कुछ कह रहा सम्पादक भी ...

प्रिय साथियों,

'सेतु' के प्रथमांक को आपका जो प्यार और समर्थन मिला उससे मन में एक विश्वास जागा है कि आप अपनी इस पत्रिका को इसके मन्तव्य की पूर्ति के लिए स्नेह और समर्थन देते रहेंगे।

पिछले कुछ महीनों से दुनिया का जो हाल हो रहा है वैसा निश्चित रूप से पहले कभी नहीं रहा, और ऐसे समय में सेतु की जिम्मेदारी समाज के प्रति और भी बढ़ जाती है। यह आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ तकलीफदायक और शर्मनाक भी है कि कैसे कुछ पुरातन साहित्यिक ग्रंथों को कुछ मूढ़ों ने इतना अधिक अपना लिया है कि उसे शब्दशः सत्य प्रमाणित करने के क्रम में इंसानों की जान लेने-देने से भी नहीं चूकते, जबकि साहित्य का मूल तो संवेदनशीलता है। चाहे वह धर्म हो या कर्म, कट्टरता ने जहाँ बसेरा कर लिया वहाँ विनाश के अतिरिक्त और कोई भविष्य नहीं दिखाई देता। मगर हम कितनी ही बार यह दोहराते रहें पर जिन्हें नहीं समझना वो नहीं समझेंगे।
इस सबके बावजूद हमें घृणा और क्रोध को प्रेम और सहिष्णुता हावी न होने देने के हर संभव प्रयास करते रहना है।

इस बारे में एक बार लखनऊ में मनीष शुक्ल जी द्वारा सुनाई गई एक छोटी सी कहानी याद आती है कि ऐसा क्यों करना है। 'एक जंगल में अन्य पशु-पक्षियों के साथ एक चिड़िया रहती थी। जिस वक़्त चिड़िया घोंसले में अपने अण्डों में से बच्चों को इस दुनिया में लाने के प्रयासों में लगी थी, उन्हीं में से एक दिन जंगल में भयानक आग लगी। आग ऐसी थी कि शायद ही कुछ बचता। चिड़िया उस वक़्त कहीं दूर से दाना चुगकर लौट रही थी, उसे समझते देर न लगी कि जल्द ही यह आग वहाँ तक भी पहुँचेगी जहाँ उसका घोंसला है। यह देख वह पानी की तलाश में दौड़ी, कुछ मील दूर उसे एक तालाब दिखाई पड़ा। वह नन्हा जीव अपनी चोंच में पानी भरता और जंगल की ओर उड़ान लेता, इस तरह घंटों की कोशिश के बाद कुछ बूँदें जंगल की आग पर पड़ीं, जिनसे न कुछ होना था और ना ही हुआ। चिड़िया को देखकर सुरक्षित ठिकाने पर पहुँच चुके एक अजगर ने कहा 'ऐ री चिड़िया! तू पगला तो नहीं गई? तुझे क्या लगता है कि तेरे इतने से पानी से यह दावानल शांत होगा!'
चिड़िया ने मासूमियत से जवाब दिया कि 'ठीक कहा दोस्त, मैं जानती हूँ कि यह जंगल कभी नहीं बचेगा लेकिन आज से दशकों या सैकड़ों साल बाद जब इस ज़मीन पर दोबारा जंगल उगेगा और पुराने जंगल के बारे में कहानियाँ कहीं जाऐंगीं, तब उस वक़्त मेरा नाम जंगल के भस्म होते समय तमाशा देखने वालों में नहीं बल्कि कोशिश करने वालों में गिना जाएगा। '

तो दोस्तों, प्रयास रहे कि भविष्य के पन्नों में हमारी कोशिश भी इसी तरह से जानी जाऐं। और फिर कौन जानता है कि यह दुनिया का दावानल न हो सिर्फ मामूली आग हो जिस पर कल को हम जीत पा लें।

आपने प्रथम अंक के लिए की गई हमारी मेहनत को सराहा इसने द्वितीय अंक आपके सामने रखने का हौसला दिया, उम्मीद है कि इस अंक को पढ़कर आप अपनी प्रतिक्रिया भी देंगे। धीरे-धीरे अगले अंकों में कमियों को कम करने में हम सभी लगे हुए हैं, बस आपका साथ इसी तरह बना रहे।

सप्रेम आपका,
दीपक मशाल