गुनगुना एहसास - लघुकथा

अर्चना तिवारी 

एक तो रात का समय ऊपर से जनवरी की हाड़ कँपा देने वाली ठण्ड, साईकिल चलाते हुए हैंडिल पर मेरी उंगलियाँ जमकर काठ हुई जा रहीं थीं। रास्ते में चाय की गुमटी देखकर मैंने सोचा थोड़ी गर्माहट ले ली जाय, सो चाय का ऑर्डर दे सामने रखी बेंच पर बैठ गया।

सामने सड़क के पार एक व्यक्ति ठेले के चारों ओर बोरे लटका कर अपना आशियाना बनाने की कोशिश कर रहा था। पास में ईंटों से बने चूल्हे पर रखी देगची में कुछ पक रहा था। एक मैला-कुचैला मरियल कुत्ता, बदहवास-सा बार-बार उसके पास जाता और वह व्यक्ति हर बार डंडे को ज़मीन पर पटक कर उसे भगा देता था।

मैंने उस कुत्ते को ग़ौर से देखा, यह वही कुत्ता था जिसे हमारे मोहल्ले के एक संभ्रांत परिवार ने कुछ माह पहले मंगवाया था। आरम्भ में तो उसे बड़े लाड़-प्यार से रखा गया, लेकिन माह भर बीतते-बीतते डंडे से उसकी धुनाई होने लगी और फिर एक दिन उसे यह कह कर घर से बाहर कर दिया गया कि वह देशी नस्ल का है।

अब वह ठेले वाला व्यक्ति देगची से खिचड़ी निकालकर खाने लगा। उससे कुछ ही दूरी पर कुत्ता अपना मुंह ज़मीन पर टिकाए, पूंछ हिलाता हुआ कूं-कूं करता याचक दृष्टि से उसे देखे जा रहा था। खाते-खाते उस व्यक्ति की नज़र कुत्ते पर पड़ी। उसने एक अख़बार के टुकड़े पर थोड़ी खिचड़ी निकालकर कुत्ते की ओर सरका दी। कुत्ता दबे पाँव पूंछ हिलाता हुआ उसके निकट सरक आया और अख़बार पर पड़ी खिचड़ी खाने लगा।

मेरी चाय ख़त्म हो चुकी थी। चलते-चलते मैंने अनायास ही आख़िरी बार अपनी निग़ाह सामने ठेले की ओर डाली। वह व्यक्ति ठेले की ओट में बिछे बोरे पर एक पुरानी चीकट सी रज़ाई में गठरी बन चुका था। कुत्ता उसके पैरों के पास रज़ाई से बाहर रह गए बोरे पर सिमटा पड़ा था। तभी उस व्यक्ति ने पैर से रज़ाई का कोना कुत्ते की पीठ पर डाल दिया, कुत्ता गोलमोल होकर उसमें दुबक गया।