एक बिना डिग्रियों वाला वैज्ञानिक और उसका अप्रत्याशित आविष्कार

- मेहेर वान

मेहेर वान
21वीं सदी में विज्ञान और तकनीकी हमारी दिनचर्या में इस तरह शामिल हो गई है कि सुबह से लेकर शाम तक या शाम से लेकर सुबह तक लगातार हम खुद को मशीनों से घिरा हुआ पाते हैं। हमारा जीवन मशीनों पर इस तरह आश्रित हो चुका है कि बिना मशीनों के आज हम सामान्य जीवन की परिकल्पना भी नहीं कर सकते। विज्ञान और तकनीक यानि मशीनों के विकास की कहानी बहुत रोचक और रोमांचकारी है। यह विकास प्रक्रिया पिछले डेढ सौ सालों में बहुत तीव्र रही। बीसवीं शताब्दी दो विश्व युद्धों की साक्षी बनी। यह एक विडम्बना ही है कि बीसवीं सदी में हुआ अधिकतर वैज्ञानिक और तकनीकी विकास दोनों विश्वयुद्धों के समय हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद देशों को नये-नये उपकरणों की आवश्यकता महसूस हुई। इसका प्रमुख कारण यह डर भी था कि कहीं दूसरे देश हमसे ज़्यादा बेहतर उपकरण बना कर युद्ध में हमें हरा न दें। जब दुनियाँ पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छाये हुये थे तब राजनीतिज्ञों के साथ-साथ कुछ और लोग भी बहुत दबाव महसूस कर रहे थे, और वे विभिन्न देशों के वैज्ञानिक थे। यह वो समय था जब राष्ट्रवाद के नये नये प्रतिमान गढने की कोशिशें हो रही थीं। कोई वैज्ञानिक अपने देश के लिये परमाणु बम बनाने में लगा था तो कोई अपने देश को दूरसंचार के नये माध्यमों की खोज करने में लगा था ताकि सेनायें आपस में आसानी से संपर्क साध सकें और युद्ध जीता जा सके।

यह भी एक बिडम्बना ही है कि उस विध्वंस के समय में अनगिनत ऐसी खोजें हुईं, जिन्होंने मानव जीवन को न सिर्फ़ आसान बनाया बल्कि बेहतर बनाया है।आविष्कारों के इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिनमें बहुत सी महत्वपूर्ण मशीनों की खोज अकस्मात और अप्रत्याशित तरीके से हुई। इन अप्रत्याशित मशीनों का इस्तेमाल युद्धों में न होकर आम-जन-जीवन में बहुत ज़ोर-शोर से हो रहा है। यह उपकरण आज हमारी दिनचर्या में इस तरह से शामिल हैं कि हमें एहसास भी नहीं होता कि इनकी विकास प्रक्रिया किसी विश्वयुद्ध से सम्बन्ध रखती है।


ऐसा ही एक उपकरण है रसोईघर में इस्तेमाल होने वाला माइक्रोवेव ओवन। माइक्रोवेव ओवन का आविष्कार एक बहुत ही रोचक और अप्रत्याशित घटना थी। माइक्रोवेव ओवन आज रसोईघरों में सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाला उपकरण बन चुका है। जिसमें हम भोजन या खाने का सामान गर्म करते या पकाते हैं। इसका आविष्कार द्वितीय विश्व युद्ध की तकनीकी तैयारियों के समय अमेरिका में हुआ था। सन १९३९ की बात है तब अमेरिका विश्वयुद्ध की तैयारियों के लिये नये-नये उपकरण बनाने और तकनीक विकसित करने के लिये युवाओं से लेकर अनुभवी वैज्ञानिकों तक को शोध करने के लिये प्रेरित कर रहा था। उस समय “राडार तकनीक” पर आधारित दूर संचार के उपकरण बनाने की होड़ मची हुई थी। विशेषज्ञ यह मान रहे थे कि राडार तकनीक सेनाओं में आपस में संचार-संपर्क को बेहतर बना देंगीं जिससे युद्ध लड़ना अपेक्षाकृत अधिक आसान हो जायेगा। अमेरिकी सरकार ने उस समय मेसाच्युसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी की विकिरण प्रयोगशाला को एक मेगा-प्रोजेक्ट के ज़रिये आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य युद्ध में प्र्योग हो सकने वाला हल्का लड़ाकू राडार उपकरण बनाना था।

इन्हीं परिस्थितियों में, सन १९३९ में “रेथियोन” नामक कम्पनी के पावर ट्यूब डिज़ाइन विभाग में विभाग-प्रमुख के रूप में काम कर रहे वैज्ञानिक ’पर्सी स्पेन्सर’ ने तमाम प्रयासों के बाद कम्पनी के लिये मेसाच्युसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी की विकिरण प्रयोगशाला के साथ एक सरकारी अनुबन्ध हासिल करने में सफलता हासिल कर ली जिसका उद्देश्य लड़ाकू राडार उपकरण विकसित करना और उसका सेना के उपयोग के लिये बड़ी मात्रा में उत्पादन करना था। यह अमेरिकी सरकार का काफी महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बन चुका था और इसमें सरकार की काफ़ी पूँजी भी लगी थी। यह प्रोजेक्ट कुछ समय बाद इतना महत्वपूर्ण माना जाने लगा कि अमेरिकी सरकार परमाणु बम बनाने से सम्बन्धित ”मेनहाट्टन प्रोजेक्ट” के बाद इसे सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट मानने लगी। इस बात का अंदाज़ा आप इस तरह लगा सकते हैं कि कुछ की समय में इस प्रोजेक्ट में काम कर रहे कर्मचारियों की संख्या पन्द्रह से बढकर पाँच हज़ार हो गयी थी।

