अधूरा प्यार

 -शिल्पी रस्तोगी 

तन्मय की कहानी पढ़ते ही सौम्या खिलखिला कर हँस पड़ी, तन्मय अभी उसकी खिलखिलाती हँसी में कहीं गुम होने ही वाला था कि इससे पहले ही सौम्या के शब्द उसके कानों में पड़े।
- क्या तन्मय जब देखो कहानी की नायिका का नाम एक ही रखते हो, अब तो जिसे देखो वही तुम्हे टोकने लगा है। कभी तो नीलांशी की नीलाभा से बाहर निकलो।
- मैंने पहली बार तुम्हे नीले सलवार कमीज में ही देखा था, तुम तो जानती हो सौम्या कि मेरी हर कहानी की नायिका सिर्फ और सिर्फ तुम हो।
तन्मय ने सौम्या की आंखों में झाँकते हुए कहा
- मेरी नीलांशी कोई और नहीं सौम्या बस तुम हो।
- उफ.. बहुत हो चुका तन्मय, कितनी बार कहूँ कि तुम एक अच्छे दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं हो मेरे लिए। मैं सिर्फ समीर से प्यार करती हूँ और करती रहूँगी।
सौम्या ने बेहद उखड़े स्वर में कहा।
- कोई बात नहीं तुम समीर से प्यार करो मैं तुमसे प्यार करता रहूँगा।
     तन्मय की इस हठ पर सौम्या को खूब गुस्सा आता पर तब भी वह तन्मय से बात करना बंद नहीं कर पाती थी। इसके पीछे क्या वजह थी यह सौम्या कभी खुद भी नहीं समझ पाई थी। तन्मय का लिखा जब भी कुछ सौम्या पढ़ती तो उसकी रचना से प्रभावित हुए बिना न रह पाती। समीर की बातों में उसे जाने क्यों वह गहराई कभी नज़र नहीं आती थी, जो उसे तन्मय की बातों में नज़र आती थी. कभी-कभी तन्मय उसे फ़्लर्ट करने वाला लगता तो सौम्या अपनी सोच को उसकी तरफ से सीमित कर लेती। कई बार वह तन्मय की सब बातों का जिक्र अपनी बेहद करीबी सखी से करती तो वह भी बस उससे यही कहती कि
- हर किसी को बातें बनाना नहीं आता तेरा समीर भी बस ऐसा ही है, तू दोनों में तुलना करती ही क्यों है।
पर न चाहकर भी तन्मय की चाहत कई बार उसे झकझोर जाती।
समय अपनी रफ़्तार से बीतता रहा सौम्या ने अपनी माँग में समीर के नाम का सिंदूर सजा ही लिया और तन्मय की चाहत अधूरी रह गई। फिर भी तन्मय की चाहत में उसे कभी कमी नज़र न आई, वह आज भी सौम्या से वैसे ही बातें करता जैसे विवाह से पहले करता था। जबकि सौम्या अब उसे और चिढ़ाती कि 'अब तो समीर मेरी चूड़ियों की खनखनाहट में भी गूंजता है, अब तो शर्म कर लो कुछ' पर तन्मय सिर्फ इतना ही कहता कि प्यार को किसी रिश्ते की जरूरत नहीं है।
विवाह के कुछ समय बाद ही समीर का ठंडा व्यवहार सौम्या को आहत करने लगा था। समीर को उससे सिर्फ जिस्मानी लगाव था यह बात सौम्या को धीरे-धीरे समझ आने लगी थी। इसी चाहत को पूरा करने के लिए समीर ने उससे विवाह किया क्योंकि किसी भी कीमत पर वह सौम्या को पाना चाहता था। घर में समीर का वक्त कम ही गुजरता था, रात को भी देर से घर आता सौम्या कुछ पूछती तो काम के दबाव का बहाना बनाता। सौम्या कुछ भी समझ नहीं पा रही थी आखिर समीर के बदलने की क्या वज़ह है। 