कंबल - कहानी

अभिनव सरकार

उस वाकये को अर्सा बीत चुका है। मगर जब भी कोई सर्दी से कांपता बुर्जग मेरी आंखों के सामने आता है तो याद, वक्त की न जाने कितनी दीवारें लांघकर उस दौर में चली जाती है जिस दौर में वो बूढ़ी अम्मा थीं। तब पिता जी का तबादला उस शहर में नया नया ही हुआ था और उस अंजान शहर में मैं और मेरा परिवार हाल ही में रहने पहुंचा था। पिता जी ने जो मकान किराये पर लिया था वह किसी पुरानी हवेली से कम नहीं था। गोल दरवाजे वाले घर में घुसते ही एक पुरानी सी बैठक थी जिसनें बड़ी बड़ी अलमारियां थी। इतनी बड़ी की मैं और मेरी छोटी बहन छुटकी एक ही अलमारी में आराम से बन जाये। फिर एक आंगन, जिसमें बायें हाथ पर एक छोटा सा कमरा था। जिसे मम्मी ने किचिन बना लिया। सामने दो छोटे छोटे कमरे थे जिसनें एक हम दोनों भाई बहन को और दूसरा भगवान जी को अलाट किया गया। बगल में एक बड़ा कमरा था जिसमें बाकी ग्रहस्थी जमा दी गई। उसी के बगल से छत पर जाने का रास्ता जाता था।

 हालांकि छत पर भी दो कमरे थे मगर एक में पहले से ताला पड़ा था। जिसके बारे में हम भाई बहन को ये बताया गया था कि इस कमरे में भूत रहते हैं। इसका राज तब खुला जब एकबार मैंने हिम्मत करके भूत को देखने की कोशिश की। उसने कुछ पुराने भारी बेकार सामान के अलावा मुझे कुछ नजर नहीं आया। जो शायद पिछले किरायेदार या मकान मालिक का था। तब समझ में आया कि कच्ची मुंड़ेर के डर से मम्मी ने यह कहानी गढ़ी थी। दूसरे कमरे में थोड़ा बहुत सामान रख दिया गया। मकान तक पहुंचने वाली गलियां संकरी तो नहीं थी लेकिन आपस में उलझी जरूर थी। हमारी गली के पीछे थोड़ी दूर पर नहर थी। जिसके बगल पर बनी पगडंडी पर पिता जी रोज टहलने जाते थे। पिता जी ने हिदायत दी थी कि घर के बाहर कहीं न जाये। सुबह आॅफिस जाते वक्त पिता जी के साथ स्कूलबस तक जाते और लौटकर आते तो मम्मी गली के बाहर इंतजार करती मिलती।

मुहल्ले में ज्यादातर गरीब तबके के लोग रहा करते थे जो बैंक में कैशियर, पिता जी को इज्जत की नजरों से देखा करते थे। महिलायें भी मम्मी से जान पहचान बढ़ाने के लिये बेताब थी और रोज शाम को चार पांच अडोस पडोस की औरतें हमारे दरवाजे पर झुंड बनाकर बैठ जाती और मम्मी से बात करने लगती। इस चर्चा के बहाने मुझे और छुटकी को बाहर खेलने का मौका मिला जाता। धीरे धीरे हमें थोड़ी दूर तक जाने की इजाजत मिलने लगी। मुहल्ले के नये दोस्तों के साथ हम दोनों उन गलियों का मुआयना करने निकलने लगे। हमारी गली में दो दुकानें थी। एक बड़ी दुकान थी। जिस पर हर वक्त ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। इसलिये दुकानदार एक दो रुपये वाले, ग्राहक हम बच्चों को ज्यादा तवज्जो नहीं देता था और दूसरी एक बूढ़ी दादी की। जिन्हें मुहल्ले के बच्चे अम्मा कहकर बुलाते थे। बूढ़ी अम्मा ने अपनी दुकान उनके दो कमरें के मकान के बाहर वाले कमरे में सजा रखी थी। जिसमें वह अपनी छोटी सी चारपाई पर बैठी बैठी चीजें बांटती रहती और पैसों को एक अपनी कमर से बंधी एक कपड़े की पोटली में रख लेती। बूढ़ी अम्मा की दुकान पर सिर्फ बच्चों के सामान मिला करते थे इसलिये सब बच्चे अपनी एकन्नी चवन्नी लेकर उन्हीं की दुकान पर पहुंच जाते कोई जीभ रंगने वाला चूरन लेता तो कोई हरी लाल चटपटी गोलियां बूढ़ी अम्मा हरेक बच्चे को उतने ही लाड़ प्यार से चीजें बाँटतीं जितने कि दूसरे को। उनकी झुर्रियों में धंसी गहरी आंखें हर वक्त मुस्कुराती रहती थी।

