अर्चना तिवारी की लघुकथाऐं

बौरा‍

अर्चना तिवारी
बौरा, हां इसी नाम से तो पुकारते थे सब उसे वह एक कंधे पर पुरानी शाल डाले और दूसरे कंधे पर झोला लटकाए ऑटो स्टैंड के किनारे बने चबूतरे पर हमेशा बैठा दिखता था। वहां बैठे-बैठे वह हर आने-जाने वाले का मुस्कुराकर अंग्रेजी में अभिवादन करता। वह कौन है ? क्या करता है ? कहां रहता है ? इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था। न ही कोई जानता था। लेकिन जब वह नहीं दिखता तो लोगों की नजरें उसे खोजती थीं। 
दोपहर में जब सवारियों का आना-जाना कम हो जाता तो बौरा, ऑटो वालों और आसपास की गुमटी वालों के मनोरंजन और समय बिताने का साधन बन जाता। मौसम चाहे जो भी हो, लेकिन उसके कंधे से शाल कभी नहीं हटती थी। अक्सर दोपहर में जब वह बैठे-बैठे ऊंघने लगता तो कोई ऑटो वाला धीरे से आकर उसकी शाल खींचकर भाग जाता और बौरा उसको लेने के लिए बदहवास, परेशान सा उसके पीछे-पीछे भागने लगता। उस शाल को वापस पाने के लिए वह उन सबकी हर ऊल-जलूल फरमाइश पूरी करता। वे उससे जैसा करने को कहते वह वैसा ही करता। उसकी यह स्थिति देख लोग तालियां पीट, हंस-हंसकर लोट-पोट हो जाते। अंत में शाल पा लेने पर वह फिर से उसी चबूतरे पर विराजमान हो ऐसे मुस्कराने लगता जैसे कुछ हुआ ही न हो।
आज सुबह से बौरा पता नहीं कहां चला गया था। दोपहर भी बीतने लगी थी, लेकिन आज लोगों की नज़रें उसको नहीं खोज रहीं थीं। आज उस चबूतरे पर कहीं से एक औरत आकर लेट गई थी। उसके तन पर लिपटे मैले कपड़े में कपड़ा कम छोटे-बड़े झरोखे ज्यादा दिखाई दे रहे थे। ये झरोखे आज सड़क पर हर आने-जाने वालों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वहां से गुजरते लोगों की नजरें उन झरोखों में अटक-अटक जा रही थीं। कुछ नजरें ऐसी भी थीं जो चुपके से उधर जातीं और फिर अनदेखा कर ऐसे आगे बढ़ जातीं जैसे कि कुछ देखा ही न हो। कुछ हिकारत भरीं कोसतीं, बड़बड़ातीं हुई आगे बढ़ जातीं। लेकिन कई नजरें तो चबूतरे के चारों ओर परिक्रमा लगाती हुईं उसे हर कोण से देख लेने के भरसक प्रयास में लगी थीं। जैसे दुनिया का आठवां अजूबा यहीं अवतरित हो गया हो।
तभी अचानक न जाने कहां से बौरा प्रकट हुआ। जब वह चबूतरे की ओर बढ़ने लगा तो पीछे से सीटी बजने और तालियां पीटकर हंसने की आवाजें आने लगीं। लेकिन वह चबूतरे के पास दो पल के लिए ठिठका और फिर आगे बढ़ गया। उस औरत के तन पर लिपटे कपड़ेनुमा झरोंखों को बौरा ने अपनी शाल के पट से बंद कर दिया था। आज पहली बार उसके चेहरे पर मुस्कुराहट के बजाय गंभीरता दिख रही थी और आसपास के तमाम हंसने वाले चेहरे जैसे खुद पर शर्मिन्‍दा थे।

भूख का ईमान

चिलचिलाती धूप। पारा सैंतालिस पार कर चुका था। लगभग नौ-दस साल का एक लड़का थर्मोकोल के बक्से में पानी की थैलियाँ रखकर बेच रहा था। जब भी कोई ऑटो या बस बाईपास पर रूकती तो वह हाथों में थैलियाँ लिए ‘पानी ! पानी !’ की आवाज़ लगाता हुआ उनकी ओर दौड़ पड़ता। लोग पानी की थैलियों के बदले उसकी हथेली पर सिक्का रख देते। वह चहकता हुआ उन सिक्कों को एक डिब्बे में डाल देता। उस समय उसके चेहरे पर अपार संतोष दिखाई देता।
पास में एक छोटा सा मन्दिर था। जहाँ भिखारियों और साधुओं का मजमा लगा था। कुछ लोग उन्‍हें भोजन के पैकेट बाँट रहे थे। कुछ ऑटोवाले, रिक्शेवाले भी उन पैकेटों को लेने के लिए खड़े थे। एक रिक्शेवाला लड़के के पास बैठकर पैकेट से पूरियाँ निकाल कर खा रहा था। वातावरण में ताज़ी पूरियों की सुगंध फैल गई थी। लड़का रिक्शेवाले को एक टक देखे जा रहा था।
“जा के तुमहू लय लेव पाकिट !” रिक्शेवाले ने उसे घुड़का।“नाह ! अम्मा घरे से रोटी लय के आवत होइहै।” लड़के ने इन्कार करते हुए बताया।“ढेर सेखी न बघार, अबहिये चुक जाई त मुँह तकिहौ !” रिक्शेवाले ने चेताया।
लड़का उसको अनसुना कर सड़क से नीचे जाती पगडण्डी की ओर उचक-उचक कर देखने लगा। शायद माँ की राह देख रहा था। लेकिन ऐसा लग रहा था कि उससे अब भूख बर्दाश्त नहीं हो रही है। वह रह-रह कर सूखे होठों पर अपनी ज़ुबान फेर लेता था।

तभी एक व्यक्ति पैकेट बाँटते-बाँटते उस लड़के के पास आ गया। उसने लड़के की ओर पैकेट बढ़ाते हुए कहा, “लो बेटा !” बच्चे ने एक क्षण उस पैकेट को देखा। फिर धीरे से इन्कार में सिर हिला दिया।“ले लो बच्चे, सबने लिया, तुम भी ले लो !” उस व्यक्ति ने प्यार से कहा। पैकेट से आती खाने की सुगंध और भूख से कुलबुलाती आँतों के आगे लड़के ने आखिरकार हार मान ली। लड़के ने हिचकते हुए पैकेट थाम लिया।वह व्यक्ति लड़के को पैकेट थमा कर धीरे-धीरे अपनी कार की ओर वापस लौट रहा था। लड़के की निगाह उसके पीछे ही लगी थी। अचानक उसने पीछे से पुकारा, “बाउजी !” और बिजली की गति से नीचे झुका। व्‍यक्ति ने देखा थर्मोकोल के बक्से से पानी की दो थैलियाँ निकाल कर लड़का उसकी ओर दौड़ा आ रहा है।