बिस्मिल की आत्मकथा - चुने हुए अंश

परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है। मैं तो अपना कार्य कर चुका। मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को  दिखला  दिया, जो  सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ। अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये। पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ।

अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें। जो कांग्रेस तय करें, उसे  सब  पूरी  तौर  से  मानें  और  उस  पर  अमल करें। ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने  सिर  झुकाना  पड़े, और  यदि  ऐसा  करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं। क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा।

हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे  वह  कितनी  कठिनता से क्यों न हो। जो मैं कह रहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां वारसी का भी मत है, क्योंकि अपील  के समय हम दोनों लखनऊ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे। आपस में हर तरह की बातें हुई थी। गिरफ़्तारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी।

श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे। उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिये, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी। इसका  दोषी  मैं  ही  हूं, जो  अपने  प्रेम  के  पवित्र  अधिकारों  का  उपयोग  करके  श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया। मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी। परमात्मा जाने  कि  वह  पत्र  उनके  हाथों  तक  पहुंचा भी या नही, खैर !

परमात्मा की  ऐसी  ही  इच्छा थी  कि  हम  लोगों  को  फांसी  दी  जावे, भारतवासियों  के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे  बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों। जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्ष की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो। जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे। ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें।