रुचि भल्ला की कविताएँ

रुचि भल्ला
1- 
सुनो प्रज्ञा!

जब भगत सिंह को तेईस साल में
फांसी दी जा रही थी

पाश को सैंतीस साल में
गोली मारी जा रही थी

हम-तुम दोनों उस वक्त धरती के गर्भ में पड़े रहे
मिट्टी की पर्त को खुरचते रहे अपने नाखूनों से
ज़ुबान पर गीली मिट्टी का स्वाद फिराते रहे

ये मिट्टी तो शहादत की मिट्टी थी
हम दोनों को हजम कैसे हो गई
इसे खाने के बाद भी
हम दोनों जी रहे हैं चालीस के पार

जी रहे हैं और बूढ़े होते जा रहे हैं
जबकि मृत्यु का उत्सव तो जवानियाँ
कब का मना चुकीं

2-
सुनो प्रज्ञा!

यह वक्त कविता लिखने का नहीं
पाश हो जाने का है
कलम के तलवार होने का है

पाश की आत्मा से रिसते लहू की स्याही में तुम
अपनी तलवार भिगो दो
दुनिया के हर पुर्जे पर तुम पाश लिख दो
लिख दो इस तरह से कि धरती पर बिखर जाए
रंग लाल पाश का
आसमान में बिखर जाए
कविताओं के लाल गुलाल का

लिखो कि इससे पहले तुम्हारी तलवार
कहीं धार न खो दे
इससे पहले तुम विशुद्ध कवि न रह जाओ
तुम्हें लिखना होगा प से पाश
कुछ इस तरह से
जैसे कबीर ने पढ़ाया है पाठ हमें प्रेम का ......

3-
सुनो प्रज्ञा!

क्या-क्या नहीं है दुनिया के पास
अब भी तो चमकता है दिल्ली में सूरज
बंबई चाँद सर पर लिए घूमता है
तारे चमकते हैं तुम्हारे आजमगढ़ में

मैंने सुनी है फलटन में ईख की सरसराहट
कोयल के गले में अब भी बसते हैं गीत
बजती है घंटियां गाय के गलों में

नारियल की गरी अब भी कच्चे दूध सी मीठी लगती है        
बरसात की बूंदों में पायल की रुनझुन बजती है
गंगा बहती है अब भी जमुना -सरस्वती के साथ
सागर में अब भी मछलियाँ दिखती हैं

रात देखती है नींद में सपने
दिन रोज़ खड़ा हो जाता है मस्जिद की अज़ान पर
अखबार में अब भी खबरे मिलती हैं
जैसे सीप में मिलते हैं मोती

सुर्ख गुलाब अब भी खिलते हैं कांटों में
पेड़ों पर उगते हैं खट्टे-मीठे फल
नहीं उगता है तो बस बरनाला में हरी घास का जंगल
जबकि कहा था पाश ने वह फिर से लेगा
धरती पर 'अवतार' हरी घास बन कर

मैं सन् 88 से खड़ी हूँ घर की खिड़की पर
बरनाला की ओर देखते हुए
मुझे अब भी उम्मीद है वहाँ उगेगा केसरी एक सूरज
लेगा एक किसान जनम
लंबे -लंबे डग भरता हुआ पंजाब के खेतों की ओर जाएगा लुधियाना संगरूर बंगा बरनाला में बोएगा हरे बीज
पंजाब के नौजवानों को आकर देगा विरासत में
हरी घास का जंगल..