नाटक, जो एक सामूहिक कला है -असग़र वजाहत

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत 

सैयद दाऊद रिज़वी: समय, सत्ता और राजनीति जैसे तत्व एक साहित्यकार को कैसे और कितना प्रभावित करते हैं? इस पर प्रकाश डालिए।
असग़र वजाहत: देखिए यही वो तत्व हैं जो साहित्यकार को प्रभावित करते हैं तभी साहित्यकार लिखता है। अगर ये तत्व न हों तो साहित्यकार को प्रभावित करने वाली और कौन सी ऐसी शक्ति बचेगी। विशेष रूप से समाज के संदर्भ में जो लेखक लिखते हैं उनके लिए ये आवश्यक है कि वे अपने समाज और काल के परिप्रेक्ष्य में ही लेखन कार्य करें तभी उनका लेखन सफल होता है। इसलिए आपने जो तत्व गिनवाए हैं, ये तीनों बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये मेरे भी साहित्य में हैं और किसी भी अन्य रचनाकार के साहित्य में भी होने चाहिए।

असग़र वजाहत
सैयद दाऊद रिज़वी: असग़र वजाहत नाटकों को लिखते समय देश की राजनैतिक स्थितियों को कितना महत्व देते हैं?
असग़र वजाहत: देखिए ऐसा है कि आप सवाल कर रहे हैं कला और विचारधारा का। तो इस संबंध में मैं आपको बहुत प्रसिद्ध फिल्म मेकर रहे हैं ऋत्विक घटक, उनका एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक बार उनसे यह सवाल पूछा गया था, जहाँ मैं भी मौजूद था कि कला और विचारधारा में क्या संबंध है तो उन्होंने कहा था कि वही संबंध है जो दाल और नमक में है। मतलब विचारधारा जो है वो नमक के जैसी होती है। मतलब दाल में नमक कम तो खा नहीं सकते हैं और अधिक हो तो भी नहीं खा सकते हैं। तो इसलिए राजनीति और विचारधारा ये दोनों चीजें मेरे साहित्य में अनिवार्य हैं लेकिन उनका अनुपात देखा जाना चाहिए। वो एक विशेष अनुपात में होती हैं, जिसकी कलात्मक परिणति होती है।

सैयद दाऊद रिज़वी: ‘महाबली’ नाटक लिखने के लिए आपको कैसे विचार आया? ‘महाबली’ नाटक लिखने का मूल कारण क्या था?
असग़र वजाहत: देखिए ‘महाबली’ नाटक की बड़ी लंबी भूमिका है वो आपने पढ़ी होगी। तो उसमें आपको इस सवाल का जवाब बड़ी आराम से मिल जाएगा। यह नाटक क्यों लिखा गया और इसके लिखने के पीछे क्या उद्देश्य था।

सैयद दाऊद रिज़वी: ‘महाबली’ नाटक साहित्य बनाम सत्ता का द्वंद्व है? या फिर विचारों का लोकतांत्रिककरण करने वाला नाटक है?
असग़र वजाहत: इसमें तीन बातें हैं। एक बात तो यह है कि जो जन भाषा है, उसको प्राथमिकता देने वाला और विचार को जन-जन तक पहुँचने का काम तुलसीदास ने किया था। दूसरा काम तुलसीदास ने यह किया जो अपने समकालीन, जो यथास्थिति थी, उस स्थिति को उन्होंने तोड़ा था। तीसरा काम यह किया था कि राजसत्ता के समक्ष उन्होंने कोई संबंध नहीं बनाया था। तुलसीदास ने ये काम ऐसे किए थे जो आज भी प्रासंगिक हैं। इस करण यह नाटक महत्वपूर्ण है।

