कुलधरा के भूत

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

“तो बर्खुरदार, कैसा रहा आपका राजस्थान दौरा? कहाँ-कहाँ घूमे आप लोग।“ कामता प्रसाद जी ने अजय से पूछा।
हमेशा की तरह आज भी कामता प्रसाद जी कॉफी हाउस में अपनी निर्धारित मेज़ पर बैठे कॉफी का लुत्फ ले रहे थे। सामने बैठा था अजय। अजय के दादा की उम्र के होने के बावजूद कामता प्रसाद जी उसके दोस्त थे। जैसे जिंदा रहने के लिए साँस लेना जरूरी होता है कामता प्रसाद जी के लिए हर दिन नियमित इसी मेज़ पर कॉफी पीना और अपने इर्द-गिर्द मौजूद लोगों को अपने तजुरबे सुनाना भी जरूरी था। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए महानगर आया अजय कामता प्रसाद जी से लखनऊ के तौर-तरीके सीखते-सीखते कब कामता प्रसाद जी की अंतरंग समिति का सदस्य बन गया पता ही नहीं चला। उनकी अंतरंग समिति सिमट कर अब सिर्फ अजय तक रह गई थी। अन्य सदस्य कन्नी काट गए थे।
“अंकल, पूरा राजस्थान देख लिया हमने। कुछ नहीं छोड़ा। अभूतपूर्व है देश हमारा। हरा-भरा मेवाड़ साथ में सूखा मारवाड़ और बाजू में रेतीला जैसलमेर।“ अजय बोला। “अच्छा, आपको याद है अंकल एक बार आपने मुझे कुलधरा के बारे में बताया था?”
यूँ तो वह दुनिया के हर विषय पर बोल सकते थे लेकिन भूत-प्रेत, जिन्न वगैरह का नाम आते ही उनकी आँखों की चमक सामने वाले को कामता प्रसाद जी के अटूट विश्वास का यकीन दिलाने के लिए काफी थी। एक अरसा पहले उन्होंने अजय को जैसलमेर के नजदीक एक गाँव कुलधरा के बारे में बताया था। गाँव के मुखिया की बेटी बेहद खूबसूरत थी। उसकी सुन्दरता की चर्चा जब जैसलमेर राज्य के क्रूर, अत्याचारी और व्यभिचारी सावंत जालिम सिंह तक पहुँची तो उसने मुखिया को तलब करके हुक्म दिया कि एक महीने के अन्दर वह अपनी बेटी की शादी जालिम सिंह से कर दे। यह भी कि ऐसा ना करने पर वह जबरन लड़की को ले जाएगा और मुखिया के पूरे परिवार को मौत के घाट उतार देगा। अपनी बेटी को जालिम सिंह जैसे व्यभिचारी को कैसे सौंप सकता है एक बाप? पर क्रूर जालिम सिंह का मुकाबला करना नामुमकिन था। भयभीत मुखिया ने वापस आकर सारे गाँव की पंचायत बुलाई। पंचायत ने तय किया कि इज्जत बचाने के लिए गाँव छोड़ कर कहीं चले जाना चाहिए। बस, गाँव वासी योजना बना कर रातों-रात किसी अज्ञात स्थान पर चले गए। जाते-जाते श्राप दे गए कि कुलधरा कभी आबाद नहीं हो पाएगा।
इस घटना को दो सौ से अधिक वर्ष हो चुके हैं लेकिन गाँव आज भी उजाड़ पड़ा है। कहते हैं कि वहाँ अब सिर्फ भूत रहते हैं। रात में हँसने, रोने, चीत्कार, अट्टहास जैसी आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं।
काफी तादाद में पर्यटक जाते हैं कुलधरा देखने लेकिन किसी को रात में रुकने की इजाजत नहीं मिलती।
“हाँ, खूब याद है बर्खुरदार।”
“मैंने अपने दोस्तों को बताया तो बहस छिड़ गई। कमल का कहना था कि भूत-वूत कुछ नहीं होता। सिर्फ वहम है। हमने कहा, ‘कहना आसान है। हिम्मत है एक रात कुलधरा में बिताने की?’
‘हाँ, हाँ। क्यों नहीं?’ कमल तैश में बोला।
“फिर?” कामता प्रसाद जी ने उत्सुकता से पूछा।
“फिर हम लोगों ने राजस्थान का प्रोग्राम बनाया और निकल पड़े। कुलधरा हमारा आखिरी पड़ाव था।
* * * * *
टिकट और सूरज डूबने से पहले वापस आ जाने की सख्त हिदायत के साथ पाँचों दोस्त गाँव में दाखिल हुए।
