अनुराग आर्य की लघुकथा

नया मन्त्र

पेशे के लिहाज़ से यह शनिवार कुल मिला कर एक मिला-जुला दिन है। क्लिनिक की पहली पारी ख़त्म होने को है। घडी में पौने तीन बजे हैं। सामने एक चालीस पार खूबसूरत सी दिखने वाली महिला है जिनके "फिलर" के मुताल्लिक ढेरो सवाल हैं। दो पचास पर मेरे मोबाइल का एलार्म बजा है। डॉ. गोयल को मैंने तीन बजे नर्सिंग होम में पहुंचने का टाइम दिया है। उनके अंडर में नेफ्रोटिक सिंड्रोम का एक बच्चा भर्ती है जिसको कुछ नए स्किन लिसन उभरे है। वे किसी संभावित ड्रग रिएक्शन को लेकर अपना शुबहा दूर करना चाहते है। वे वक़्त के पाबंद है, सीनियर भी। मेरी बैचैनी बढ़ने लगी है। रिसेप्शिनिस्ट नॉक करके अंदर आती है। कोई मिलना चाहता है? कौन? मै थोड़ा ऊबा हुआ हूँ पता नहीं कौन है?

- उससे कहो थोड़ा रुके।

उसे बस एक मिनट मिलना है। मै उसे घूरता हूँ, रिसेप्शिनिस्ट चली जाती है। वे मोहतरमा फिर एक नया सवाल सामने रखती हैं। मोबाइल  की घंटी! - डॉ गोयल तो नहीं? एक अनजान नंबर है ... कोई कॉल सेंटर। मेरी खीज बढ़ गयी है। बाहर से "जल्दी मिलने की" आवाज़ें तेज़ हो रही हैं।

"सर कोई बूढ़े बाबा हैं, उन्हें बस एक मिनट का काम है" रिसेप्शनिस्ट फिर अंदर आई है।
"भेजो" मै उकता कर कहता हूँ।

गाँव का एक बूढ़ा  नमस्कार करता है, मैले कुचैले धोती कुरते में। मै पहचान जाता हूँ मेरा पुराना पेशेंट है, मुझे लगता है कि फीस बचाने के लिए सिर्फ दवाई पूछना चाहता है।

"बोलो" मेरे स्वर में तल्खी है।

"डॉ साहब, तेजी से ट्रेक्टर दौड़वाकर आया हूँ, बाग़ में आम थे आपके वास्ते" वो आमो भरी एक बोरी एक आगे खिसकाता है। मैं उसे देखता हूँ फिर उसकी बोरी को।

जाते जाते वो एक मिनट रुकता है।

"जल्दी के लिए माफ़ करना डॉ. साहब, दरअसल बाहर लड़का ट्रैक्टर लिये खड़ा है। आपकी बिल्डिंग का चौकीदार उसे बार बार वहाँ से हटाने के लिए कह रहा है।"

सामने बैठी महिला फिर कुछ पूछ रही है पर मुझे उसका सवाल नहीं सुनाई नहीं दे रहा। जब कभी कुछ मुगालते इसको लेकर हो जाते है जिंदगी एक तजुर्बा मुंह पे फेंक कर मारती है।