मरते दम तक थिएटर करना है - डॉ. सतीश पावड़े

प्रसिद्ध नाट्यकर्मी डॉ. सतीश पावड़े से आशीष कुमार की वार्ता
डॉ. सतीश पावड़े
आशीष – सर सबसे पहले यह बताइए कि आप नाटक/ रंगमंच के क्षेत्र में कैसे आए? साक्षात्‍कार से पूर्व जब आप पर मैं शोध कर रहा था तब पता चला कि आप अपने परिवार से पहले एैसे व्यक्ति है जो इस क्षेत्र में आए हैं।
सतीश पावड़े - आम तौर पर यह बात है कि मैं जिस समुदाय अथवा परिवार से रहा हूँ वह महाराष्ट्र के मराठा कम्‍युनिटी है जिसमें नाटक को बहत अच्‍छे दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता। नाटक देखना अलग बात है लेकिन काम करने के हिसाब से नहीं देखा जाता।

आशीष – आपका मतलब कैरियर के हिसाब से ...
सतीश पावड़े - नहीं...नहीं कैरियर की दृष्टि से तो दूर की बात है बल्कि नाटक में काम करने को ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। वहाँ माना जाता है कि नाटक तो शूद्र लोग करते हैं या नौटंकीबाज लोग करते हैं या फिर ये फालतु लोगों का काम है। या जो भ्रष्ठ हो गया या जो नालायक हो गया नाटक उनका काम है, ऐसी सोच वाले परिवार तथा समाज से मैं आया हूँ। जब मैं सातवीं / आठवीं में पढ रहा था तब वर्धा जिले में एक पुलगॉव नामक गॉव में मुझे पढ़ने के लिए घरवालों ने भेजा चूँकि मेरे पिताजी नौकरी के सिलसिले में धुलिया रहते थे तथा माताजी गॉव में रहती थीं।

आशीष – यह किस वर्ष की बात है? क्‍या आप बता पाएँगे कि आप किस वर्ष पुलगॉव आ गए थे?
सतीश पावड़े – मेरे ख्याल से यह 1973 या 1974 था जब मैं पुलगॉव आ गया था। मैं पुलगॉव जिस परिवार में आया वह एक मारवाड़ी फैमिली थी। वो दो भाई थे बढ़े भाई गोविंद चरखा तथा छोटे भाई गोपाल चरखा। वो दोनों भाई मिल में काम करते थे। पुलगॉव कॉटन मिल उस समय बहुत हीं अच्‍छा मिल था। गोविंद चरखा जी बहुत अच्‍छा गाते थे तथा नाटकों में भी काम करते थे और भजन मंडली में भी थे मतलब कलाकार किस्‍म के आदमी थे। छोटे भाइ्र गोपाल शिक्षक थे फिर पत्रकारीता में आ गए, वे बहुत अच्‍छा लिखते थे। मझे जहाँ तक याद आ रहा है इन दोनों भाइयों का मुझ पर बहुत- बहुत बहुत असर रहा है। क्‍योंकि पूछने पर मैं हमेशा बोलता था कि मुझे पत्रकार बनना है और मैंनें अपने कैरियर की शुरूआत भी पत्रकारिता से ही की है। जब मैं 11वीं / 12वीं में था तभी से गोपाल जी को देख – देखकर मैं भी रिर्पोट लिखने लगा। यानि मैं 12वीं में ही अखबारों के लिए रिपोर्टिंग करने लगा। तो कहने का तात्‍पर्य यह है कि उन दोनों भाईयों कें ब्‍लड रिलेशन में न होने के बावजूद भी उनसे बहुत सारी चीजें मुझे मिली जिसमें सही सोचने की क्षमता,  अच्‍छी लेखनी आदि महत्‍वपूर्ण है। तब यहाँ यह कहा जा सकता है कि पुलगॉव से ही मेरा रूझान नाटक की तरफ हो गया। वहीं से मैंनें कविता लिखने की भी शुरूआत की चूँकि वो दोनों भाई भी कवि थे। तो जब भी मुड़कर देखता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरे व्‍यक्तित्‍व पर उन दोनों भाइयों (गोविंद चरखा तथा गोपाल चरखा) का जबर्दस्‍त असर रहा है।

