बाजों में भर कर मुझको दुलराया
विद्यापति जायसी मीरा तुलसी सूरा की कृतियों को
आत्मसात् कर कर के माने खुले। स्वरों में था दोहराया
कल क्या पता कंठ के स्वर भी मुखरित हों या न हो पाएँ
यही सोच कर आज उन्हें फिर एक बार दुहरा जाता हूँ

किसे पता परतों की तह यह खुले न खुले कल की सुबह
इसीलिए मैं परत आज बस एक और खोले जाता हूँ “

कल्पना और भावों को शब्दों की तूलिका से चित्रित करती हुई उनकी एक अद्भुत रचना के रंग —-
 ·
“पाँखुरी पर ओस ने जब से लिखा है नाम तेरा
रंग आ खुद ही संवरते बादलों की कूचियों पर
धुप ने अंगड़ाई लेकर नींद से जब आँख खोली
और देखा झील वाले आईने में बिम्ब अपना
तब छिटकते पाँखुरों से रंग जो देखे धनक के
सोच में थी जाग है या भोर का है शेष सपना
नाम की परछाइयाँ जो गिर रही शाखाओं पर जा
मेंह​दि​यों के रंग उससे भर गए है बूटियों पर

बादलों की कूचियों पर से फिसल कर चंद बूँदें
चल पड़ी थी दूब के कालीन पर करने कशीदा
रास्ते में एक तितली के परो पर रुक बताती
वे उसे श्रृंगार कर सजने सजाने का सलीका
नाम ने तेरे रंगी है प्रकृति कुछ इस तरह से
सिर्फ तेरा नाम मिलता, मौसमों की सूचियों पर”

मेरा पूर्ण विश्वास है कि राकेश जी की रचनाओं के इन्द्रधनुष युगों- युगों तक साहित्य के आकाश में रंग भरते रहेंगे—

सौम्य एवं सुशील व्यक्तित्व के स्वामी गुलशन मधुर जी की लेखनी का आसमान बहुत विस्तृत था। गुलशन जी साहित्य की बहुत सी विधाओं में पारंगत थे। चाहे प्राकृतिक सौन्दर्य हो, मानव मन की उहापोह हो, या राजनैतिक-सामाजिक उथल-पुथल हो, एक जिम्मेवार रचनाकार होने के नाते वह हर विषय पर अपनी कविता के माध्यम से अपने विचार साझा करते थे। बहुत सी भाषाओँ के कवियों की चुनिन्दा रचनाओं का अनुवाद करके, साथ में खूबसूरत चित्र या रंगों के साथ वह फेसबुक पर अपने मित्रों के साथ साझा करते थे| बस ऐसे ही एक दूसरे की पोस्ट पर टिप्प्न्नी करते हुए हम कभी-कभी किसी विशेष टॉपिक पर फोन पर बात कर लेते थे। वह रेडियो कर्मी थे, उनकी मधुर आवाज़ उनके इस गुण की साक्षी थी। उन्होंने कई वर्ष ऑल इण्डिया रेडियो और फिर वायस ऑफ़ अमेरिका के माध्यम से अपनी जादूई आवाज़ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया था। मैंने कभी पूछा ही नहीं कि मधुर उनका उपनाम था या मीठी आवाज़ के कारण उनके नाम के साथ जुड़ गया था। मैं भी कभी रडियो कलाकार थी, यह जान कर वह बहुत खुश हुए थे। हमने उस समय के प्रसिद्ध रडियो कलाकरों के विषय पर बहुत देर तक बात की थी जिनसे हम दोनों ही परिचित थे। उन्होंने कई रेडियो नाटकों में काम किया था। प्रेमचन्द की कहनियों को भी उन्होंने अपना स्वर दिया था। मैंने शायद 20 या 25 दिन पहले उनसे बात की थी। मैं उनसे ‘हिन्दी चेतना’ पत्रिका के लिए रचनाएँ माँग रही थी। उत्तर में यही कहा, “थोड़ा व्यस्त हूँ, घर बदल रहा हूँ। ठीक होते ही भेज दूँगा”। दुःख तो इस बात है कि उन्होंने दुनिया ही बदल दी। कुछ रचनाएँ जो उन्होंने भेजीं, उनमें से दो रचनाएँ आप के साथ साझा कर रही हूँ –