सूर्य की तेज किरणों में नहाते छत-रहित खंडहरों में भूतों की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। लग तो सब को रहा था कि यहाँ भूतों का होना सिर्फ एक किंवदंती है लेकिन कमल को अपने दोस्तों का मज़ाक उड़ाने का मौका मिल गया था।
कुलधरा में कुछ खंडहरों के अलावा कुछ ना था। लिहाजा थोड़ी देर में पाँचों दोस्त ऊब कर निकल लिए वहाँ से।
शर्त के मुताबिक, सूर्यास्त के बाद कमल पीछे के रास्ते चुप-चाप गाँव में दाखिल हुआ और एक खंडहर में छुप गया। उसके चारों दोस्त गाँव से कुछ दूर कार में सोने की कोशिश करने लगे।                             
रात के अँधेरे में कैम्प-चेयर में बैठा कमल ऊँघ रहा था। गर्मी का मौसम था पर रेगिस्तान की रातें गर्मियों में भी सर्द हो जाती हैं। ठंड के मारे शरीर अकड़ रहा था। कोई हिस्सा ऐसा नहीं था जहाँ दर्द ना हो रहा हो। होटल का आरामदेह बिस्तर याद आ रहा था। क्यों ना दोस्तों से कहूँ कि बहुत हुआ यार, चलो होटल में चल कर आराम से सोया जाए। पर दोस्तों को मज़ाक उड़ाने का मौका मिल जाएगा।
इस उधेड़बुन में पड़ा कमल अचानक चौकन्ना हो गया। आस-पास कुछ गतिविधि हो रही थी। उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई पर अँधेरे में कुछ नजर नहीं आया। पर ऐसा लग रहा था कि कुछ लोग दबी जबान में बात करते हुए सामान उठा रहे हैं। सामान? इन बियाबान खंडहरों में? जहाँ दो सौ साल से कोई रह ही नहीं रहा! कुछ देर में, कमल को डर का अहसास हो इससे पहले, सब शान्त हो गया और पहले जैसा सन्नाटा छा गया।
‘भूत!’, कमल के मन में कौंधा। ‘नहीं, भूत नहीं होते। या होते हैं? नहीं, नहीं। यह वहम है। अजय की भूतों वाली कहानियों का प्रभाव  होगा मेरे अन्तर्मन पर। ओह! यह क्या घोड़ों की टाप सुनाई पड़ रही है? घोड़े? इतनी रात को, वह भी इक्कीसवीं सदी में? कहीं डाकू तो नहीं हैं? इन खंडहरों में क्या मिलेगा उन्हें?’ डर के बावजूद, क्षण भर के लिए कमल को हँसी आई। ‘माल का बंटवारा करने या रात बिताने भी तो आ सकते हैं। पर नहीं। सिर्फ दो सौ गज की दूरी पर पुलिस वाले हैं।‘
कमल के नजदीक एक घोड़ा हिनहिनाया।
लकवा मार गया कमल के दिमाग़ को। अँधेरे में उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन उस पर 10% हैरानी और 90% दहशत साफ लिखी थी।
रौबीली आवाज़ में एक आदेश जैसा गूँजा, म्यान से तलवारें निकलने की आवाज़ें आने लगीं। गाँव घेर लिया गया था। कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आवाज़ घिघियाते हुए दया की भीख माँग रही थी। क्षण भर में एक दर्दनाक चीत्कार, भयानक अट्टहास और फिर सन्नाटा। कमल की चीख दहशत के मारे सिसकी में बदल गई। ना जाने कहाँ से इतना दम आ गया कि बिजली की रफ्तार से कमल पुलिस चौकी की तरफ भागा। पुलिस वाले कमल से भी ज्यादा रफ्तार से चौकी छोड़ गाँव से दूर भाग रहे थे। कमल ने भी उनके पीछे भागना चाहा लेकिन रास्ते में चार साये प्रगट हुए और उसे आगोश में ले लिया।
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अजय चुप हो गया। नहीं बताया उसने कामता प्रसाद जी को कि उस रात कमल ने जो अनुभव किया वह भूतों की नहीं बल्कि उसके अपने दोस्तों के साथ रिकार्ड की हुई आवाज़ें थीं जो उन्होंने पहले ही गाँव में छुपा दी थीं। कामता प्रसाद जी के विश्वास को ठेस पहुँचाना उसकी मंशा नहीं थी। 

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