अनिल पुरोहित की दो कविताएँ

अनिल पुरोहित
आदि मानव

धरोहर है एक - परंपरा
कैसी छोड़ दूं इसे?
बर्बरता, हिंस्रता, पशुता
और इसमें थोड़ी सी - मानवता।
यही सौंप जाना,
आने वाले - कल को।
आदि मानव मैं-
आदिम - सदियों से
सदियों तक।
अवसर ही कहाँ मिला
सभ्य होने का।
चढा मुखौटे सवाँरता रहा
बस अपने आपको।
आदिमता जो दिख रही
मुझे अतीत में
वही देखेगा भविष्य
मुझमें।
कहाँ माँज पाया - परंपरा अपनी।
बहती गयी -  धारा वक्त की
धोता रहा मुखौटे,
बैठ किनारे-
सदियों से - सदियों तक।
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उसके लिए

वो जानता - कहाँ सजाना मुझे
शब्द एक मैं उसके लिये -
नित नए भावों में सजा मुझे
कविता अपनी निखार रहा।
तलाश कर रहा वह - एक नयी धुन
स्वर एक मैं, उसके  लिये -
साज पर अपने तरंगों में सजा
कविता में प्राण नए फूंक रहा।
देखा है मैंने उसे - खींचते आड़ी तिरछी रेखाएं
रंग एक मैं,  उसके लिए -
तूली पर अपनी सजा
सपनों को आकार इन्द्रधनुषी दे रहा।
लहरों सा बार बार भेजता मुझे
कभी सीपी देकर, तो कभी मोती
सब कुछ किनारे धर बेकल सा मैं
बार बार लौट - समा जाता उसमें।