गण्यमान्य
******
गिनती जारी थी
मैं भी गिना गया
कुछ हैरान, कुछ परेशान मैंने कहा -
मुझे वहाँ मत गिनो
वहाँ तो कोई एक ख़ाका सा है
जो शायद मेरे होने का भरम देता हो
वे मुस्कुराए, बोले - गिनती तो हो चुकी
और वैसे भी
ख़ाके में रंग भरने में हमें महारत हासिल है
आप देखेंगे तो विश्वास नहीं कर पाएंगे
मैंने देखा,
मैं विश्वास नहीं कर पाया
लेकिन यह बात महत्वपूर्ण नहीं थी
अहम यह था कि मैं गिन लिया गया था
उनकी भेद-भरी मुस्कुराहट कह रही थी -
वर्ना आप हैं किस गिनती में!
बहरहाल,
मैं गिन लिया गया था
वहाँ, जहाँ मैं नहीं था।

गुलशन जी छंद के घेरे में बंध कर नहीं लिखते थे। उनकी रचनाओं में भावपक्ष तो प्रधान रहता ही था, शब्दों के साथ खेलने की कला भी थी। उनकी रचनाएँ बिना किसी बाधा-बंधन के कल्पना के पंख बाँध निर्बाध आकाश में उड़ना चाहती थी।उनकी यह रचना इस बात की साक्षी है —--


गीत हूँ  उन्मुक्त
***************
एक कोहरा गिर्द है मेरे कि मैं जिस सा नहीं हूँ
धुंध में हूँ मैं, मगर इस धुंध का हिस्सा नहीं हूँ
उम्र है  जिसकी इरादों की  जवानी में
इक लहर  उच्छल समंदर की रवानी में
अमिट अक्षर सा विपर्यय की इबारत का
निरंतर  बदलाव  की  जारी  कहानी में
हूँ नए अध्याय में, बीता हुआ क़िस्सा नहीं हूँ
ज़िंदगी क्या? अनुभवों की आंच में तपना
टूटना हर इक मिथक के भरम का सपना
समय से  सीखे हुए अनगिनत पाठों में
एक अर्जित सत्य  होता है स्वयं अपना
व्यर्थ है तुलना कि मैं उस सा नहीं, इस सा नहीं हूँ
बीतते  हैं  बरस  ख़ुद  को आज़माने में
दर्द से  वाबस्तगी में गुनगुनाने में
हाँ, रुके  भी हैं  कई  सैलाब आंखों में
भीगते  हैं  कोर  भी  अक्सर  अजाने में
बादलों में थम गई सी बांझ बारिश सा नहीं हूँ
है नहीं यह सैर बस कुछ एक पल-छिन की
एक बहती यात्रा  है  रात की,  दिन की
चल पड़े गंतव्य के पथ पर क़दम जब तो
फिर न रुकना या पलटना शर्त है जिनकी
रास्ते से लौटती नाकाम कोशिश सा  नहीं हूँ
शब्द के धुन से  नवेले  प्रथम परिचय में
अक्षरों के जोड़ खिल उठते हैं आशय में
राग में  डूबा  हुआ  यह  गीत-स्नेही  मन
खोजता है  ज़िंदगी के अर्थ  सुर-लय में
गीत हूँ उन्मुक्त, तुक की महज़ बंदिश सा नहीं हूँ।
 --------- गुलशन मधुर

25 फरवरी, 2024 के दिन अमेरिका में उनके मित्रों द्वारा ज़ूम पर एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गयी जिसमें भारत, अमेरिका, यू के, केनेडा में रह रहे उनके मित्रों ने अपने प्रिय रचनाकारों के प्रति अपने उद्गार प्रस्तुत किये और उनके साथ बिताये मधुर पलों को याद किया।

गीत सम्राट राकेश जी और आवाज़ के जादूगर गुलशन जी का हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में किया गया योगदान और समर्पण हम सब के लिए एक उदाहरण है। इस नश्वर संसार से इनका जाना पूरे हिंदी जगत और विशेष रूप से अमेरिका के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

अप्रतिम प्रतिभा के धनी कविद्वय को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि और उनकी स्मृतियों नमन…

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।