आशीष- यह बताइए कि नाटक से सबसे पहले आप किस रूप में जुडे पहले अभिनय से या किस क्षेत्र से?
सतीश पावड़े – मैंनें सबसे पहले अभिनय करने की कोशिश की। लेकिन इस क्षेत्र की कुछ जानकारी न होने के कारण तथा उम्र कम होने के कारण मुझे किसी ने कोई भूमिका (रोल) नहीं दी। पुलगॉव से 12वीं पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई हेतु मैं वर्धा आ गया। इस बीच मेरे पिताजी भी ट्रांसफर होके वर्धा आ गए थे तो फिर मैं भी वर्धा शिफ्ट हो गया। यहाँ पर कुछ एैसे दोस्‍त बने जो नाटक में काम करते थे। तब फिर कॉलेज लेवल पर हमनें सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में भागेदारी की। फिर सामाजिक गतिविधियों में रूझान की वजह से पथनाट्य (नुक्‍कड़ नाटक) से शुरूआत की। वर्धा से मैंनें पथनाट्यों में काम करना शुरू किया। आप समझ लीजिए की मेरी शुरूआत नुक्‍कड़नाटक से हुँई। फिर मैंनें कॉलेज में 1984 में एक नाटक भी लिखा तथा उसमें भूमिका भी की। उस नाटक का नामा था ‘श्रीहन ची इंडस्‍ट्री’’ माने पागलों की इंडस्‍ट्री। इस नाटक का निर्देशन भी मैंनें ही किया। फिर 1985 में स्‍वयंवर नाटक में मुख्‍य भुमिका की। फिर घर की जिम्‍मेदारी की वजह से 1985 में ही ग्रेजुएशन पुरी कर मैं लोकमत अखबार में नौकरी करने औरंगाबाद चला गया। फिर वहाँ जाने माने नाट्य निर्देशक प्रशांत देल्‍वी तथा चंद्रकांत कुलकर्णी जी के ग्रप ‘जिगिसा’ में काम करना शुरू किया। संयोग से प्रशांत देल्‍वी तथा चंद्रकांत कुलकर्णी जी उस समय लोकमत अखबार में ही काम करते थे। शाम को ड्युटी समाप्‍त हो जाने के बाद हमलोंग नाटक करते थे।

आशीष – शुरूआत में आप अभिनय, नाटक लेखन तथा निर्देशन तीनों करते थे लेकिन धीरे–धीरे आपसे अभिनय छुटता चला गया है इसकी कोई खास वजह?
सतीश पावड़े – जब मैं अभिनय, लेखन तथा निर्देशन में बराबर काम करने लगा तो अचानक एक दिन लगा कि मैं. निर्देशक के रूप में ही ज्‍यादा कम्‍फर्ट महसूस करता हूँ। मैं जो कहना चाहता हूँ या अभिव्‍यक्‍त करना चाहता हूँ उसके लिए यही माध्‍यम ठीक है। तब मैंनें पुरी तरह  निर्देशन में ही कानसंट्रेशन करना शुरू कर दिया।

आशीष – आप अध्यापन में कैसे आ गए?
सतीश पावड़े – 2008 में मैंने डॉ बाबा साहेब अंबेडकर मराठवाडा विश्‍वविद्यालय औरंगाबाद में असिस्‍टेंट प्रोफेसर के रूप में ज्‍वाइन किया। तब से फिर थिएटर/रंगमंच मेरा कैरियर बन गया ऐसा आप मान सकते हैं।

