नमस्कार का चमत्कार - व्यंग्य

-समीर लाल ’समीर’


कुछ लोग नमस्कार करने में पीर होते हैं और कुछ नमस्कार करवाने में। नमस्कार करने वाले पीर, चाहे आपको जाने या न जाने, नमस्ते जरुर करेंगे. कुछ हाथ जोड़ कर और कुछ सर झुका कर, शायद उनको मन ही मन यह शान्ति प्राप्त होती होगी कि अगले को नमस्ते किया है और उसने जवाब भी दिया है, याने वो पहचानने लगा है और साथ वालों पर उसकी पहचान की धाक पड़ेगी।

नमस्कार करवाने वाले पीर, सीधे चलते चलते, इतना स्टाइल में धीरे से सर को झटकते हैं और कभी कभी सिर्फ आँख को कि मानो आपको नमस्ते कर रहे हों और जब आप पलट कर नमस्ते करते हो तो इतनी जोर से जवाबी नमस्ते करते हैं जैसे कि पहल आपने की हो। अक्सर वो अपनी वापसी नमस्ते के साथ हाल भी पूछते नजर आ जाते हैं कि कैसे हो? और बिना जबाब सुने आगे भी बढ़ चुके होते हैं अगले नमस्ते के इन्तजार में। इस केटेगरी में नेता बनने की पहली पायदान पर खड़े बहुतेरे शामिल रहते हैं और उससे ऊपर की पायदान वाले तो इसी पायदान से गुजर कर निकले हैं तो उनकी तो खैर आदत हो गई है।

वैसे नमस्कार, प्रणाम, चरणस्पर्श आदि पहले कभी आदर, अभिवादन के सूचक रहे होंगे किन्तु समय के साथ साथ मात्र पहचान और नाम जमाने की औपचारिकता मात्र रह गये हैं। नेताओं को उनके चेले इतनी तत्परता से चाचा कह कर चरणस्पर्श करते हैं जितनी जोर शोर से उन्होंने अपने चाचा की तो छोड़ो, कभी अपने पिता जी का भी न किया होगा।

इन नेताओं के चेलों को भी पता होता है कि चाचा को चरणस्पर्श करवाना कितना पसंद है। अतः जब आप जैसे किसी को उनसे मिलवाने ले जाते हैं तो आपकी रीढ़ की हड्डी का जाने कौन सा हिस्सा, चाचा से मिलवाते हुए, पीछे से दबाते हैं कि आप थोड़ा सा झुक ही जाते हो और चाचा, एकदम से, खुश रहो के आशीष के साथ पूछते हैं, "बोलो, काम बोलो, कैसे आना हुआ?"

और इन सबके आगे एक जहाँ और भी याद आता है। पहले हम किसी को पसंद करते थे और पसंद पसंद करते प्यार कर बैठते थे। याने किसी को लाइक करना लव करने की पहली पायदान होती थी.. तब के जमाने में लड़का लड़की को, लड़की लड़के को लाइक करके धीरे-धीरे लव तक का सफर पूरा किया करते थे। अब तो खैर लड़का लड़की का फार्मूला भी आवश्यक न रहा। कोई भी किसी को लाइक करके लव तक का सफर कर सकता है।

ये सब दुनियावी बातें अब सड़क से उठकर इन्टरनेट पर आ पहुँची है मगर व्यवहार वैसा का वैसा ही है। मगर यहाँ लाइक, मात्र लव का गेट वे न होकर नमस्कार, प्रणाम और चरण स्पर्श आदि सबका पर्याय बन चुका है।

फेसबुक पर यदि कोई आपकी फोटो को, लिखे को या पोस्ट को लाइक करे तो कतई ये न समझ लिजिएगा कि उसे आप बहुत पसंद आ गये... आपका फोटो फिल्म स्टार जैसा है और आपका लेखन बहुत उम्दा है... इनमें से अधिकतर ने तो ऊपर बताई किसी एकाध वजह से पसंद किया होता है और वो भी चूँकि फेसबुक एक क्लिक मात्र में लाइक करने की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है - बस इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। अन्यथा यदि लिखकर बताना होता कि आप को लाइक किया है तब देखते की कितने सही में लाइक करते हैं।

अब आप ही देखिये, वो तो एक एक करके सौ जगह पसंद बिखरा कर चले गये मगर इन सौ लोगों ने जब पलट नमस्ते में इनकी तस्वीर या पोस्ट लाइक की, तो वहाँ एक साथ सौ लाइक दिखने लगे और जनाब हो लिए सेलीब्रेटी टाईप। ऐसे लोग आपको लाइक करने तभी आते हैं जब इन्होंने अपनी टाईम लाईन पर कुछ नया पोस्ट किया हो और उन्हें लाइक की दरकार हो।

इनका संपूर्ण दर्शन मात्र इतना है कि मैं तेरी पीठ खुजाता हूँ, तू मेरी खुजा! किसी ने ठीक ही कहा है कि दुःखी की आह और मूर्ख की वाह सब भस्म कर देती है लेकिन करें तो करें भी क्या जो इन फेसबुकिया लतियों को इन लाइकों से वही ऊर्जा प्राप्त होती है जैसी इन फूहड़ चुटकुलेबाज कवियों को तालियों से, इन छुटभईया नेताओं को भईया जी नमस्ते से और इन सड़क छाप स्वयंभू साहित्यकारों को सम्मानित होने से भले ही उस सम्मान को कोई जानता भी न हो।

आप देख ही रहे हैं कि आपसे ऊर्जा प्राप्त किए इन कवि सम्मेलनों की हालत, इन छुटभईए नेताओं की हरकतें और साहित्यिक सम्मानों के नाम पर गली-गली खोमचेनुमा दुकानें। ध्यान रखना, यह समाज के लिए कतई हितकर नहीं है।

तो जरा संभलना, जहाँ फेसबुक पर लाइक करना एक लत बन जाती है वहीं यह अपने आपको सेलीब्रेटी सा दिखाने का नुस्खा भी है। इसका इस्तेमाल अपने विवेक के साथ करें वरना इस लत से आपका जो होगा सो होगा मगर समाज का ये स्वयंभू सेलीब्रेटी बंटाधार करके रख देंगे।