पुनीता जैन की कविताएँ

पुनीता जैन
शब्‍द के विरूद्ध हथियार 
हथियार के वि‍रूद्ध शब्‍द 
धूप छाँव सी जंग 
लड़ने मरने को तैयार 
दहक रहे क्रुद्ध 
एक दूसरे के विरूद्ध 

हथियार तो फिर हथियार था 
स्‍वभाव से अपने / मजबूर 
उतावाला 
रक्‍त का प्‍यासा था 

शब्‍द
अपनी स्‍वतंत्रता में आत्‍ममुग्‍ध 
इतना तना 
कि / तनाव में 
झंडे से उसके 
खून टपकने लगा 

इधर जो / उलझे थे रोटी में 
बातें छोटी छोटी में 
कारणों से जो / नावाकिफ थे 
भाग रहे थे / रोते बिलखते बदहवास 
कभी गाजा 
कभी पेरिस 
कभी पेशावर में 
लथपथ को गोद लिए 

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सॉझ हुई अब

काले झण्‍डे 
काले केश 
बदल लेते रंग 
एक दिन

एक दिन
नारे – तख्तियॉ 
उबलते प्रतिरोध 
सुलह के शांत जल में बदल 
करते घोषणा 
थमो युद्ध !
सॉझ हुई अब 

श्‍वेत केश 
सांसारिक रणभूमि का श्‍वेत ध्‍वज 
विराम का करता संकेत 

दिन की प्रखरता में 
लडे जाते रहे हर युद्ध 

रात की स्‍याही ने 
उतरती धूप पर 
किये हैं सदा 
थमने के हस्‍ताक्षर ....

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प्रतीक्षा में

मॉ अब तिरासी की है
बहत्‍तर तिहत्‍तर की थी 
तब से उसने छोड दिया 
रिश्‍तों को जीना 
सही को सही 
गलत को गलत क‍हना 

कई वर्षों से
वह रोटी खाती / सोती 
और सॉस लेती है

कभी कभार करती है बात 
उचाट दृष्टि से /
फिर डरती है मृत्‍यु से 
मरूंगी तो क्‍या / जला दोगे मुझे 
रख नहीं सकते किसी पिंजरे में 

मृत्‍यु की प्रतीक्षा में 
एक मृत्‍यु यूँ साँस लेती है 
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