मैं और छुटकी भी उन्हीं की दुकान पर जाकर अपना सामान ले आते। हालांकि अम्मा सभी बच्चों से कोई भेदभाव नहीं रखती थी मगर छुटकी उन्हें कुछ ज्यादा ही प्यारी लगने लगी। छुटकी के प्रति लगाव के कारण कभी कभी तो अम्मा छुटकी को मुफ्त में ही कोई चीज दे देती। स्कूल में भी कुछ नये दोस्त बनें। मगर असल मजा गली के दोस्तों के साथ अम्मा की दुकान पर गुजारने में आता था। हफ्ते दर हफ्ते मैं और छुटकी अम्मा के करीब होते गये और उनके घर में अंदर तक पैठ बना ली। दो कमरों के उनके मकान में बीच में एक बड़ा सा आंगन था। जिसमें एक ओर उनकी बकरी बंधी रहती थी और दूसरी ओर अम्मा ने एक छोटी सी बागवानी लगा रखी थी। जिसमें टमाटर, मिर्च और कद्दू के पौधे लगे थे। वहीं हमने पहली बार कद्दू को उसकी बेल पर लटकता देखा था। मेरे और छुटकी के साथ मुहल्ले के बाकी बच्चे भी अम्मा के घर के अंदर दाखिल होने लगे। उनका घर हमारे लिये एक ऐसी जगह थी जहां हम आराम से दुनिया के नये अजूबे देख सकते थे। वर्ना उस नादान उम्र में कोई कहता भी तो भी हमें यकीन नहीं होता कि कद्दू बेल पर उगा करते है। मगर जब खुद अपनी आंखों से देखा तो पता चला कि दुनिया अजूबों से भरी पड़ी है। जैसे टमाटर का रंग हरा होता है धनिया घास जैसी जमीन पर पर उगती है। कभी कभी अम्मा हमें पुराने जमाने की कुछ कहानियां भी सुनाती जिनको सुनते वक्त छुटकी का चेहरा ऐसा हो जाता। जैसे वह अंतरिक्षयान में बैठी चांद की सैर पर हो। एक दिन शाम को चांद को निहारते छुटकी ने मम्मी से पूछा मम्मी क्या चांद भी किसी बेल पर लटकता है?

मम्मी ने उसके माथे पर हल्की सी चपत लगाकर कहा, नहीं! कौन सी मैडम पढ़ाती है ये सब?

छुटकी बोली, अम्मा ने बताया था।

मम्मी इस नई शिक्षक के बारे में जानने के लिये पूछा। कौन अम्मा?

वहीं जिनकी पीछे वाली गली में दुकान है। छुटकी ने जवाब दिया।

मम्मी ने छुटकी जवाब पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी।

अब तो हर शाम हम दोनों अपने गली मुहल्ले के दोस्तों के साथ अम्मा की दुकान पर पहुँच जाते जेब में पैसे न हों तो भी। उनकी दुकान में बैठ जाते और खामोशी भरी उस बूढ़ी औरत की आंखों में ताकते रहते। जो  हमें अपने सीलन भरे कमरे से परियों के जहां की सैर करा देती थी। अम्मा के घर में किसी और को न देखते हुए हमें हैरानी तो होती थी। मगर जब भी यह सवाल दिमाग में आया उस बूढ़ी मुस्कुराहट को देखकर भूल खो गया। बच्चों की स्मृति वैसे भी कम ही होती है। मगर एक दिन अम्मा की कहानी में खलल डालते हुए छुटकी ने पूछ ही लिया अम्मा आपके घर में कौन कौन है?