आशीष – अपनी रचना प्रक्रिया तथा निर्देशन शैली के बारे में विस्‍तार पूर्वक बताइए।
सतीश पावड़े - मैं लगातार पढते रहता हूँ यानि नाटकों का पठन–पाठन से मेरा जुड़ाव लगातार बना रहता है लेकिन जब तक कोई नाटक मुझे सोचने के लिए मजबूर नहीं करता तब तक मैं उसका चयन निर्देशन के लिए  नहीं करता। इसलिए आप देखेंगे कि मैं बहुत कम नाटक निर्देशित करता हूँ। नाटकों में भी मेरा रूझान चरित्रात्‍मक नाटक की तरफ अधिक है। बायोग्राफिकल नाटक करना मुझे पसंद है। इसलिए मैं बड़े–बड़े समाज सुधारकों पर नाटक लिखता हूँ। उनका निर्देशन करता हूँ। अर्थात उनके योगदान से जनता को या नई पीढी को अवगत कराता हूँ। चूँकि नई पीढी उस चरित्रों को भुलती जा रही है इसलिए प्रत्‍येक साल एक नाटक एैसे किसी एक महान विभूति के ऊपर करने का मेरा प्रयास रहता है। और ज्‍यादा से ज्‍यादा कोशिश होती है कि ऐसे नाटकों का मंचन ग्रामीण स्‍तर पर अधिक हो।

आशीष – यानि यहाँ यह कहा जा सकता है कि आपके लिए समस्‍या तथा चरित्र महत्‍वपूर्ण है। कथा वस्‍तु और शिल्‍प को आप उतना महत्‍वपूर्ण नहीं मानते?
सतीश पावड़े – वो बनते–बनते बनता है। जब मैं शिल्‍प की बात करता हूँ तो मेरे सामने आम दर्शक होता हैं। वहाँ मुझे अपनी बात पहूँचानी रहती है। वहाँ मैं कोई बिंब आदि इस्‍तेमाल नहीं करता। मैं केवल यह कोशिश करता हूँ कि कितनी आसानी से तथा ड्रामैंटिकली उन तक मेरा संदेश पहुँच जाए। मैं दो तरीके से काम करता हुँ। अभी जो मैंने बात की वह मेरे कमिटमेंट का थिएटर है। लेकिन इसी समयकाल में मैं प्रयोगात्मक मंच से भी जुड़ा हूँ। मेरी पीएच.डी. का विषय भी Absurd Theatre रहा है। मैं हमेशा अपने नाटकों में प्रयोग करता रहता हूँ। चाहे वह मेरी सोच, मेरे लेखन या मेरे निर्देशन में हो। अकादमिक स्‍तर पर मैं हमेशा प्रयोग करता रहता हूँ। इसलिए अकादमिक स्‍तर पर मैं 'प्रयोगशाला मंच' की परिकल्‍पना के अंतर्गत काम करता हूँ। 2008 से में एैसा काम करते आ रहा हूँ। क्‍योंकि इसके अंतर्गत आपको आजादी होती है कि आप उलत-पुलट कर सकते हैं। प्रयोग कर सकते है। लेकिन यह मैं केवल अकादमिक स्तर पर निर्देशन, लेखन आदि में करता हूँ। दूसरा मेरा एक पार्ट है जहाँ मैं एक जिम्‍मेदार लेखक और निर्देशक हूँ और मुझे आम पब्लिक तक बातें पहूँचानी होती है तो वहाँ मैं ज्‍यादा प्रयोग नहीं करता। वहाँ प्रयोग के साथ–साथ लोगों का प्रबोधन भी हो इसका मैं विशेष ख्‍याल रखता हूँ। यहाँ मैं कंटेंट पर विशेष ध्‍यान देता हूँ। कंटेंट साथ ऐसे प्रयोग भी करता हूँ जो आम दर्शक को आसानी से समझ में आ जाए।

आशीष – आप रंगमंच के सभी क्षेत्र में सक्रिय हैं। आप लेखक निर्देशक तथा अभिनेता तीनों रहे है। आप शिक्षक भी है। मूलत: अपने आपको क्‍या मानते हैं।
सतीश पावड़े - मैं कुछ भी नहीं हूँ, केवल एक रंगकर्मी हूँ। बाकी सब छोटी–छोटी बातें हैं।

