व्यंग्य: सड़क

संतोष श्रीवास्तव

देश में चुनाव की सरगर्मियाँ चल रही थीं। राजनेता अपने लिए वोट मांगने के लिये तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे थे। एक ने तो बस अड्डे से महाकाली मंदिर की ओर जाने वाली ऊबड़-खाबड़ सड़क पर अपनी जीप में खड़े होकर यहाँ तक कह दिया कि नेता बनते ही उसका पहला काम शहर की सभी सड़कों को सीमेंट की करना होगा। हर सड़क चौड़ी होगी, फुटपाथ बनेंगे, डिवाइडर पर पर्यावरण की रक्षक पेड़ लगाए जाएंगे जो राहगीरों को सुखद ठंडी छाँव देंगे।
गधों से भारी पथरीली सड़क के चौराहे पर सुबह सात से मजदूर आने इकट्ठे हो गए। ठेकेदार के आते ही काम शुरू होगा, ऐसा सोचते हुए मजदूर बीड़ी पीते बतिया रहे थे। उनमें से एक  ने कहा, "जो नेताजी कह रहे हैं वह सच होगा क्या? चुनाव तो होते ही रहते हैं पर सड़कें तो कभी सुधरती ही नहीं।"
"सही कह रहे हो, पर इस बार देखते हैं क्या होता है?" दूसरे ने आसमान की ओर देखते हुए कहा।
तीसरे मजदूर की बीड़ी बुझ चुकी थी। उसने फिर से माचिस जलाई, और तीली बीड़ी के सिरे पर लगाते हुए कहा, "होने दो जो होता है। हमें क्या करना। हमें तो काम मिलने से मतलब है। गद्दी पर कोई भी बैठे क्या फर्क पड़ता है।"
"सही कह रहे हो, हम मजदूर के मजदूर ही रहेंगे  नए नेता कौन सा हमें रहने को पक्का घर और दो जून की रोटी दे देंगे।" चौथे मजदूर के कथन में निराशा थी। 
पहला हँसा, "नेता बनते ही वे अपना घर भरेंगे कि तुम्हारी सोचेंगे?"
तभी ठेकेदार आ गया। गोरा चिट्टा, खाया पिया, मूँछों पर ताव देता, चश्मे से झाँकती चालाकी भरी आँखें। उसने हाँक लगाई, "चलो लग जाओ काम पर ।आज इधर की सड़क पर गिट्टियाँ बिछ जानी चाहिए। कल रोड रोलर चलवाना है।"
मजदूर काम में जुट गए। सड़क की शुरुआत में डायवर्जन का बोर्ड लग गया। बोर्ड पर लाल पताका -'सावधान, काम प्रगति पर है।"
ठेकेदार घूम-घूम कर निरीक्षण करने लगा। उसे लगा मजदूरों के हाथ सुस्त चल रहे हैं। वह चीखा, "जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ, इतने धीमे काम करोगे तो बन चुकी सड़क।"
किंतु मजदूरों ने तो ठान लिया था वे अपनी गति से ही काम  करेंगे और करते रहेंगे। सड़क पक्की होने पर उन्हें कौन सी उस पर कार चलानी है। रबड़ की चप्पल तो कच्ची पक्की दोनों सड़क पर चलती है। बिना चूँ-चपड़ किए। नेताजी का चुनाव प्रचार फिर याद आ गया, "छह महीने के अंदर शहर की सारी सड़कें अभिनेत्री के गालों की तरह चिकनी हो जाएंगी। यह हमारा वादा है।"
मजदूरों को अपनी-अपनी घरवालियाँ याद आ गईं जिनके सलोने मुखड़े गर्द से भरे थे। इन मुखड़ों को कभी साबुन, क्रीम नसीब नहीं हुआ। मुँह अंधेरे उठते ही घर के कामकाज निपटाकर वे उनके साथ काम पर आ जाती हैं। 
 लंच ब्रेक की घोषणा कर ठेकेदार अपने स्कूटर पर बैठ रेस्टोरेंट की ओर रवाना हो गया। मजदूरों ने खुदी हुई सड़क के किनारे रखे ड्रम में भरे पानी से हाथ पैर धोए। उनकी घरवालियाँ मुखड़े की धूल धोकर पोटली में से रोटी निकालने लगीं। खा-पीकर मजदूर सुस्ता रहे थे। थोड़ी ही देर में ठेकेदार आ जाएगा। तब तक बीड़ी ही पी लें। बीड़ी पीते हुए वे आपस में बतियाने लगे।
पहले मजदूर ने बीड़ी का धुआँ उड़ाते हुए कहा, "यार सड़क पक्की, चिकनी बन जाए तो मजा आ जाए।"
दूसरे ने उसे भर नजर देखा "तुम्हें क्यों मजा आएगा? दूसरी सड़क बनाने के काम पर नहीं लगना है क्या?"
बाकी के मजदूर हँसने लगे "इतनी जल्दी दूसरा काम मिलता है क्या? तुम भी ना।" 
पहला तो परमानंद की अवस्था में ही था, "हम तो रात को सड़क पर लेट जाएंगे। सड़क को सहलायेंगे। आँख बंद किए सोचेंगे जैसे अभिनेत्री के गालों को सहला रहे हैं।"
अन्य मजदूर फिर हँसे -" क्या बात कही भइया, फिर स्वर्ग सिधार जाना।"
"यह कैसी अटपटी बात कही भैया!"
 दूसरा बोला, "ठीक ही तो कह रहे हैं। रात को अमीरजादो की कारें, वो क्या कहते हैं..." 
"लॉन्ग ड्राइव" उनमें से एक समझदार से दिखते मजदूर ने कहा।
"हाँ, उसी पर जाती हैं अमीरजादो की कारें। कुचल देंगे तुम्हें।"
"हाँ सही है, वो थोड़ी देखते हैं गरीबों को।"
"अब गरीबों को देखें कि जिंदगी का मजा लें।"
तभी ठेकेदार आ गया। सबको काम पर लगने की हाँक लगाई और मोबाइल पर बतियाने लगा। उसकी आवाज मजदूर तक कट-कट कर पहुँच रही थी।
"कब तक पूरा हो जाएगा काम?"
"जल्दी ही सर।"
"जल्दी ही करवा लो। सुरंग बनाने के ठेके में तुम्हें नामांकित कर रहे हैं। अप्रूवल आने तक पेंडिंग काम निपटा लो। हमारा कमीशन याद रखना।"
"बिल्कुल याद है सर। आप हमारे लिए इतना करते हैं तो हम न करेंगे।"
कहते हुए ठेकेदार ने मोबाइल जेब में रखा और दुगने उत्साह से हाँक लगाने लगा, "चलो जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ।"
मजदूरों ने एक दूसरे की ओर देखते हुए आँखों-आँखों में फैसला कर लिया। ठेकेदार कमीशन के बल पर ठेका लेकर जेब भरे और मजदूर भूखा मरे। यह नहीं होगा काम तो वे धीरे-धीरे ही करेंगे। जितने दिन सड़क बनाने में लगाएंगे उतने ही दिन उनके घरों के चूल्हे जलते रहेंगे। वरना...।

4 comments :

  1. बहुत-बहुत धन्यवाद अनुराग जी

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  2. अच्छा है।

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  3. अच्छा है।

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  4. संतोष जी जबरदस्त तंज है। बहुत बारीक आपकी दृष्टि है। मजदूरों के हाव भाव का बढ़िया वर्णन। लेखन सहज पर मारक।
    ●-मधूलिका सक्सेना मधुआलोक●

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