अम्मा ने मुस्कुराकर जवाब दिया मैं और मेरी बकरी।

छुटकी ने अगला सवाल दागा, और आपके मम्मी पिताजी?

वो मासूम धंसी आंखे फिर से मुस्कुरा उठी, वो बहुत दूर रहते हैं।

सात साल की छुटकी ने फिर सवाल दागा, जैसे मेरी नानी रहती हैं, है न?

मैं छुटकी से पांच साल बड़ा था और यह जानता था कि ज्यादा बूढ़े लोग मर जाते है। खैर छुटकी दनादन सवाल किये जा रही थी और अम्मा हँसती मुस्कुराती हर सवाल का जवाब उतनी ही संजीदगी से देती जितनी संजीदगी से छुटकी सवाल कर रही थी। उसके अल्हड़ सवालों से दूर अब मुझे भी इस बात की चिंता होने लगी थी कि यह बूढ़ी औरत जिसके घर के हर हिस्से से हम वाकिफ है। इसके परिवार के बारे में कुछ क्यों नहीं जानते? कुछ सवाल मेरे भी जेहन में उभरे मगर अम्मा को उस शाम छुटकी के सवालों से फुरसत ही नहीं मिली। रात के ढलने से पहले हम घर आ गये। उस दिन अम्मा की कहानी अधूरी ही रह गई जिस का मलाल हमें था लेकिन घर आने से पहले अम्मा ने जो टाॅफियाँ हमें बांटी थी। वे कुछ ज्यादा ही मीठी थी। दूसरे दिन कहानी पूरी करते हुये अम्मा ने हमें फिर टाॅफियाँ बांटी। हम अपने घर की हर बात उन्हें बताते और उनसे हर परेशानी का हल पूछते। कभी कभी वो हमारे होमवर्क के बारे में बारे पूछती और उसमें थोड़ी मदद भी कर देती। तब हमें यह पता चला कि अम्मा थोड़ी बहुत पढ़ी लिखी है। एकदिन मैंने कौतूहल में पूछा अम्मा आपका नाम क्या है?

अम्मा ने अचरज में पूछा, क्यों? क्या करना है?

मैंने कहा, बस यूँ ही अम्मा।

अम्मा ने एक ठंडी सांस भर कर जवाब दिया, जुलैखा।

खैर हमें नाम से कोई खास वास्ता तो नहीं था। मगर सवाल था तो जवाब भी जरूर चाहिये था, सो मिल गया। उनका नाम जानने के वाबजूद कभी हमने उन्हें उनके नाम से न तो याद किया, न बुलाया। पहले वो हमारे लिये दुकान वाली अम्मा थी और फिर सिर्फ अम्मा बन गई। अजीब सा जादू था उन दो कमजोर आंखों में जो बच्चों को देखकर हमेशा चमक उठती थी। उन सूखे होठों में जिनसे निकले हर लफ़्ज़ पर हमें उतना ही यकीन था जितना हमें मम्मी की बातों पर था। एक दिन अम्मा हमारे दरवाजे से निकली तो छुटकी ने उन्हें देख लिया और दरवाजे की तरफ दौड़ती हुई चीखी, अम्मा!