एक दिन वैज्ञानिक पर्सी स्पेन्सर राडार सेट में इस्तेमाल होने वाले एक महत्वपूर्ण पुर्ज़े “मैग्नेट्रोन” के साथ प्रयोग करने में लगे हुये थे। वह इस प्रक्रिया में तमाम प्रयोग कर चुके थे परन्तु सफलता हाथ नहीं लग रही थी। इन्हीं प्रयोगों के दौरान वह एक दिन प्रयोगशाला में जाने से पहले अपनी जेब में रखी कैण्डी बार यानि चॉकलेट को बाहर रखना भूल गये। जब उन्होंने प्रयोगशाला में जाकर राडार सिस्टम शुरु किया उन्हें महसूस हुआ कि उनकी जेब में रखी चॉकलेट काफ़ी गर्म हो गई है और गर्म होकर पिघल रही है। बताते चलें कि राडार सिस्टम सूक्ष्म-तरंगो पर काम करता हैं जिन्हें अंग्रेज़ी में माइक्रोवेव्स कहते हैं। हालाकिं माइक्रोवेव्स प्रकाश की तरंगों जैसी ही होती हैं मगर इनका तरंगदैर्ध्य प्रकाश की तरंगो से ज़्यादा होता है। यह तरंगे संचार प्रणाली के लिये सबसे उपयुक्त होती हैं क्योंकि इनमें किसी दीवार जैसी बाधा को पार कर अन्दर जाने की क्षमता होती है। यह दूर तक बिना किसी माध्यम के पहुंच सकती हैं, इन्हें किसी सूचना या सिग्नल के साथ जोड़कर दूर तक आसानी से भेजा जा सकता है। वर्तमान में मोबाइल टेलीफोनी, रेडियो-टीवी नेटवर्क से लेकर सभी संचार माध्यमों में इन माइक्रोवेव तरंगो का प्रयोग होता है। जिस समय वैज्ञानिक स्पेन्सर इस सम्बन्ध में शुरुआती प्रयोग कर रहे थे तब इस तरह की तकनीकें विकसित नहीं हुई थीं जो हम आज रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल करते हैं। उस समय किसी को शायद ही अन्दाज़ा रहा होगा कि माइक्रोवेव तरंगे मानव के लिये इतना उपयोगी सिद्ध हो जायेंगीं।


यह संचार माध्यम में हमेशा एक सूचना भेजने वाला होता है और एक स्वीकार करने वाला। वैज्ञानिक स्पेंसर की प्रयोगशाला में भी एक ट्रान्समिटर और रिसीवर था जिनके बीच में वह माइक्रोवेव तरंगों की सहायता से संपर्क बनाना चाह रहे थे। इस प्रायोगिक प्रक्रिया में उन्हें बार-बार ट्रान्समिटर और रिसीवर के बीच से आना-जाना पड़ता था जहाँ से माइक्रोवेव तरंगें बह रहीं थीं। जब एक बार वह अपनी जेब में चॉकलेट रखकर प्रयोग करने चले गये तो माईक्रोवेव्स के कारण जेब में रखी चॉकलेट गर्म होकर पिघल गई। उन्हें चॉकलेट पिघलने का कारण समझ नहीं आया था। असल में वैज्ञानिकों को अपनी प्रयोगशाला में सीमा पर डटे सिपाहियों की तरह हमेशा चौकन्ने रहना पड़ता है। वह हर घटना का कारण एक मंझे हुये जासूस की तरह जानने का प्रयास करते हैं। अगले दिन वैज्ञानिक स्पेंसर बहुत सारी चॉकलेट्स के साथ प्रयोगशाला पहुँचे थे। फिर काफ़ी जद्दोजहद के बाद यह पता चला कि चोकलेट्स ट्रान्समिटर से आने वाली तरंगो की वजह से पिघल रही हैं। इसके बाद वह भोजन की सामान्य चीजों से लेकर पॉपकोर्न तक लेकर अपनी प्रयोगशाला गये और उन्हें टेस्ट किया। भोजन की सामान्य चीज़ें तो गर्म हो ही रही थीं पॉपकोर्न का फूटना देखकर स्पेंसर को लगा कि इस सामान्य सी घटना को एक आविष्कार में बदला जा सकता है।

