दाल, विलायती और पिरेम की विकास यात्रा - व्यंग्य

- लालित्य ललित

कहते है, दाल महंगी हो जाने से समाज के एक तबके ने महल्ले में हंगामा मचा दिया है, देखो न सरकार को, क्या अंधेरगर्दी आ गई है, अब तो न तो जी सकते है भाई साब और न ही मर सकते है। मैंने कहा इसमें मरने वाली बात कहाँ से आ गई, अभी आप की उम्र ही क्या है, भाभी जी का क्या होगा, आप के बच्चों को कौन पालेगा, इतना बड़ा काम धंधा कौन संभालेगा? एक सांस में मैं इत्ता कुछ कह गया था।
सुनकर श्रीमान जी अत्यंत विनम्र भाव से बोले
- देखिये मैं जिस पार्टी से जुड़ा हूँ ,उसका मोट्टो  है 'हर हाल में देश का विकास करना है', अब दाल थोड़ी बहुत महँगी  हो भी गई तो चिरकुट चिल्लाने की क्या आवश्यकता है, कौन से सरकार ने आपके फीते खोल दिए! कौन सी आपकी जमीन अपने नाम  लिखवा ली!  विकास की प्राथमिकता सर्वोपरि है। देखिये न हमारे नेता जी, दुनिया भर में दौरे कर रहे है, अपने मुल्क को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं, और एक आप है जो अभी भी दाल -भात में अटके हुए है। नेताजी नवरात्रों में केवल जल का प्रयोग  कर रहे है, अन्न का त्याग किया हुआ है, किसकी खातिर? आपकी खातिर ना। एक आप है जो सारा -सारा दिन जलूस निकालने में अपनी एनर्जी वेस्ट कर रहे है, कोई काम धंधा है कि नहीं। बात करवा लो। आप कुछ सीखिये उनसे कि उनकी प्राथमिकता क्या है।

बात आई गई हो गई। जीवन लीला में हमेशा की तरह मस्त हो गए, आखिर उनके बस का था भी क्या। लेकिन जो देश का  मुद्दा था, आखिर देश का मुद्दा था, देश के  विकास की बात थी जिसे हर कीमत पर होना ही होगा, अपने बच्चों को रोजगार मिलेगा, लड़कियों को काम धंधा मिलेगा, पक्के मकान मिलेंगे, हर घर में रौशनी होगी, साफ और मीठा पानी  मिलेगा, खाली  दिमाग शैतान का घर होता है, दो पैसे घर आएंगे तो माँ -बाप भी खुश होंगे। कम से कम औलाद अपना खर्चा तो निकाल ही लेगी। बात में दम था। बात भीतर तक घुस चुकी थी, पैसे आने लगें तो किस को दुखते हैं भला!

लेकिन विकास का मुद्दा था, जो प्रेमिका के भी गले की फांस बन चुका था, प्रेमी अपने तीर चलाता उससे पहले ही प्रेमिका कह देती - देखो यह तुम्हारी लक्ष्मण रेखा है, तुम मुझे निहार सकते हो पर नो छूना-वूना। वर्ना मैं नाराज हो जाउंगी और ज्यादा बदमाशी की तो वोह देखा है न सामने हवा में लहराता हुआ डंडा पुलिस अंकल का... उनसे मदद ले लूंगी।

बात लौंडे को समझ में आ गई थी। क्योंकि जब पीठ पर डंडा पड़ता है तो इश्क ऐसे गायब हो जाता है जैसे पंसारी की दुकान  में सोमवार को मिटटी का तेल आया और दस मिनट में टैंकर खाली। केवल निहारने विहारने से वह बाज आने वाला नहीं था। वह नए ज़माने का आशिक था, समझता था अब जमाना पोस्टकार्ड का नहीं, वाट्सअप का है। छूने का नहीं आगे को कुछ कर गुजरने का है। बिचारा मायूस हो कर लौट गया। उसका विकास अभी नहीं हुआ था, उसके अरमान कलेजे में ठन्डे हो कर किसी सरकारी फ़ाइल की तरह किसी अँधेरे कमरे में शोभायमान हो गए। कब काम धंधा मिलेगा और कब उस का मार्ग प्रशस्त होगा।यह तो उसका दिल जानता था और विकास पुरुष। कितने आवेदन किये ,पर कोई नियुक्ति पत्र भेजे तब न।  जोहता इलाके का लौंडा अब पगला गया था। सोचता था ख़ुदकुशी कर लूँ, जहर खा लूँ, एकाध बार ट्राई भी किया पर मिलावट होने से बच गया।

