रंग - लघुकथा

शोभा रस्तोगी 


छोटी टोकरियों में मस्ता रहे थे गुलाब, मज़ार के बाहर, हरी पत्तियों के साथ। एक बड़ी डलिया और पॉलीथीन से भी झांक रहे थे। एक छोटी डलिया के लिए मैंने बीस रूपए का नोट आगे कर दिया और एक बेहद कच्ची कोमल कलाई ने डलिया थमा दी। जो उठी मेरी नज़र तो उठी रह गई। सरकारी स्कूल की पोशाक में, हरे रंग का कपड़ा सर पे ढाँपे, नादां उम्र की समझदार बच्ची बतियाती आँखें लिए कुछ सिक्के लौटा रही थी मुझे। उसके निर्दोष चेहरे पर संझा-बाती उग आई थी ।
ओह! ये तो मासूम सपनों का क़त्ल है!-- स्वयं से बुदबुदाते हुए उससे पूछ बैठी; 'क्या नाम है तुम्हारा?'
'फिरदौस।'
'रोज बैठती हो यहाँ?'
'नईं आंटी, सिर्फ वीरवार को।'
'बाक़ी दिन ?'
'सोम, मंगल सिबजी, हलमान जी, और सुक्कर लछ्मी जी के मंदर के बाहर...'
उसकी बात पूरी भी न हो पाई थी कि मेरा प्रश्न कूद पड़ा, 'मुसलमान होकर मंदिर के बाहर?' सांप्रदायिक दंगे याद आने लगे मुझे।
'लाल चुन्नी ओढ़ लेती ऊं न।' वह मुस्कुराकर बोली।
'और नाम?'
'पूजा।' उसने सहज भाव से कहा। किसी सवाल का जवाब देते हुए उसके चेहरे पर संशय, परेशानी, डर की कोई लपट-अपट नहीं थी। सपाट, स्पष्ट, निर्द्वन्द। मुझे यूँ ही खड़ा देख बोली, 'जेई कमाई से हमार घर चले है आंटी। नाम का का है। बस दिखना चहिए। सो मज़ार पे हरा, मंदिर पे लाल।'
उसका जवाब याद करके मैं आज भी उन तमाम हिन्दू-मुस्लिम की सोच पर हैरान रह जाती हूँ जो लाल-हरे के फेर में कितना ही लाल रंग बहा देते हैं।