हालाँकि इस दिशा में उनकी राह आसान न थी। अच्छी बात यह हुई कि उनकी कम्पनी “रेथियोन” ने राडार उपकरण बनाने में भी सफलता पाई। उनकी सफलता से आने वाले पैसे से स्पेंसर और उनकी कम्पनी के मालिक ने 8 अक्तूबर 1945 को पेटेंट फ़ाइल किया और “राडारेन्ज” नाम से कॉमर्शियल माइक्रोवेव ऑवन बाजार में उतारा। यह दुनियाँ का पहला माइक्रोवेव ऑवन था। यह माइक्रोवेव ऑवन काफ़ी भारी था, जिसकी ऊँचाई लगभग छैः फुट थी। इसका दाम उस समय पाँच हजार अमेरिकी डॉलर था। इतने अधिक दाम और नयी तकनीक के डर के कारण इन माइक्रोवेव ऑवन की बिक्री नहीं हुई, जिससे कम्पनी. स्पेंसर और उनके सहयोगी गहरे घाटे में चले गये। बाद में कई सुधारों के बाद १९६७ में माइक्रोवेव ऑवन का दाम लगभग पाँच सौ अमेरिकी डॉलर आ पाया, जो कि वजन में भी काफ़ी हल्का और मेज पर रखा जा सकने वाला था। इस तरह माइक्रोवेव ऑवन हमारे रसोईघरों तक पहुँचा।

माइक्रोवेव ओवन की तरह उसकी खोज करने वाले का जीवन भी कम अप्रत्याशित नहीं हैं। पर्सी स्पेंसर ने विज्ञान की परंपरागत पढ़ाई नहीं की थी, वह स्वतःस्फूर्त रूप से एक वैज्ञानिक थे। जब वह मात्र १८ महीने के थे तब ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनकी माँ भी उन्हें अपने चाचा-चाची के पास छोड़कर चली गई। स्पेंसर ने स्कूल जाना तो शुरु किया पर पैसे न होने की वजह से १२ साल कई उम्र में स्कूल छोड़ दिया। वह एक स्पूल मिल में काम करने लगे। यह मजदूरी उन्होंने १६ साल की उम्र तक की। उसी समय उन्हें खबर मिली कि पास में ही एक पेपर मिल है जिसका कि अब विद्युतीकरण हो रहा है यानि अब वह बिजली से चलेगी। यह उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी बात थी। उस समय छोटे कस्बों के लोग बिजली के बारे में जानते भी नहीं थे। स्पेंसर ने उस समय बिजली के बारे में पास के पुस्तकालय से पढ़ना शुरु किया और मिल में बात करना शुरु कर दिया। कुछ समय बाद वह उन तीन लोगों में से एक थे जिन्हें उस मिल में बिजली लगाने के लिये मिल ने नौकरी पर रखा गया। स्पेंसर के पास न तो इलेक्टिकल इंजीनियरिंग में डिग्री थी न ही प्राथमिक शिक्षा, वह खुद अर्जित किये ज्ञान के आधार पर यहाँ तक पहुंच पाये थे। इसके बाद १८ साल की उमर में उन्होंने अमेरिकी नौ-सेना में शामिल होने का निर्णय लिया। नौसेना में शामिल होने का प्रमुख कारण स्पेंसर का बेतार की संचार प्रणाली यानि वायरलेस कम्युनिकेशंस में रुचि जागना था। यह वही समय था जब टाइटेनिक जहाज डूब गया था और उसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गये थे. जिसका प्रमुख कारण जहाज के डुबने की खबर का आसपास के स्थानों तक खबर न पहुँचना था। इसके बाद स्पेंसर ने रेडियो संचार व्यवस्था के बारे में तमाम किताबों को पढ़्कर खुद को उस विषय का विशेषज्ञ बनाया। इसी प्रक्रिया में उन्होंने त्रिकोणमिति, कैलकुलस, रसायन शास्त्र, भौतिकी आदि विषयों का गहराई से अध्य्यन किया। एक समय ऐसा आया जब उन्हें उनके तकनीकी ज्ञान के कारण वैज्ञानिक लोग बहुत सम्मान की नजर से देखते थे। उन्हें मेसाच्युसेट्स विश्वविद्यालय ने मानक डॉक्ट्रेट की उपाधि प्रदान की उन्हें अमेरिकी विज्ञान और कला अकादमी ने फ़ेलो के रूप में चुना। इसके साथ ही अन्य अनगिनत उपाधियाँ और अवार्ड से वह नवाज़े गये। किसी भी स्पूल मिल में १८ साल तक काम करने वाले लड़्के के लिये यह कम नहीं था, कि उसके तकनीकी ज्ञान के लिये बड़े-बड़े वैज्ञानिक सम्मान करें। यह सम्मान पर्सी स्पेंसर को मिला। अपने जीवन में उन्होंने ३०० तकनीकों के लिये पेटेंट हासिल किये थे। माइक्रोवेव तकनीक भी उन तमाम तकनीकों में से एक है जिसका उपयोग हम आज अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में करते हैं।

यह बात और है कि हम अक्सर यह नहीं जानते कि इसके आविष्कार की कहानी और इसके आविष्कारक का जीवन उतना ही रोचक होगा जितनी सरलता से आज यह तकनीक हमारे जीवन में स्थान बना चुकी है।