आशीष – रंगमंच / रंगकर्म में प्रशिक्षण आवश्‍यक है?
सतीश पावड़े – जी। बिल्‍कुल आवश्‍यक है। मैं मानाता हूँ कि नाट्क प्रशिक्षण अत्‍यंत आवश्‍यक है एक कलाकार के लिए, निर्देशक के लिए, लेखक के लिए अथवा रंगमंच के किसी भी पात्र में काम करने के लिए।

आशीष – रंगमंच और सिनेमा माध्‍यम में आप क्‍या अंतर देखते है?
सतीश पावड़े – अंतर तो है एक वो माध्‍यम है जिसके साथ तकनीक जुड़ा है, बगैर तकनीक फिल्‍म कभी हो ही नहीं सकती और नाटक के लिए यह जरूरी नहीं है।

आशीष – एक साथ दोनों माध्‍यम में काम करना संभव है क्‍या?
सतीश पावड़े – बिल्‍कुल संभव है। यदि आप अपने आपको उस तरीके से ढ़ालने के लिए तैयार हैं। मेरे कई एसे दोस्‍त, गुरू तथा परिजन दोनों माध्‍यमों में एक साथ काम करते हैं।

आशीष – रंगकर्मियों का फिल्‍मों की तरफ पलायन कितना सही है। आपकी  दृष्टिकोण में?
सतीश पावड़े –  सर्वाइवल एक बहुत बड़ी समस्या है थिएटर में। तो यदि कोई थिएटरकर्मी ‘इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया में काम करने जाए तो इसमें क्‍या बुराई है? लेकिन यहाँ मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि दूसरे माध्‍यम में जाकर रंगमंच को भुले नहीं इसके लिए भी समय निकालें। थिएटर में भी अपनी निष्‍ठा बनाए रखे।

आशीष - क्‍या यह पलायन नहीं है कि आप प्रशिक्षण रंगकर्म में लेकर टेलीविजन में काम करने चले जाते है? रेलवे तथा अन्‍य सरकारी दफ्तरों में क्लर्क का काम करते हैं? आदि।
सतीश पावड़े –  बिल्कुल। मैं इसे पलायन मानता हूँ। लेकिन तब जबकि आप किसी भी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाकर थिएटर को भूल जाए तब। मेरा कहना है कि कैरीयर / अर्थोपार्जन की दृष्टि से आप कुछ भी करिए लेकिन थिएटर भी करीए। करते रहिए तो यह पलायन नहीं होगा।

आशीष – आपने फिल्‍म निर्देशन भी किया है। किस तरीके की फिल्‍में आपने बनाई है?
सतीश पावड़े –  मेरा रूझान डाक्‍युड्रामा की ओर अधिक रहा है जिसका उपयोग मैनें डाक्‍युमेंट्री के लिए किया। मैनें जितने भी डाक्‍युमेंट्री बनाए वो डाक्‍युड्रामा शैली में बनाए। एक आम फार्मेट जो होता है, डाक्‍युमेंट्री का, उससे बाहर निकलकर मैंनें काम किया है। दूरदर्शन, नागपुर के लिए फिल्‍मों का निर्देशन किया। प्रेमचंद की नौ कहानियों को लेकर एक धारावाहिक बनाई थी। जो मराठी भाषा में थी। महाराष्‍ट्र सरकार के लिए भी बहुत सारी छोटी फिल्मों का निर्देशन किया।

आशीष – आपको सरकारी तथा गैर सरकारी क्षेत्रों से बहुत सारे अवार्ड मिले हैं जिसकी एक लंबी सूची है। यह बताइए कि इन पुरस्‍कारों का आपकी रचना प्रकिया पर क्‍या असर पड़ता है?
सतीश पावड़े –  फर्क एक ही है कि फिर जिम्‍मेदारी बढ़ जाती है। और हमेशा कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती है।

आशीष – आपके रंगकर्म का क्‍या उद्देश्‍य है?
सतीश पावड़े –  एक वाक्‍य में तो नहीं कहा जा सकता। अगर रंगकर्म मेरी अभिवयक्ति का माध्‍यम है ते मेरे जीने का कारण ही रंगमंच है। और दूसरी बात मेरे जीने उध्‍देश्‍य ही रंगमंच है ते मैं एक सामाजिक प्रतिबध्‍दता वाला कलाकार हूँ। अर्थात मैं जो भी करता हूँ वह समाज के लिए करता हूँ न मैं वो पैसे कमाने के लिए करता हूँ न ही पब्लिसीटी के लिए। मैं आज भी वही करता हूँ।

