डांस लाइक नतालिया


ध्रुव हर्ष
ये नाम किसी मिथक के पात्र का गवहीं या यूँ ही लोगों के मुँह से कहा जाने वाला नाम नहीं है, और न ही मैंने उपन्यासकार महाश्वेता देवी के लेखनी से प्रेरित होकर कोई ऐसा नाम गढ़ने की कोशिश की है।

रही बात महाकाव्यों से किसी पात्र के नाम और चरित्र को नए आयामों में ढालना और उन्हें आज की आवाज़ देकर महापात्र बनाना, तो ये तो मेरे वश की बात न थी। क्योंकि ऐसा करने से मेरे ज्ञान का छिछलापन साफ़ पानी में पड़े पत्तों की तरह दिखने लगता और आपका ध्यान मुख्य किरदार से हटकर मेरे आज के नथली को वाल्मीकि रामायण  और कृष्ण द्वैपायन महाभारत के व्यापक दृष्टान्तों में खंगालने लगता। फिर तो आप वो समझने लगते जो शायद मैं कभी कहना ही नहीं चाहता था।

 नथली आदिवासी समुदाय से थी। मैंने उसे लखनऊ में हज़रतगंज की एक सड़क पर देखा; दरअसल, मैं वहीँ रोड के किनारे बैठकर मैंगो शेक का लुत्फ़ उठा रहा था। उसे देखते, मुँह में नीम सी कड़ुआहट भर गई क्योंकि शायद मेरे मुँह के स्वाद और नथली की ज़िंदगी में कोई ताल-मेल नहीं था। मैं तो वहां इसलिए बैठा था क्योंकि ‘लखनऊ कॉफ़ी हाउस’ कुछ देर पहले मेरे लिए.… एक नई आफ़त खड़ी करके मेरे मौज़ूदा हालात पर मुस्कुरा रही थी। हुआ यूं कि मेरे एक अज़ीज़ दोस्त ने मुझे वहां कुछ पल इंतज़ार करने के लिए कहा था। मेरे पॉकेट में उस समय तीस... और पीछे की जेब के सिक्कों को मिला-जुलाकर तकरीबन चालीस रुपये हो रहे थे। एक और दस रुपये की नोट कहीं बटुए में तीन-चार मर्तबा मुड़ी किसी खाने में पड़ी थी जिसके बारे में अभी मैं अनभिज्ञ था। खैर प्लास्टिक मनी के रूप में मेरे वॉलेट में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के दो ए. टी. एम कार्ड्स पड़े थे; एक जिसमें पिता जी कभी-कभी रुपये भेजा करते थे, दूसरा विश्वविद्यालय की शाखा के जिसमें स्टाइपेंड आया करता था।

लखनऊ वह भी हज़रतगंज जिसे ‘हार्ट ऑफ़ लखनऊ’ के ख़िताब से नवाज़ा जा चुका हो … वहां सबसे किफ़ायती जगह  कॉफी हाउस ही सूझी जैसा की उन दिनों इलाहाबाद के ‘इंडियन कॉफ़ी हाउस’ में सोलह रुपये की एक कॉफ़ी मिल जाया करती थी। ये सोचकर मैं तपाक से अपनी डायरी और शोध विषय से सम्बंधित कुछ एक लिफ़ाफ़े में ज़रूरी किताबों के ज़िरॉक्स जोकि मैंने 'भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, लखनऊ' के लाइब्रेरी से प्राप्त किया था, उसको मेज़ पर रखकर वहीँ बैठ गया फिर रुमाल निकालकर माथे का पसीने को पोछा और चारो तरफ अपनी दृष्टि दौड़ाई। अंदर की दशा देखकर बड़ी निराशा हुई तो ख़ुद से ही प्रश्न किया... 'मॉडर्निटी ऐंड यंग इंडिया ' जहाँ एंटीक्विटी की कोई कदर नहीं।

“आख़िर हम कौन सा स्वर्णिम भविष्य बना रहे हैं, ये कॉफ़ी हाउस है, या कोई रेस्त्रां!”
मन के अंदर का द्वन्द शांत नहीं हुआ था कि तब तक वेटर आ धमका … "क्या लेंगे श्रीमान ?"
मैंने कहा, "कॉफ़ी पिला दीजिए।"

