साहित्य में रैंकिंग: व्यंग्य से यथार्थ तक

प्रबोध गोविल से अनुराग शर्मा की वार्ता
प्रबोध गोविल
प्रश्न: साहित्य से आपका लगाव कैसे शुरु हुआ?
उत्तर: हम छः भाई-बहन हैं। मेरा नंबर चौथा है। सबसे बड़े भाई से 6 साल छोटी बहन,उससे 4 साल छोटा भाई, उससे 4 साल छोटा मैं, मुझसे 2 से भी कम वर्ष के अंतर वाला भाई और उससे 3 साल छोटी बहिन।

मुझे भाई के लिए माँ की गोद सबसे जल्दी खाली करनी पड़ी। इस स्थिति ने मुझे माँ से भी ज़्यादा बड़ी बहन के नज़दीक किया। बड़ी बहन साहित्य की विद्यार्थी थी। उसके बीए, एमए, के पाठ्यक्रम के प्रसाद, निराला, महादेवी, प्रेमचंद, धर्मवीर भारती ही नहीं, बल्कि तुलसी, सूर, केशव, मीरा, और कबीर मुझे छठी कक्षा से ही पढ़ने के लिए उपलब्ध होते चले गए। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरे मानस का दूध इस जमावन से दही में तब्दील हो गया।

स्कूल के आखिरी दिनों में और कॉलेज के आरंभिक दिनों में मैंने महसूस किया कि मेरी भाषा और विचार अपने सहपाठियों की तुलना में बेहतर होते हैं और इसके लिए मेरे मित्र ही नहीं, बल्कि अध्यापकगण भी मेरा सम्मान करते हैं। वहीं कहीं शायद आपके सवाल का जवाब उग गया होगा।

प्रश्न: तो इस प्रकार आप साहित्य से जुड़े। फिर आपने लिखना कब से शुरू किया?
उत्तर: वैसे तो विद्यालय पत्रिकाओं के संपादन-प्रकाशन से ही मेरा दखल शुरू हो गया था, किन्तु मैं 1976 से अपने लेखन को स्वीकार करता हूँ, जब वह व्यावसायिक पत्रिकाओं में स्थान पाने लगा।

प्रश्न: अपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?
उत्तर: पहली कहानी "पहला दिन आखिरी रात" थी किन्तु प्रकाशन सबसे पहले लोगों की स्वच्छता के प्रति घोर लापरवाही को लेकर लिखे गये एक लेख से हुआ जो एक विशाल पाठक-संख्या वाली बड़ी पत्रिका में हुआ।

प्रश्न: कौन सी विधा आपको स्वाभाविक लगती है? कौन सी विधा नापसंद है?
उत्तर: मैं कहानी, और बाद में उपन्यास को लेकर अपने को ठीक से अभिव्यक्त हुआ मानता हूँ। मैंने लिखा कविता, व्यंग्य, लघुकथा, नाटक, संस्मरण, बाल साहित्य, निबंध भी है। मुझे ऐसी विधाएं नापसंद हैं जो प्रायः फ़ैशन, नक़ल या लिखने वाले की सुविधा के अनुसार पनपती हैं।

प्रश्न: वर्तमान भारतीय हिंदी साहित्य का हिंदी से इतर भारतीय भाषा साहित्य, भारतीय अंग्रेज़ी साहित्य प्रवासी हिंदी साहित्य और विदेशी साहित्यिक धाराओं से क्या विशिष्ट अंतर पाते हैं?
उत्तर: आपका सवाल बहुत सटीक है। वैसे तो लेखक हर जगह लेखक होता है, तो इस तरह का कोई विभाजन दिखना ही नहीं चाहिए कि हिंदी से इतर, भारतीय अंग्रेजी साहित्य, प्रवासी हिंदी साहित्य, और विदेशी साहित्यिक धाराएं हमें साहित्य की अलग-अलग नस्लों के रूप में दिखाई दें। लेकिन अगर व्यावहारिकता को नज़र अन्दाज़ न करें तो तो ये भी सच है कि ऐसा विभाजन साहित्य में है, और बेहद मुख़र है। इसका कारण भी है।एक लेखक अपने परिवेश से बाहर की बातों को बातों के माध्यम से ही जानता है। चीज़ों की तरह ही आयातित बातें।

इसी तरह यदि वह भी अपने परिवेश का प्रतिष्ठित लेखक है, तो वह भी निर्यात हो रहा है।अथवा उसकी स्थानीयता निर्यात हो रही है। अब ये तो सब जानते हैं कि देश के भीतर बिक रहे माल और एक्सपोर्ट हो रहे माल में बहुत अंतर होता है। अपने परिवेश को लांघने वाला माल परिष्कृत, जांचा -परखा और ठोक बजाकर देखा हुआ होता है। वस्तुनिष्ठता को छोड़ दें, तो यही बात साहित्य पर भी मढ़ दी गयी है।