सैयद दाऊद रिज़वी: असग़र वजाहत अपने नाटक की रंगमंचीयता और आज के रंगमंच में कितना और क्या अंतर पाते हैं?
असग़र वजाहत: देखिए नाटक जो है, एक सामूहिक कला है। एक ‘कलेक्टिव इक्स्प्रेशन’ है। जिसको बहुत से लोग करते हैं। उसमें एक बड़ी भूमिका नाटककार की होती है। लेकिन केवल उसकी भूमिका नहीं होती बल्कि निर्देशक की, अभिनेताओं की, जो संगीत देता है, उसकी होती है, जो लाइटिंग देता है, उसकी भी होती है। तो इन सबकी भूमिका के साथ नाटक को लिखने का जो उद्देश्य है उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सब लोग काम करते हैं। और अगर उद्देश्य पूरा हो रहा है तो सबका काम सफल माना जाता है। और मेरे नाटक जो हैं वो मंच के ऊपर अभी तक इस तरह प्रस्तुत हुए हैं। उनका जो नाटक के मुख्य उद्देश्य है वो पूरा हुआ है। नाटक से मैं जो कहना चाहता हूँ वो बहुत प्रभावशाली रूप से सामने आया है जिसमें निर्देशकों की बड़ी भूमिका रही है।

सैयद दाऊद रिज़वी: ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ नाटक का निर्देशन जब प्रसिद्ध रंगनिर्देशक हबीब तनवीर कर रहे थे, तब आपके मन में क्या विचार आ रहे थे?
असग़र वजाहत: हबीब तनवीर साहब बड़े मंझे हुए और बड़े पुराने और मेरे सीनियर निर्देशक रहे हैं। वो जब रिहर्सल कर रहे थे तो मैं जाकर देखता था। लेकिन मुझे ऐसी आशा नहीं थी कि मेरा नाटक मंच पर इतना अधिक सफल होगा। लेकिन जब नाटक का पहला प्रदर्शन हुआ तो उन्होंने पहले प्रदर्शन में यह सिद्ध कर दिया कि नाटक का जो प्रदर्शन है, उसकी प्रस्तुति जो की गई है वो बहुत बढ़िया ढंग से की गई। नाट्य कला के बारे में हबीब तनवीर की बड़ी गहरी समझ थी और वे इस नाटक के पूरे परिवेश को और पृष्टभूमि को समझते थे। उन्होंने बड़ी अच्छी तरह से प्रस्तुत किया और मुझे लगता है कि उतना बढ़िया प्रदर्शन शायद कभी इस नाटक का हुआ हो।

सैयद दाऊद रिज़वी: ‘सबसे सस्ता गोश्त’ नाटक अगर आज प्रस्तुत किया जाए तो इसको कितना स्वीकार्य किया जाएगा?
असग़र वजाहत: आज चूंकि सांप्रदायिकता बहुत बढ़ गई है। घृणा बहुत बढ़ गई है और सच बोलने का जो चलन है वो काफी कम हो गया है। उसके ऊपर काफी प्रतिबंध लग गए हैं। तो इसलिए इस नाटक को करना थोड़ा-सा कठिन काम होगा। लेकिन नाटक में कोई ऐसी बात नहीं है जो दंगा या फसाद की स्थिति पैदा करे। बल्कि नाटक जो है वो एक तर्कसंगत तरीके से दोनों समुदायों के बीच में एक प्रेम और सद्भाव की बात करता है। नाटक कहता है कि मनुष्य महत्वपूर्ण है और मनुष्य को महत्व देना चाहिए। तो यही मुख्य रूप से नाटक का संदेश है वो लोगों को स्वीकार्य कर लेना चाहिए। लेकिन आज की परिस्थितियों में थोड़ा सा वैसे भी कठिन हो जाएगा।

सैयद दाऊद रिज़वी: ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ और ‘ईश्वर अल्लाह’ दोनों नाटकों में धर्म के माध्यम से आपने समाज में सौहार्द, एकता और भाईचारे की स्थापना करने की कोशिश की है। लेकिन आज समाज की जो दुर्गति हो रही है उसके लिए आप धर्म को कितना ज़िम्मेदार मानते है?
असग़र वजाहत: धर्म जो है एक स्थिति आती है जब वो अधर्म बन जाता है। अगर धर्म के नाम पर हिंसा होने लगे, धर्म के नाम पर भेदभाव होने लगे, धर्म के नाम पर दंगे होने लगें, धर्म के नाम पर अगर राजनीति होने लगे, धर्म के नाम पर अगर पैसा जमा किया जाने लगे तो फिर वो धर्म नहीं रहता है। मेरे दोनों नाटक जो हैं वो धर्म का मानवीय स्वरूप प्रस्तुत करते हैं जो वास्तव में धर्म का है। हर धर्म लोगों को जोड़ने की बात करता है। धर्म इंसान की बात करता है, सौहार्द की बात करता है। कोई धर्म यह नहीं कहता है कि दंगा-फसाद किया जाए। तो आज का धर्म जो पब्लिक के फेवर में आ गया है, वो प्रदर्शन वाला धर्म है। तो वो जो प्रदर्शन वाला धर्म है वो एक प्रकार से धर्म नहीं कहा जाएगा। धर्म के नाम पर राजनीति हो रही है।