वेटर फ़रमाइश लेकर मुड़ा ही था कि नथली की ज़िंदगी की फ़िल्म मेरे आँखों के सामने एडिट होकर ठीक अमरीकी फ़िल्म निर्देशक ओर्सोने वेलस के फ़िल्म सिटीजन केन की तरह आ रही थी। उन दिनों, मैंने विश्व सिनेमा देखना और समझना शुरू किया था, जिसने मुझे दृष्टिकोण से काफ़ी टेक्निकल बना दिया था। मेरी आँखे कैमरे की तरह काम करने लगीं थी। इसलिए नथली के मुरझाये चेहरे ने दिल को किसी फ़िल्म के पात्र की तरह कचोटना शुरू कर दिया। फिर क्या था, मैंने फट से डायरी उठायी और नथली की ज़िंदगी को अपने काव्य में ढालने की कोशिश करने लगा। ये वो हक़ीकत थी जिसको मैंने किसी कोठे के तवायफ़ की तरह खनकते हुए सुना था। शाम-ए -अवध की वो रौशनी जो नवाब वाज़िद अली शाह के बादशाहत के नीवं पर टिकी थी ... यक़ीनन, उस नई शाम नथली के दर्द से मातम मानाने वाली थी क्योंकि अब लखनऊ की चमक वैसी नहीं रही जैसे मुगलों के ज़माने में हुआ करती थी, और हो भी क्यों न, वो लखनऊ की शाम तो नवाब वाजिद साहब अपने साथ कलकत्ता जो लेके चले गए थे।

मैंने कविता का टाइटल "डांस लाइक नतालिया" रखा। आज उसकी कहानी लिख रहा हूँ, जिसे वह अपने हकीकत का मुक़द्दर समझकर हर रोज जीती होगी। उसे क्या फर्क पड़ता है, कि हम जैसे कितने लेखक, उसकी जिंदगी की कहानी दुनिया को बता रहे हैं! फ़िर भी न जाने क्यों, मैंने उससे वादा किया था, कि तुम्हारी कहानी पूरी दुनिया को सुनाऊंगा।
"वाज़ सी नताली पोर्टमैन
ऑर गॉडेस इन डिस्गाइज़
डांसिंग ऑन द सिल्वर क्वाइन…"

हाँ! नथली मेरे लिए हॉलीवुड फ़िल्म ब्लैक स्वान की अभिनेत्री ‘नताली पोर्टमैन’ से कम न थी … उम्र तक़रीबन बारह-तेरह, देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे, चीथड़े और दर्द में मैंने कला की देवी को हंसिनी के वेश में एक रुपये के सिक्के पर अपने देह का पूरा वजन उठाये नटराज के भांति घूमते हुए देखा हो।

 … एक दुखद आश्चर्य!

 सौंदर्य के आठों रस थे सिवाय श्रृंगार छोड़कर; जिसे शायद अवसाद और आर्थिक तंगी ने लगभग ख़त्म ही कर दिया था। ढलके बदन, गंदे फटे कपड़े, सूखे होंठ, कहानी कहती सुंदर थकी आँखें और मिट्टी में सने केशों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे शैशव के रंग अरवी के पत्ते पर पड़े वर्षा की बूँदों की तरह बिना उसे गीला किये फ़िसल जा रहे थे। कौमार्य को बिना प्रेम की अनुभूति के समझ पाना काफ़ी मुश्किल होता है, और वही चैप्टर नथली की जिंदगी से ओझल था। उसने शायद ही कभी अपने अंदर की नारी को दर्पण में झाका हो या बिस्तर पर सोते समय अपने हाथों के स्पर्श से खुद को यक़ीन दिलाया हो कि वह कुदरत की रची हुई कितनी अनमोल कृति है। इन सभी यथार्थों से कोसों दूर, नथली की दुनिया बहुत सीमित और छोटी थी जहाँ उसे या तो मीटरों ऊपर हवा में दो खम्भों पर टंगी रस्सी पर नंगे पाँव चलकर करतब दिखाना होता था या एक रुपये के सिक्के पर नटराज के भांति घूमना होता था। न जाने कितने उसके करतब को देखते होंगे फिर भी वह कितनी अकेली थी। उसके साथ कुछ था तो बस एक पुराना टेप रिकॉर्डर और दो-तीन नब्बे के दशक वाले हिंदी फ़िल्मी नग्मों के कैसेट्स जो उसके बेबसी के किस्से कह रहे थे, जिसमें एक तरफ़ा मोनोलॉग होते हैं जैसे, ‘‘मैंने तुमको दिल ये दे दिया फिर भी न पूछा कौन हो तुम...’’

