उनको प्रणाम - बाबा नागार्जुन

जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम

बाबा नागार्जुन
कुछ कंठित औ’ कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए
उनको प्रणाम

जो छोटी सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार
उनको प्रणाम

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे
उनको प्रणाम

एकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले
हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले
उनको प्रणाम

कृत-कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल
उनको प्रणाम

थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ
था जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ
उनको प्रणाम

दृढ़ व्रत औ’ दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति-मंत
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत
उनको प्रणाम

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर
उनको प्रणाम।

(बाबा नागार्जुन)