सैयद दाऊद रिज़वी: इसी वर्ष ‘गांधी-गोडसे: एक युद्ध’ फिल्म आई है जो आपके नाटक पर ही आधारित है। जिसका निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया था। तो बताइए फिल्म का निर्माण होते समय एक रंगनिर्देशक और एक फिल्म निर्देशक के बीच कैसा माहौल था? क्या विचार दोनों के बीच उत्पन्न हो रहे थे?
असग़र वजाहत: देखिए दोनों के बीच में बिल्कुल सहमति थी। दोनों के विचार मिलते थे। उसमें किसी प्रकार का मतभेद नहीं था। नाटक की जो मूल आत्मा है, वो बनी रही। बल्कि फिल्म में मूल आत्मा और अधिक विकसित हुई। कुछ ऐसे दृश्य हैं जो नाटक की मूल आत्मा को सामने लाते हैं। वे दृश्य नाटक में नहीं बल्कि फिल्म में हैं। इसलिए मेरा यह मानना है कि बड़ी ईमानदारी से फिल्म बनाई गई है और नाटक का जो उद्देश्य है वो पूरा होता है। इसलिए इस फिल्म में विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। जो लोग इस संबंध में विवाद खड़ा करते हैं वे फिल्म को समझ नहीं पाए हैं। उन्होंने फिल्म को देखा नहीं और बने बनाएँ फॉर्मूलों के अंतर्गत वो फिल्म की व्याख्या करने लगे हैं। जबकि उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था। अपने-अपने प्रचार के लिए क्योंकि दूसरे की आप निंदा करें तो वो अपनी प्रशंसा मानी जाती है। कि भई हम अच्छे हैं दूसरा बुरा है। एक इस तरह के लोग थे। दूसरे लोग, वो लोग थे जिन्होंने फिल्म देखी और समझे ही नहीं। तीसरे वो लोग थे, जिन्होंने न फिल्म देखी और न समझे बल्कि दूसरों के कहने पर ही अपनी राय बनाने लगे। यह स्थिति थी।

सैयद दाऊद रिज़वी: आपके नाटक रंगमंच की दृष्टि से बड़े ही सफल रहे हैं। फिर आपके मन में यह विचार कब और कैसे आया कि आपके नाटकों पर फिल्म बननी चाहिए?
असग़र वजाहत: देखिए ये मेरे मन में नहीं आया। जो फिल्म के निर्देशक हैं राजकुमार संतोषी हैं, उन्होंने जब ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ नाटक पढ़ा तो उन्होंने बुलाया और मुझसे अनुमति मांगी कि वो फिल्म बनाना चाहते हैं। लेकिन मेरी इच्छा नहीं थी कि उसके ऊपर अभी फिल्म बने। ये निर्देशक का फैसला था। निर्देशक के ही आग्रह पर गांधी-गोडसे पर फिल्म बनी और जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई पर बन रही है।

सैयद दाऊद रिज़वी: एक रंगनिर्देशक के दृष्टिकोण से रंगमंच और फिल्म के बीच के अंतर को असग़र वजाहत किस पर देखते हैं? इस पर प्रकाश डालिए।
असग़र वजाहत: देखिए बहुत बड़ा अंतर है। दोनों अलग-अलग माध्यम हैं और यह बहुत बड़ा विषय है। इस पर सवाल पूछकर कोई संतोषजनक उत्तर मिलना संभव नहीं है। लेकिन प्रायः यह होता है कि रंगमंच में जिन चीजों को मान लिया जाता हैं, फिल्म में उनकी बैकग्राउंड को दिखाना आवश्यक होता है। फिल्म में जिस तरह के संवाद हो सकते हैं, वैसे नाटक में नहीं हो सकते हैं। नाटक की तुलना में फिल्म ज़्यादा फ्लेक्सबल यानी लचीला माध्यम है। लचीले माध्यम का पूरा लाभ निर्देशक उठाता है। ये सब अंतर हैं जिनके विस्तार में आप जाएंगे तो आपको बहुत गंभीर बातें जानने को मिलेंगी।