  आख़िरकार थी तो वह भी हव्वा की बेटी, फ़िर भी कुछ तो था जो नथली से खो गया था, कहीं दो टुकड़ी रोटी की आड़ में एक लड़की तो नहीं थी? फ़िर भी उसके नृत्य में आकर्षण और कंठ में मिठास की कहीं से कोई कमी नहीं थी। न चाहकर भी कला की देवी सरस्वती ने उसे हिन्दुस्तान के सरजमीं का नताली पोर्टमैन होने का आशीर्वाद तो दे ही दिया था। खोट तो हमारी आँखों में थी जो हम लोग उसे ऐसे हालत पर मरने के लिए छोड़ रहे थे।

क्या वो मेरे भ्रम की एक बिंब थी...या... कोई गोंड, पनिका, खासी, गारो जनजाति!

   ये दर्द भरा खेल ख़त्म करने के बाद नथली ने अपनी डफली सबके आगे बढ़ाई। आते-जाते आम पब्लिक ने थोड़े-बहुत सिक्के उसमें छोड़ दिये...फ़िर उसने खड़ी चौपहिया वाहनों की तरफ़ जिसमे ऑडी से लेकर बी. एम. डब्लू. लक्ज़री सीरीज़ तक की गाड़ियां थीं, उसमें बैठे लोगों की ओर अपना हाथ बढ़ाया तो उन्होंने कार के शीशे चढ़ा लिए। कुछ देर बाद जब भीड़ वहां से तितर-बितर हुई, तब मैंने अपने आपको नथली के क़रीब जाने दिया और जाकर उसका नाम पूछा …अंगूठे के दर्द से कराहते हुए, आँखों के आंसुओं को रोकने की असफ़ल कोशिश के ज़द्दोजहद के बीच होंठों से एक शब्द निकला …नथली...

उस लड़की के ज़िंदगी की कविता मेरे कॉफ़ी के आख़िरी सिप के साथ ख़त्म हो चुकी थी। मैंने वक़्त की अपनी परिभाषा गढ़ी, या और कहें तो, एक ऐसी गुत्थी जो केवल इस कहानी के मार्फ़त ही सुलझायी जा सकती थी, बस कॉफ़ी की सिप और मैंगो शेक का लुत्फ़, दोनों घटनाओं के स्पेस और टाइम को एक नया नैरेटिव देकर… मैंने वेटर से बिल मांगा…

बंद रैक्सीन की फाइल खोलकर, जब मैंने बिल देखा तो उसमे पचास रुपये लिखे थे। फिर मैंने उससे पूछा … "क्यों जी ए.टी.एम. कार्ड स्वाइप हो जायेगा?"
“जी नही”, वेटर ने ज़वाब दिया।
मैंने फिर थोड़ा रुककर कहा, “ओ. के. थोड़ी देर बाद आइये।”

अब मैं अपने आप को बड़े असमंजस में पा रहा था। थोड़ा दिमाग़ लगाने के बाद अपनी डायरी और लिफ़ाफ़े को वहीँ मेज़ पर छोड़कर बाहर निकल आया… और फिर से अपने पर्स का अच्छी तरीके से मुआइना किया। कई बार टटोलने के बाद देखा किनारे तीन-चार मर्तबा मुड़ी दस रुपये की एक नोट पड़ी थी जिस पर लिखा था...
ट्यूज़डे, 10 सितम्बर 2013, ऑन योर बर्थडे

“आई सीक रिडेम्शन"

   और दूसरी तरफ़ 'विद लव एंड ग्रेटीट्यूड, एवेंचुअली योर्स'। पहली बार मुझे किसी का प्यार बहुत सस्ता और झूठा लगा और किसी के दर्द ने मुझे बता दिया कि आज भी तुम्हारे पास दिल है...
ध्रुव हर्ष फ़िल्मकार व नाटककार हैं, और एशियन सिग्नेचर के संस्थापक और मुख्य-प्रबंधक-संपादक हैं. ईमेल – dhruvasngh@gmail.com