'समीर तो पहले से ही ऐसा है रूखा ठंडा, मुझे ही अपने प्यार में उसका ख़ुश्क व्यवहार नज़र नहीं आया शायद'। अब उसे समीर के साथ अपनी हर मुलाकात याद आ रही थी ज्यादातर समीर उसे उन्हीं जगहों पर ले जाता था, जहाँ एकांत हो और वह सौम्या से प्यार कर सके लेकिन सौम्या समीर के प्यार में अंधी बनकर उसके साथ कहीं भी जाने को तैयार रहती, बस यहीं गनीमत रही कि सौम्या ने समीर को कभी खुद से खेलने नहीं दिया।  जब भी समीर उसके इतने करीब आता वह शादी के बाद कहकर टाल जाती और इसीलिए शायद समीर ने उसकी मांग भरी, अब तो वह समीर की ब्याहता है. लेकिन यादों पर किस का जोर चला है। यादें तो कोई सरहद कोई बंधन नहीं समझतीं, बस तन्हाईयों में चली आती हैं और ऐसे में ही जब तन्मय की कोई नई रचना हाथ में आती है तो दिल में जाने क्यों कुछ टूटता सा महसूस होता है। हर बार की तरह इस बार भी नायिका वहीं थी नीलांशी... कहानी में बदलाव था तो बस यही कि नायक रक्षित नीलांशी से विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देता है, और कहानी का यही बदलाव जाने क्यों सौम्या को अखर सा जाता है। सोचती है तन्मय से मिली तो अवश्य पूछूँगी।
जल्दी एक सहेली के विवाह में तन्मय से मुलाकात का अवसर मिला, समीर तो हर बार की तरह व्यस्तता का बहाना बना लेता है तो ऐसे में सौम्या अकेले ही जाने का फैसला करती है, आखिर उसे तन्मय से भी तो मिलना था।
- अरे तुम सौम्या!
विवाह में सबसे पहला सामना तन्मय से ही हुआ।
- तुम तो विवाह के बाद वैसी ही दिख रही हो जैसे छह साल पहले जब विवाह के बाद मिली थी।
तन्मय ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा।
- पर तुम बहुत बदल गए हो तन्मय अपनी कहानियों में।
आखिर वह तन्मय से पूछ ही बैठी
- अगर मेरा विवाह न हुआ होता तो, क्या तब भी रक्षित नीलांशी से विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा देता।
- नहीं सौम्या कहानी ने मोड़ जरूर लिया है पर रक्षित के जज्बात नीलांशी के लिए वही हैं जो पहले थे।
तन्मय ने संयत और कुछ ठहरे हुए स्वर में कहा।
- अगर मैं विवाह का प्रस्ताव रखती तब?
अचानक सौम्या पूछ बैठी।
तन्मय अपलक सौम्या का चेहरा देखता ही रह गया 'यह क्या कह गई सौम्या...'
 - सौम्या तुम तन्मय कि वो सौम्या हो जिससे तन्मय प्यार भी करता है और शादी भी करना चाहता था, अपने प्यार को सात फेरों में संजो कर तुम्हे सदा के लिए अपनाने की ख्वाहिश थी। पर ऐसा हो न सका तुम मेरे प्यार को कभी समझ ही न सकी।  एकाएक कितना दर्द तन्मय के चेहरे पर उभर आया था. जिसे आज सौम्या भी अपने दिल में उतरता हुआ महसूस कर रही थी।    - अरे तुम यहाँ हो मैं कब से तुम्हे ढूँढ रही हूँ।
तभी एक प्यारी सी लड़की ने तन्मय को आकर पुकारा।
- नील, इनसे मिलो ये सौम्या हैं। 
तन्मय ने चेहरे पर उभर आए दर्द को छिपाते हुए कहा।
- ओह सौम्या यानि तन्मय की प्रेरणा!
'तो क्या तन्मय ने भी!!!' सौम्या ने तन्मय को देखा,
- हाँ सौम्या ... हमारे सात फेरे सच की बुनियाद पर टिके है निश्छल प्यार प्रेरणा का स्त्रोत बन सकता है, उसे किसी पर्दे की आवश्यकता नहीं होती फिर चाहे वह प्यार अधूरा ही क्यों न हो।