सैयद दाऊद रिज़वी: जैसा कि आप जानते हैं आज का समय सोशल मीडिया का है। आप भी निरंतर सोशल मीडिया पर लघु कथाएँ लिख रहे हैं। असग़र वजाहत सोशल मीडिया को साहित्य के लिए, समाज के लिए और अभिव्यक्ति के लिए कितना महत्वपूर्ण समझते हैं?
असग़र वजाहत: देखिए ऐसा है कि सिक्के के दो पहलु होते हैं और एक पहलु यह है कि जो लेखक या कोई भी लिखता है वो जल्दी बहुत लोगों तक पहुँच सकता है। सोशल मीडिया बहुत बड़ा संचार का माध्यम है। बुरा पहलु इसका यह है कि हर तरह का व्यक्ति जिसका साहित्य से लेना-देना भी नहीं है वो भी कमेन्ट कर सकता है, वो भी उसके बारे में अपनी राय देता है। दूसरा बुरा पहलु यह है कि लोग ऐसा कंटेन्ट भी डाल देते है कि जो समाज विरोधी भी एक माने में माना जाता है। तो सोशल मीडिया के पाज़िटिव और नेगटिव दोनों पक्ष हैं। मैं तो यह समझता हूँ कि पहले प्रिन्ट मीडिया के माध्यम से रचनाएँ कम लोगों तक पहुँचती थी। सोशल मीडिया के माध्यम से यह लाखों लोगों तक चली जाती हैं। उसकी अपनी सीमाएँ ज़रूर हैं। अभी भी बहुत से लेखक जो हैं जो सोशल मीडिया को महत्व नहीं देते हैं। लेकिन धीरे-धीरे सोशल मीडिया का महत्व और बढ़ेगा।

सैयद दाऊद रिज़वी: असग़र वजाहत एक आम मनुष्य या एक मुस्लिम के रूप में स्वयं को इस समाज में कहाँ खड़ा पाते और इस समाज को देखकर उनके मन में क्या विचार आते हैं?
असग़र वजाहत: देखिए ऐसा है कि जिसके साथ भी अन्याय हो रहा है। मिसाल के तौर पर दलित हो सकता है, अल्पसंख्यक हो सकता है, आदिवासी हो सकता है। इन सबके साथ जिस समाज में अन्याय होता है, तो इस अन्याय के विरुद्ध, शोषण के विरुद्ध, भेदभाव पैदा करने के विरुद्ध, हिंसा के विरुद्ध, घृणा और हिंसा के विरुद्ध, किसी के भी मन में भावना आती है। मेरे भी मन में आती है।

सैयद दाऊद रिज़वी: मेरा आखिरी सवाल है कि असग़र वजाहत इस समय किस तरह का लेखन करने में व्यस्त हैं और उनकी आने वाली रचनाएँ किस तरह की हो सकती हैं या किस विषय पर वो लिख रहे हैं या लिखना चाह रहे हैं?
असग़र वजाहत: देखिए एक तो मेरा एक नाटक आ रहा है जो इन्द्रसभा, जो आज से लगभग दो सौ साल पहले लिखा गया था, उसका वो एक रिवाइसड एडिशन है। मैंने उसको संशोधित और संपादित किया है। उसमें कुछ जोड़ा है, कुछ घटाया है। वो बहुत बड़ा क्लासिक है, जिसको फिर से सामने लाने का प्रयास किया है। तो यह काम है। दूसरा काम यह है कि मेरा एक कहानी संग्रह जो राजकमल प्रकाशन से छप गया है, जिसका नाम है ‘पूर्ण समय’। इसी के साथ-साथ कुछ और भी नाटक के बारे में विचार चल रहा है। नाटक को लिखना चाहता हूँ। एक बड़े प्रसिद्ध नाटककार थे आग़ा हश्र कश्मीरी, तो मैं उनके ऊपर भी कुछ लिखना चाहता हूँ।

(12 अक्टूबर 2023)

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।