सेतु द्वितीयांक सम्पादकीय - अनुराग शर्मा

मित्रों,


ठीक एक महीने पहले सेतु का प्रवेशांक प्रस्तुत करते समय जहाँ मुझे असीम प्रसन्नता थी वहीं पाठकों की प्रतिक्रिया जानने की उत्कंठा भी थी। एक सप्ताह के अंदर मिले 12,000 पाठकों ने उस उत्कंठा को शांत तो किया ही, सेतु के अगले अनेक अंकों को सामने लाने का साहस भी प्रदान किया।  

सेतु द्वारा देश, काल और भाषा की विमाओं को जोडने का कार्य किया जा रहा है। अंग्रेज़ी के वैश्विक महत्व को कोई नकार नहीं सकता। पिछले दिनों में हिंदी संसार की सबसे बडी भाषा के रूप में उभरी है। सेतु में एक ओर हम संसार भर के लेखकों को आमंत्रित कर रहे हैं दूसरी और अनुवाद के द्वारा हिंदी और अंग्रेज़ी के विराट संसार के बाहर की अनेक भाषाओं को मिलाने के लिये भी प्रयासरत हैं। जहाँ वर्तमान लेखन के साथ इतिहास की धरोहर के उत्कृष्ट नमूने सामने रखने का प्रयास है वहीं अरसा पहले मॉरिशस, फ़िजी, वैस्ट इंडीज़ आदि सुदूर स्थलों को गये भारतवंशियों द्वारा समृद्ध किये हिंदी साहित्य की झलकियां भी सेतु के नये स्तम्भ "भारतवंशी" द्वारा समाहित की जायेंगी। इस शृंखला का आरम्भ इसी अंक से मॉरिशस की बहुभाषी कवयित्री व लेखिका वत्सला राधाकिसुन की रचनाओं से किया जा रहा है।

इस मास हिंदी साहित्य जगत ने नीलाभ अश्क और महाश्वेता देवी को खोया है। सेतु की ओर से दोनों विभूतियों को श्रद्धांजलि। 31 जुलाई को आधुनिक हिंदी के सबसे प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद का जन्मदिन भी है, उन्हें सेतु का नमन। 

डॉ सुनील शर्मा और दीपक मशाल की मेहनत और लगन द्वारा हम क्रमशः सेतु के अंग्रेज़ी और हिंदी संस्करणों के स्तर को बनाये रखने को प्रतिबद्ध हैं। जैसा कि मैंने पहले भी निवेदन किया था, कृपया सेतु के बारे में अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत कराते हुए हमारा उत्साह बढाने के साथ-साथ हमारी कमियों के बारे में भी बताते रहिये। साथ ही यदि आप आगामी अंकों में कुछ ऐसे विषयों के बारे में पढने के उत्सुक हैं, जो अभी शामिल नहीं हैं, तो हमें ईमेल या दाईं ओर लगे फ़ीडबैक फ़ॉर्म द्वारा अवश्य बताइये।