इलाके के विलायती राम चमनलाल के लौंडे बिट्टू को इस कदर परेशान देख भीतर से तो खुश थे कि आजकल लौंडा अपनी बाइकिया पर पिनपिनाता घूम नहीं रहा, जरूर प्रेमिका ने हाथ नहीं लगाने दिया होगा या बाप ने उसकी बाइकिया के लिए पैट्रोल नहीं दिया होगा। विलायती का मन पसीज गया, आखिर वह भी तो विकास का हिमायती था, अब चाहे विकास पूंजीपति का हो या किसी का पति बनने  के इच्छुक अभ्यर्थी का। आखिर बचवा तो अपने महल्ले का ही है, अब जे प्यार नहीं करेगा तो बताइये क्या हम आप करेंगे। अल्ला कसम अब तो अपनी उम्र ऐसी रही नहीं कि मुंह में रख कर अखरोट पट  से तोड़ दे, अब तो किशमिश को भी पपोलना पड़ता है तब कहीं जा कर वह आत्मसमर्पण करती है, देखिये क्या दिन आ गए! अब लौंडा अपना विकास करना चाहता है तो हम रोकेंगे थोड़ा न। चल बेटा, कर ले विकास। आखिर हमारे विकास पुरुष का भी यही सपना है। युवाओं को आगे बढ़ना ही होगा।

विलायती ने लौंडे की दुखती रग पर हाथ रखा तो वह बरसाती मौसम की तरह बरस पड़ा - काम धंधा नहीं तो नहीं, नो छूना  और नो...
- बस  बेटा, कंट्रोल कर, आगे की स्टोरी अपन ने सोच ली कि तेरे मन के कोने में हाई फीवर का करंट दौड़ रहा है अगर इसको प्यार की टेबलेट नहीं मिली तो इश्क की प्लेटलेट्स नीचे आनी शुरु हो जाएंगी।

इलाके के सभी अनुभव प्राप्त लोग एकजुट थे कि बच्चे का विकास तो महल्ले का विकास, और महल्ले का विकास तो देश का विकास। हम किसी भी कीमत में विकास चाहते है। सारा महल्ला अब कुछ कर गुजरने की इच्छा रखता था। लोगों को इस लव स्टोरी में मजा आने लगा था। सच बात यह आजकल ऐसे धाकड़ स्टोरी मिलती कहाँ हैं।

सब ने बात की गंभीरता को समझा और लौंडे को कोयले की टाल पर लगवा दिया, दस  हजार रूपया वेतन, रहने को  खोली, बगल में फोन, आस पास  हलवाइयों के ऑर्डर को पूरा करने की लौंडे से गारंटी ले ली थी कि काम से जी नहीं चुराएगा, लौंडिया को प्यार करेगा। विकास करेगा, अपना भी। बिंदिया खुस थी, प्रेमी को काम मिला और उसकी शक्ल में उसको मिला अपना वर। ऐसा कर विलायती ने आज सचमुच एक बड़ा काम कर दिया था।

मैं न कहता था कि हमारी पार्टी विकास चाहती है। नवरात्र खतम हो गए, प्याज की कीमत रास्ते पर आ गई। लोगों ने दाल को कुछ दिन के लिए खाना छोड़ दिया था। एक रपट ने बतलाया था कि इस विशेष दाल को खाने से एक लाइलाज रोग होने की सम्भावना है, ऐसा एक रिसर्च में पता चला और जब तक रिपोर्ट नहीं आ जाती आम जनता से परहेज रखने की बात कही गई है। 

जनता परहेज रख -रख कर हार गई। लेकिन पाण्डेय जी की विकास यात्रा उठान पर है आखिर हमारे महल्ले के युवा विकास पुरुष जो हैं, आजकल विकास का ही ज़माना है, आप तो सब जानते ही है। आप से कौनो बात छुपी है क्या! वैसे बाई दवे  एक किलो प्याज मेरे लिए भी ले आना, घरवाली ने कहा है आज तरकारी बनानी है, बहुत दिन हुए इंडी -भिन्डी खा कर। अब कुछ जायका बदला जाए। तो भूलियेगा नहीं, प्याज एक किलो ले आना शाम को।
संपर्क- लालित्य ललित,बी -3/43 ,शकुंतला भवन,पश्चिम विहार,नई  दिल्ली-110063