आशीष – एैसा कहा जाता है की टेलीवीजन त‍था सिनेमा ने थिएटर को पीछे ढ़केलने का काम किया है। थिएटर को आगे लाने के लिए क्‍या–काम करना चाहिए।
सतीश पावड़े –  मैं 25-30 साल से इस क्षेत्र में काम कर रहा हूँ। मैं अपने ग्रुप के लोगों से हमेशा यही कहता हूँ कि जिस समर्पण से आप थिएटर करते हैं उसी समर्पण से दर्शकों का निर्माण भी करिए। यानि कि प्रबुद्द दर्शक वर्ग का निर्माण करना भी रंगकर्मी का लक्ष्य होना चाहिए। हमारे ग्रुप ने अमरावती में ऐसा किया भी है। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि अमरावती में हमारा 1000 से अधिक लोगों का दर्शक समूह है जो टिकट लेकर हमारा शो देखने आते हैं। चूँकि हमने हमारा दर्शक वर्ग बनाया  है तो उन पर किसी भी टेलीवीजन या सिनेमा का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वे लगातार हमारा शो देखने आते रहे हैं। तो थिएटर को आगे ले जाने का यही पुख्‍ता तरीका है मेरे विचार से।

आशीष – अमरावती में जो आपकी संस्‍था है उसके बारे में विस्‍तारपूर्वक बताइए।
सतीश पावड़े –  अमरावती में हमारी दो संस्‍थाएँ हैं। पहला है युनिवर्सल स्‍पोर्टस एण्‍ड एकेडमी तथा जिगिसा सांस्‍कृतिक संस्‍था। ये दोनों संस्‍थाएँ मिलकर कार्य करती है। पिछले 25 सालों से ये दोनों संस्‍था काम कर रही है। ज्‍यादातर नाटक से संबंधित वर्कशाप करवाने का कार्य यह संस्‍था करवाती है। नाटक से जुडे व्‍याख्‍यान करवाने का कार्य भी किया जाता है। हर उम्र के लोगों के लिए अलग – अलग नाट्यकार्यशालाओं का आयोजन इस ग्रुप का मुख्‍य उद्दश्य है। नाटक से संबंधित वर्कशाप करने के बाद उनसे निकले कलाकारों के साथ मंचीय प्रदर्शन करने का ध्‍येय भी ग्रुप का होता रहा है। कई बार तो कई–कई वर्कशाप एक साथ चलते है फिर उनसे अलग–अलग उम्र समूह के कलाकारों के साथ अलग–अलग प्रोडक्‍शन तैयार किया जाता है। कभी–कभी नुक्‍कड़नाटक, कभी हिंदी में नाटक तो कभी मराठी में भी प्रोडक्‍शन करते हैं।

आशीष – विदर्भ में रंगमंच की वर्तमान स्थिति क्‍या है?
सतीश पावड़े –  देखा जाए तो विदर्भ दो भागों में विभाजित है पश्चिमी तथा पूर्वी विदर्भ। पूर्वी विदर्भ की हालत अच्‍छी है क्‍योंकि इसमें जो चार जिले हैं – गोंदिया, भंडारा, चंद्रपुर तथा गड़चिरौली के बीच एक झाड़ीपट्टी का क्षेत्र आता है जिसे ‘जंगल कोरिडोर’ बोला जाता है। नाटक वहाँ के कल्‍चर का पार्ट है। वहाँ 6 महीने में थिएटर का 35 करोड़ रूपए का अर्नओवर होता है और एक आर्टिस्‍ट को 10 हजार रूपाये प्रति शो मिलता है तथा 10,000 लोगों को रोजगार भी झाडीपट्टी रंगमंच प्रदान करती है। एक रीजनल थिएटर तथा बहुत ही धनी रंगमंच के रूप में झाडीपट्टी जाना जाता है विदर्भ की राजधानी नागपुर में भी रंगमंच सक्रिय है लेकिन अब यह आंदोलन के रूप में नहीं है। विदर्भ के लगभग हिस्‍सो में रंगमंच अब प्रतियोगिता तक सिमट चुकी है। महाराष्‍ट्र सरकार नाटकों के प्रदर्शन से संबंधित एक प्रतियोगिता राज्‍य लेवल पर करवाती है जिसमें भाग लेने हेतु पूरे महाराष्‍ट्र से विभिन्‍न ग्रुप आते हैं। तो अब यह कह सकते है कि थिएटर अब मिशन के रूप कोई नहीं कर रहा है। यह प्रतियोगिता तक ही सिमट कर रह गया है।