अम्मा पलटी। छुटकी को देखकर उनकी आंखें चमक गई और मुस्कुराती हुई खड़ी हो गई। बिल्कुल वहीं, जहां वह खड़ी थी जैसे छुटकी ने उनका नाम न लिया हो वल्कि स्टैच्यु बोल दिया हो। छुटकी के पीछे पीछे मैं आया और मेरे पीछे पीछे मम्मी चली आई। मम्मी ने ऊपर से नीचे तक उन्हें निहारा। एक पुराना सा सलवार कुर्ता, झुकी हुई कमर सर पर सफेद बाल। उस बूढ़ी काया में मम्मी को कोई खास आकर्षण नजर नहीं आया। मगर हम दोनों के लिये तो वो इस सुस्त और मतलबी शहर की सबसे खास शख्स थी। हमारी अम्मा। छुटकी ने अम्मा का परिचय मम्मी से कराते हुये बताया मम्मी ये अम्मा है, दुकान वाली अम्मा। मम्मी ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी। बस एक झूठी हँसी दिखाकर मुस्कुरा दीं। उनकी यह बेरुखी छुटकी को तो नजर नहीं आई लेकिन मैंने देख ली। छुटकी ने अम्मा से अंदर आने का आग्रह किया। शायद वह अम्मा को पूरा घर दिखाना चाहती थी। मगर अम्मा हालात भाँप चुकी थीं। अम्मा उसी तरह मुस्कुराई और बोली, नहीं बेटा, मुझे बाजार से दुकान के लिये सामान लेने जाना है। यह जवाब छुटकी को पसंद नहीं आया मगर उसने जिद नहीं की। बल्कि अपना गुस्सा उस शाम अम्मा की दुकान पर न जाकर उतारा। छुटकी उस शाम घर में ही रही मगर जब शाम ढले मैं घर वापस आया तो अम्मा के घर में हुये हर वाकये की खबर ली कि कौन कौन आया था? किसने क्या क्या लिया? वो कद्दू कितना बड़ा हो गया? हरे टमाटर कितने लाल हुये? अम्मा ने आज कौन सी कहानी सुनाई? जब मैंने उसे बताया कि आज तुम नहीं आई थी तो अम्मा ने कोई कहानी नहीं सुनाई। तब जाकर छुटकी की जान में जान आई। दूसरे दिन स्कूल से लौटकर जब छुटकी वापस आई तो उसने अपना बस्ता एक ओर पटका और मम्मी से दो रुपये मांगें। रुपये साथ लेकर मेरे साथ अम्मा की दुकान पर पहंची। कल शाम से गुस्से में भरी मासूम छुटकी अम्मा के दरवाजे को पार करते ही बिफर गई, अम्मा कल तुम मेरे घर क्यों नहीं आई?

अम्मा की आंखें मुस्कुरा दी उन्होने बिना जवाब दिये एक डिब्बे से छुटकी का पसंदीदा हाजमोला का एक पैकेट निकाला और छुटकी की तरफ बढ़ा दिया। छुटकी ने उनके उपहार को न करते हुये सवाल फिर दोहराया, "नहीं पहले बताओ"।

अम्मा आगे बढीं और छुटकी को गोद में उठा लिया। छुटकी उनकी गोद में पहुंचते ही उनसे चिपक गई और सिसक उठी और उसके बाद अम्मा की भी आवाज भारी हो गई। अम्मा ने भारी आवाज में उसे अपने सीने से चिपका कर कहा, क्योंकि कल मेरी छुटकी की हाजमोला खत्म हो गई थी अगर तुम्हारे घर रुक जाती तो बाजार बंद हो जाता और शाम को फिर तुम मुझसे लड़ती। छुटकी उनकी तरफ देखकर बोली, तो पूरी बात बताया करो न। अब कब आओगी मेरी घर।

अम्मा ने कहा, कल आऊंगी।

कल पक्का? छुटकी ने सौदे मुहर लगाने के लिये एक बार फिर पूछा।

हां, कल पक्का! अम्मा ने भी करार पर मुहर लगा दी।

उस दिन अम्मा ने छुटकी से हाजमोला के पैसे नही लिये। उन पैसों का इस्तेमाल छुटकी ने अम्मा की दुकान पर टाॅफियाँ लेकर सबको बाँटने में किया। उस शाम सब टाफ़ियाँ बांटती छुटकी ऐसी लग रही थी जैसे उसे बरसों से बिछड़ा पुराना कोई दोस्त मिल गया हो। अम्मा भी बहुत खुश थी उन्होने उस दिन छुटकी को अपनी गोद में बिठाकर परियों की कहानी सुनाई। जब हम घर जाने के लिये तैयार हुये तो छुटकी ने अम्मा से अपना करार फिर दोहराया। अम्मा ने आने का वादा कर हमें विदा किया। हम घर चले आये और छुटकी रात भर अम्मा के आने की बातें करती रही। कभी वह कहती कि सबसे पहले अम्मा को भगवान जी का कमरा दिखायेगी तो कभी यह तय करती कि अम्मा को अपने कमरे में लायेगी और परियों जैसे कपड़े पहनने वाली अपनी गुड़िया से मिलवायेगी। कभी यह बताती कि जब अम्मा कल आयेंगी तो उन्हें छत पर ले जाकर भूत वाला कमरा दिखाकर डरा देगी या कभी उन्हें यह बतायेगी कि मम्मी ने हमसे इसलिये झूठ बोला था क्योंकि हमारी मुंडेर कमजोर है। फिर उन्हें पीछे बहने वाली नहर दिखायेगी। अपनी बातें करते करते छुटकी को कब नींद आ गई, न मुझे पता चला, न छुटकी को।