दूसरे, यदि हम विदेशों में रह रहे साहित्यकारों की बात करें तो ये भी सच है कि साहित्य में जो गंध या लक्षण "स्थानीयता" के कारण आते हैं, वे वहां के रचनाकार हमें ज़्यादा विश्वसनीयता और संजीदगी से दे रहे हैं। एक स्थान से अल्पकाल के लिए दूसरे स्थान पर यायावरी करते लोग या साहित्यकार जब साहित्य रचते हैं तो वे अतिरेक, अति-उत्साह या सांस्कृतिक विभेद के शिकार हो जाते पाए गए हैं। इस वास्तविकता ने ही हमें उस तरह का विभाजन दे दिया है जिसकी बात आप शायद कर रहे हैं।

मुझे तो लगता है कि अपने परिवेश के भीतर गोर्की भी उसी तरह आँखें नाम किये बैठे हैं, जिस तरह यहाँ प्रेमचंद होरी के हाल पर सिसक रहे हैं। दूर से चाहे एक दूसरे को वे "दिव्य"दिखाई देते हों।

अनुराग शर्मा
प्रश्न: समाज सेवा की प्रेरणा कैसे मिली? उसके लिये आप क्या-क्या करते हैं?
उत्तर: मुझे नहीं लगता कि समाजसेवा जैसा कुछ है। रूटीन से बचा अपना समय और अपनी बुद्धि किसी के काम आ जाये,अपनी ज़रूरत से ज़्यादा दिख रहा धन औरों के इस्तेमाल के लिए दे दिया जाये,तो बस यही सामाजिक जुड़ाव है। दिखावे और ज़ोर-शोर से कुछ करना तो समाज की छाती में अपना चम्मच इस तरह धँसाना ही है कि जिसमें "कुछ आ जाये" की लालसा छिपी है।

मैं तो समाजसेवा भी बहुत स्वार्थ से करता हूँ। कई बार ऐसे लोगों की मदद करने लग जाता हूँ जो किसी भी कारण से मुझे अच्छे लगते हैं। कई बार जो मैं नहीं कर पाया, वह काम कर रहे लोगों का साथ देने लग जाता हूँ। बिलकुल नीचे के तबके के लोगों के साथ मेरी बहुत ज़्यादा सहानुभूति नहीं होती, मैं मानता हूँ कि यदि आपमें ज़रा भी गैरत या ज़मीर है, तो आप अपने समाज की "सबसे निचली" पायदान पर नहीं हो सकते। हां यदि समाज के दबंगों ने आपकी गैरत और ज़मीर को कुचल कर आपसे मनुष्यता का मूल हक़ छीन लिया है तो मेरा मन ज़रूर रोता है।

प्रश्न: राही रैकिंग के बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइये? विचार कैसे आया? क्या पहले किसी ने ऐसा किया है? आगे इसमें क्या परिवर्तन अपेक्षित हैं? इसकी मान्यता कैसे बढेगी?
उत्तर: कई साल पहले मैंने हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका "धर्मयुग" में एक व्यंग्य लेख "साहित्य में रैंकिंग" लिखा था जिसमे उन लोगों का खूब मज़ाक उड़ाया था जो साहित्य क्षेत्र में अपना नाम चमकाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर साहित्यजगत के कंधे पर लद जाते हैं। धीरे-धीरे समय ने वो ज़माना ही ला दिया कि व्यंग्य वास्तविकता से दिखने लगे। लक्षणा,अभिधा और व्यंजना में कही गयी बातें एकसे "सपाट"अर्थ देने लगीं। तब मैंने सोचा कि जो लोग संजीदगी से लिख रहे हैं, पसंद किये जा रहे हैं, उन्हें आपा-धापी के बवंडर से बचाने के लिए कोई निश्छल-निष्कपट प्रयास किया जाये।

ऐसे में अलग-अलग जगह पर बैठे रुचिशील लोगों का एक छोटा सा समूह बना कर हम उन साहित्यकारों को ढूंढने लगे जिन्हें लोग खूब पढ़ रहे हैं और पसंद भी कर रहे हैं। हमने इनमें विद्यार्थियों, शोधार्थियों, गृहणियों, संपादकों, प्रकाशकों, समीक्षकों, पुस्तकालय-वाचनालय कर्मियों, पुस्तक वितरकों-विक्रेताओं से लेकर सामान्य रुचिशील पाठकों तक को शामिल किया।

व्यापार, फिल्मों, खेलों में तो ऐसा होता रहा है, हां,साहित्य में ऐसा पहले नहीं देखा। हम इसे ज़्यादा से ज़्यादा प्रामाणिक बनाने की कोशिश करेंगे। सोशल मीडिया और इंटरनेट इसमें हमारी पूरी मदद कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि जो पुराने साहित्यकार सोशल मीडिया से नहीं जुड़े, हम उनकी अनदेखी कर दें।

यदि हमारी कोशिशों में लोगों को कोई छल-कपट, स्वार्थ या भेदभाव नहीं दिखा तो शायद इसकी मान्यता भी बढ़ेगी।

प्रश्न: साहित्य के बीच विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं, गुटबंदी, मठ आदि के बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर: राजनीति,विचारधारा,गुटबंदी या मठ से कोई नुक्सान नहीं है। ये तो हमारी विविधता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या विचारों का पोषण करने की परंपरा का सम्मान ही है। सैनिक अकेले-अकेले भी लड़ते हैं, समूह में भी, और बलवानों के नेतृत्व में भी। जिस दिन ये सब न होगा, हम आप किस बारे में बात करेंगे?