आशीष – आपने कहा है कि रंगमंच आपके लिए एक आंदोलन है तो क्‍या रंगमंच कोई बदलाव ला सकता है। सामाजिक तौर पर राजनीतिक तौर पर?
सतीश पावड़े –  बिलकुल बदलाव ला सकता है लेकिन एक कनसिसटेंट प्रक्रिया कें रूप में रही तो। हम जब काम करते हैं तो देखते है कि नाटक के बाद बहुत सारे लोग हमारे पास आकर नाट्य प्रदर्शन से संबंधित चर्चा करते हैं। तो यह तो तय है कि जो संवेदनशील लोग हैं उन पर नाटक असर करता ही है लेकिन यह बड़े पैमाने पर हो तो यह काम हो सकता है। आप नुक्‍कड़ नाटक का उदाहदण ले लीजिए, यदि वास्तव में इसका प्रभाव नहीं होता तो फिर सफदर हाश्मी जैसे लोगों की हत्‍या क्‍यों की जाती। दरअसल नाटक के मूल में ही आंदोलन है। नाटक का जन्‍म ही किसी ऐसी चेतना से हुआ है जिसे आंदोलन के पर्याय के रूप में देखा जा सकता है। नाटक का जन्‍म मनोरंजन के लिए तो था ही लेकिन साथ ही यह बात जरूर रही होगी की कोई छुटा संदेश इस माध्‍यम से आम लोगों तक पहूँचानी है। देखा जाए तो जब–जब थिएटर समाज की आवाज बना है तब–तब थिएटर अपना अहम रोल अदा किया है। आप इसे स्‍वतंत्रता आंदोलन के रूप में देख सकते है इमरजेसी के काल के दौर देख सकते है। कई ऐसे परिप्रेक्ष्‍य है।

आशीष – आप महाराष्‍ट्र राज्‍य नाट्य सेंसरबोर्ड के सदस्‍य भी रहे हैं, थिएटर जनमाध्‍यम है फिर इसे सेंसर करने की  आवश्यकता क्‍यों?
सतीश पावड़े- मैं बिल्‍कुल नहीं चाहता इसके लिए कोई सेंसर होना चाहिए लेकिन इतने सालों के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि इस आजादी का फायदा बहुत गलत तरीके  से उठाया जाता है, तो उसके लिए आवश्‍यकता है। वैसे भी नाटकों को बैन करने के लिए सेंसर नहीं होता। आप इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि बहुत ही कम नाटक वैसे हैं जिन्‍हें बैन कर दिया गया है।

आशीष - आप‍के परिवार का कोई और सदस्‍य रंगकर्म करता है।
सतीश पावड़े - नहीं। मुझे एक बेटा तथा बेटी है। दोनों को नाटक तथा फिल्‍में देखना पसंद है लेकिन वे इसमें अपना कैरियर नहीं देखते हैं।

आशीष - आपकी भावी योजनाएँ क्‍या है?
सतीश पावड़े - कुछ खास नहीं। बस रंगकर्म करते रहना है। मरते दम तक थिएटर करना है। पठन–पाठन का कार्य भी साथ – साथ चलता रहेगा।


आशीष :- शुक्रिया बहुत बहुत सर।