सुबह पिता जी ने जैसे ही भगवान की पूजा शुरु की हम उठ गये। पिता जी पूजा करते वक्त जो घंटी बजाते थे वह हमारे लिये अलार्म का काम करती थी। हम उठे और नहा धो कर स्कूल चले गये। छुटकी उस दिन घर जाने को जितना आतुर थी उतना पहले कभी नहीं रही। घर पहुँचकर वह अम्मा का इंतजार करने लगी। अम्मा का दिखाने के लिये उसने अपनी गुड़िया भी निकाल कर रख ली। कभी वह घड़ी देखती तो कभी दौड़कर दरवाजे तक जाती और गली के उस मोड़ को निहारती जहां से मुड़कर अम्मा की दुकान आती थी। हर एक सेकेंड के साथ छुटकी का इंतजार और लम्बा हो जाता। दिन ढलता गया लेकिन अम्मा नहीं आई। मम्मी ने छुटकी को होमवर्क पूरा करने के लये कहा तो वह उदास मन से कमरें में चली गई। मैं उसकी उदासी को समझ गया और उसके पीछे पीछे कमरें में पहुंचा और छुटकी के पास जाकर बैठ गया। छुटकी ने मेरी तरफ देखा और बोली, अम्मा क्यों नहीं आई, भईया? मैंने समझाने के अंदाज में जवाब दिया, शायद कोई काम आ गया होगा या फिर बकरी परेशान कर रही होगी। तो थोड़ी देर के लिये आ जाती। छुटकी ने अपना तर्क दिया। इस बात का कोई जवाब तो नहीं था पर उदास बहन को समझाने के लिये कह दिया, शायद हम जब स्कूल गये थे तब आई होगी। धत्त! मैं भी उल्लू हूं भाई कल उन्हें बताकर आना चाहिये था न हमें कि हम स्कूल से आ जाये तब आना बेचारी आई होगी और चली गई होगी। छुटकी अपनी पेंसिल को अपने माथे पर मारती हुई बोली। छुटकी को अब अपनी गलती पर ज्यादा भरोसा हो रहा था। उसे समझाने के लिये जो तर्क दिया गया था। वह अब नयी परेशानी बन गया था। मैंने जब उसे यह भरोसा दिला दिया कि जब तुम्हारा होमवर्क हो जायेगा तब दोनों मम्मी से पूछेंगे कि अम्मा आई थी या नहीं और उसके बाद उनकी दुकान पर चलेंगे। तब जाकर कहीं बात बनी। अपना होमवर्क खत्म करके छुटकी ने मम्मी की ओर दौड़ लगाई जो उस वक्त किचिन में काम कर रही थी। छुटकी ने अपनी परेशानी जाहिर करते हुये पूछा, मम्मी क्या अम्मा आई थी? कौन अम्मा? मम्मी ने सवाल के जवाब में सवाल कर दिया। वही दुकान वाली अम्मा, जो उस दिन बाहर से निकली थी, छुटकी ने उतनी ही मासूमियत से जवाब दिया। नहीं, कोई नहीं आया था। मम्मी ने छुटकी की ओर बिना देखे जवाब दिया। छुटकी ने मेरी ओर देखा। मैंने मम्मी से पांच रुपये मांगे। मम्मी ने दस का नोट थमाकर बाकी के वापस देने की बात कही। मैंने हां में सर हिलाया और छुटकी को इशारा किया।