प्रश्न: देश में अनेक सरकारी, अर्धसरकारी, गैर-सरकारी संस्थाएं हिंदी के विकास के नाम पर चल रही हैं। इनसे हिंदी का कितना नफ़ा-नुकसान हुआ है?
उत्तर: इनसे नुकसान नहीं फायदा ही ज़्यादा हो रहा है। लोग अलग-अलग मानस के हैं तो संस्थाएं भी तरह-तरह की चाहियें। सब सरकार के नहीं हो सकते, सब दरबार के नहीं हो सकते। हिंदी बढ़ रही है।

प्रश्न: मैं बचपन से ही उर्दू सुन-बोलकर बडा हुआ। लेकिन बडे होकर उर्दू-हिंदी की हास्यास्पद रस्साकशी को देखा। मुझे लगता है कि ब्रज या अवधी की तरह उर्दू भी हिंदी का एक डायलेक्ट ही है। बल्कि खडी बोली का एक उप-समुच्चय है. इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर: हिंदी और उर्दू अब अलग-अलग ही हैं। यदि हम इसे डायलेक्ट या उप समुच्चय मानने के प्रत्यावर्तन में जायेंगे तो और भी चीज़ों के एक दूसरे से जुड़े होने या पृथक होने का ये भ्रम बढ़ता ही जायेगा। उर्दू ही क्यों, हमें अन्य कई भारतीय भाषाओं के बीजों में भी ये रिश्तेदारी दिखाई देने लगेगी।

प्रश्न: सोशल मीडिया ने साहित्य, साहित्यकार और पाठक को किस तरह प्रभावित किया है?
उत्तर: सोशल मीडिया का प्रभाव गुणात्मक से ज़्यादा मात्रात्मक है। गति मिली है, चीज़ें साफ़ हुई हैं, वस्तुनिष्ठता बढ़ी है, हर हाथ में आइना है। व्याख्याकार नक्कारखानों में तूती बन कर रह गए हैं। बातें खुद-ब-खुद साफ़ हैं।ज़िन्दगी में सब शामिल हैं, एकाधिकार टूटे हैं। सपने महफूज़ हुए हैं। रास्ते ज़्यादा निरापद हैं।

प्रश्न: हिंदी के कुछ लोगों की शिकायत है कि प्रेमचंद को नोबल मिलना चाहिये था, पाकिस्तानी मित्र मानते हैं कि भारत उप-महाद्वीप में अल्लामा इक़बाल से बडा साहित्यकार जन्मा ही नहीं। यहाँ अमेरिका में गैर-हिंदी भाषियों को भी अगर हिंदी में कुछ नियमित पढते पाता हूँ तो वह तुलसीदास की कोई कृति होती है। इतनी भीड और पूर्वाग्रहों के बीच एक संघर्षरत वर्तमान हिंदी साहित्यकार के लिये आपकी क्या सलाह है?

उत्तर: कैसे मिलता? रवींद्र नाथ टैगोर के साहित्य की तरह उनका साहित्य अंग्रेजी में तब कहाँ उपलब्ध था। फिर हिन्दीवाले ये क्यों नहीं सोचते कि इन नोबल हस्तियों को ज्ञानपीठ या व्यास सम्मान भी तो नहीं मिला। यदि राशि के आधार पर ही कोई पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ है, तो विश्व में सर्वश्रेष्ठ भी हम कहाँ हैं? पाकिस्तानी मित्रों को इकबाल को सर्वश्रेष्ठ मानने का हक़ क्यों नहीं है अगर उनके देश में उसी का बोलबाला है।

अमेरिका में इस बात को शायद स्वीकार किया जाता है कि "रामायण" हिन्दू समाज का आधारग्रंथ है, इसे तुलसी का सबसे लोकप्रिय ग्रन्थ तो भारत में भी माना ही जाता है। और अब यह सभी भाषाओं में उपलब्ध भी है।रामचरित मानस एक किताब ही नहीं, एक जीवनशैली और एक संस्कृति है।

भीड़ और पूर्वाग्रहों के बीच संघर्षरत वर्तमान साहित्यकार को यही सलाह देने का मन करता है कि वो किसी की सलाह न माने। उसके पास अपना जीवन है, जिए, हाथ में कलम है,रचे।

अनुराग: सेतु के पाठकों के लिये अपना समय और विचार साझा करने के लिये आपका आभार!