हम दोनों दुकान जाने की बात कहकर घर से निकल गये। तेज कदमों की चाल के साथ हम दुकान पर पहुंचे अम्मा बकरी को चारा डाल रही थीं। छुटकी ने पूछा अम्मा क्यों नहीं आई मेरे घर? बस आने वाली थी मगर बकरी को कौन देखता तो सोचा कि तुम तो आओगी ही, इसलिये नहीं आई। तो बोला क्यों था? छुटकी ने नाराजगी जताते हुये कहा। चलो कल पक्का आऊंगी। अम्मा ने भरोसा दिलाया। छुटकी ने हाजमोला लिया और अंदर कद्दू की बेल देखने पहुंच गई। उस  शाम को घर पहुंचने हमें थोड़ी देर हो गई। मुहल्ले का एक बच्चा आया और बोला, छुटकी तुम्हारी मम्मी तुम्हें बुला रही है। हम अम्मा की कहानी बीच में छोड़कर नहीं जाना चाहना चाहते थे। मगर अम्मा ने वादा किया कि आज की छूटी कहानी कल पूरी करेगी। तब हम घर पहुंचे तो देखा मम्मी दरवाजे पर परेशान खड़ी थी। रोज मम्मी के पास बैठने वाली मुहल्ले की दूसरी औरतें भी खड़ी होकर हमारा इंतजार कर रही थी। मेरे देहरी पर कदम रखते ही मम्मी ने मुझे एक झापड़ रसीद कर दिया। यह देखकर छुटकी कांप गई।

"कहाँ गये थे?" मम्मी ने पहला सवाल किया।

"अम्मा की दुकान पर" मैंने सिर नीचा झुकाये जवाब दिया। छुटकी मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई।

"इतना वक्त लगता है क्या? कल से कहीं नहीं जाओगे तुम दोनों। घर रहोगे। बहुत आवारा हो गये हो तुम।" मम्मी ने हिदायत दी।

इसी बीच एक औरत बोली, "अरे छुटकी की मम्मी, उस बेचारी के कोई औलाद नहीं है तो बच्चों से खास लगाव है उसे। इसलिये दुकान के बहाने मन बहला लेती है। अकेली रहती है। बेचारी खाने को मोहताज है।"

मम्मी उस महिला की तरफ पलट कर बोली, "नहीं! ये दोनों बहुत बिगड़ गये है। उसका घरवाला नहीं है क्या?"

उसने कहा, "नहीं, बेचारे को टीबी थी। दो साल पहले गुजर गया। तब से अकेली रहती है।"

"उसे भी है क्या?" मम्मी ने सवाल किया।

"पता नहीं" मम्मी को जवाब मिला।

मम्मी यह सब सुनकर हमें अंदर ले आई। बाहर बैठी भीड़ चली गई। मगर मम्मी अपनी बात से नहीं पलटीं और उस दिन से हमें पैसे मिलना बंद हो गये। हमें जो चाहिये होता वह पिता जी ले आते। शाम को घूमने के नाम पर मम्मी हमें अपने साथ नहर के किनारे वाली सड़क पर ले जाती। नहर जाने का रास्ता अम्मा के दरवाजे के सामने से निकलता था। इसी बहाने रोज मैं और छुटकी अम्मा को देख लेते। कुछ दिनों बाद अम्मा भी अपनी बकरी लेकर हमारे पीछे आ जाती और नहर के पास बैठकर हमें देखती रहती। शायद उन्हें दूसरे बच्चों से पता चल गया था कि हमें पाबंद कर दिया गया था। पता नहीं कौन सा डर मम्मी के दिल में समा गया था। मम्मी ने पहले कभी भी ऐसी पाबंदी हम पर नहीं लगाई थी। धीरे धीरे दिन छोटे होने लगे। सर्दियां बढ़ गई। अब मम्मी थोड़ा पहले घूमने निकलने लगी। मगर अम्मा का पीछे से आना बंद नहीं हुआ। दिसंबर की शुरुआत थी ठंड अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। पिता जी हमारे खेलने के लिये फुटबाल लाये थे। उसे लेकर हम रोज नहर के किनारे खेलने जाते थे। एक रोज नहर से लौटते वक्त अम्मा पीछे पीछे हमारे घर चली आई और दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई। उन्होने आवाज लगाई, छुटकी की मम्मी। छुटकी और मैं उनकी आवाज सुनकर बाहर पहुंच गये। मगर इस बार छुटकी की हिम्मत नहीं हुई कि अम्मा से कहे कि आओ अम्मा, आपको परियों के कपड़े वाली गुड़िया दिखानी है। मम्मी भी आकर खड़ी हो गई। अम्मा थोड़ा झुकी और बोली, छुटकी की मम्मी अगर कोई पुराना कंबल हो तो दे दो।

मम्मी ने कहा, देख लूंगी। हुआ तो दे देंगे।

अम्मा शायद कुछ और कहना चाहती थी लेकिन मम्मी ने हमें खींचकर दरवाजा बंद कर दिया। आज कंबल मांगने आई है कल इसी बहाने तुम लोग फिर जाने लगोगे। मैं नहीं दूंगी इसको कंबल। मम्मी का यह रवैया हमें पसंद नहीं आया। न तो अम्मा ने फिर कंबल को कहा न मम्मी ने उन्हें कोई कंबल दिया। मगर अम्मा का हमें नहर के किनारे देखने आना बदस्तूर जारी रहा।

दिसंबर के आखिरी हफ्ते में गला देने वाली सर्दी की एक शाम मैं और छुटकी नहर के किनारे फुटबाल खेल रहे थे। अम्मा दूर बैठी हमें देख रही थी और मम्मी पास बनी एक मुंडेर के किनारे खड़ी थी। तभी फुटबाल के पीछे भागते छुटकी का पैर फिसला और वह फिसल कर नहर में जा गिरी। मैं और मम्मी नहर की तरफ भागे। छुटकी ठंडे पानी में गोते लगा रही थी। मम्मी चिल्लाईं, "अरे मेरी बेटी डूब रही है"। बचाने को लोग दौड़ते इससे पहले पानी में कुछ और गिरने की आवाज आई। यह अम्मा थी। अम्मा धीरे धीरे तैरते हुये छुटकी की ओर बढ़ी और उसे थाम लिया। अपनी छाती से चिपका कर अम्मा उसे लेकर किनारे की ओर बढ़ी। मम्मी बदहवास हालात मे लगातार रोये जा रही थीं और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? अम्मा किसी तरह उसे सड़क पर लेकर आई और मम्मी के हाथों में थमा दिया। छुटकी एकदम ठंडी पड़ चुकी थी और बेहोश थी। मम्मी उसी बदहवास हालत में छुटकी को लेकर हाॅस्पिटल भागी। डाॅक्टरों ने पांच इंजेक्शन देकर उसे बचाया। पिता जी भी आ गये और हम छुटकी को लेकर घर आ गये।

रात बहुत हो चुकी थी। पिता जी के आॅफिस वाले छुटकी को देखने के लिये आये। जब तक वो गये आधी रात बीत चुकी थी। छुटकी अब होश में तो थी मगर काँप रही थी। मम्मी रात भर उसे अपने सीने से लगाये बैठी रही। सुबह जब छुटकी की कुछ ठीक हालत हुई तो मम्मी ने उसे गर्म रजाई में लिटा दिया और अलमारी से एक मोटा मखमल का कंबल निकाल कर मुझे देते हुये कहा, जाओ ये अम्मा को दे आओ। मैं एकदम खुश हो गया कि इतने दिनों बाद मम्मी ने अम्मा के घर जाने के लिये बोला है। मैं दौड़ा अम्मा के घर पहुंचा तो उनका दरवाजा बंद था। थोड़ी देर आवाज लगाई मगर अंदर से कोई जवाब नहीं आया। तो वापस आकर मम्मी को बताया। मम्मी ने छुटकी पर शाॅल डाला और उसे गोद में लेकर मेरे साथ चली आई। पिता जी भी पीछे से आ गये। पिता जी ने भी अम्मा को जोर जोर से आवाज़ें दीं। मगर इस बार भी कोई जवाब नहीं आया धीरे धीरे लोग जुटने चालू हुये और फैसला हुआ दरवाजा तोड़ दिया जाये। दरवाजा तोड़ा गया। हम अंदर गये तो देखा दरवाजे की आवाज से बकरी ने सारी दुकान फैला दी थी और अम्मा की चमकती आंखे पथरा गई थी और उनके शरीर पर कमर तक एक पतला जूट का कंबल पड़ा था।