ग्लोबल हुई दिवाली

मधु चौरसिया
-मधु चौरसिया

दीपावली का त्योहार हर्षोल्लास के साथ अब तो पूरी दुनिया मनाती है। हम भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में हो इस दिन गणपति और माता लक्ष्मी की पूजा करना नहीं भूलते। पंकज उधास की धुनों पर 'तेरे बिन जब आई दिवाली.. दीप नहीं दिल जले थे खाली ...' को सुनकर, देश की माटी की यादों में खोकर उदासी की चादर ओढ़ना भूल जाएँ, आज में जीना सीख सकें तो कह सकते हैं कि अब विदेशों में देश जैसी रौनक न होना धीरे-धीरे गुज़रे ज़माने की बात होती जा रही है। बल्कि कई कारणों के चलते भारत में अब दिवाली पहले सी नहीं रही। अमेरिका, कैनेडा, इंग्लैड, यूरोप, रूस, मंगोलिया, दुबई, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, सिंगापुर, नेपाल, मलेशिया समेत कई देशों में भारतीय पारंपरिक तौर से यह त्योहार मनाते हैं। अब तो स्थानीय नागरिक भी बहुतायत में इस त्योहार में शिरकत करने आते हैं। उन्हें भी भारत के त्योहार काफी आकर्षित करते हैं, खासकर दिवाली और होली। दुनिया के ग्लोबल गाँव में बदल जाने के बाद से तो यह प्रचलन लगातार बढ़ता चला जा रहा है।

विदेशों में लोगों को कुछ परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है, इसकी प्रमुख वजह घरों के निर्माण में लकड़ियों एवं ज्वलनशील पदार्थों का प्रयोग होना है। आमतौर पर यहाँ व्यक्तिगत स्तर पर दिए जलाकर छोड़ना और आतिशबाज़ी करने पर मनाही है मगर विशेष अवसरों पर सरकारी अनुमति मिलने पर ऐसा करना संभव होता है। इसीलिए यहाँ अधिकतर मंदिरों एवं अन्य सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह खुशियाँ मनाने का चलन है।
दिया जलाना भी हो तो काफी निगरानी के साथ जलाना होता है और जब तक लौ बुझ न जाए, सामने रहना पड़ता है। मिट्टी के दीपक जलाए भी जाएं तो हर दरवाज़े पर रखना मुश्किल होता है, क्योंकि तुरंत फायर अलार्म बजना शुरू हो जाता है। त्योहार वाले दिन यदि सप्ताहांत में न हों तो अलग से कोई सरकारी छुट्टी नहीं होती, हाँ मगर आप चाहें तो कोई अवकाश लेने से रोक भी नहीं सकता क्योंकि यह आपकी धार्मिक स्वतंत्रता के अन्तर्गत आता है। ठंड की वजह से पारंपरिक परिधान पहनना थोड़ा मुश्किल होता है। भारत में तो दिवाली से पहले युद्ध स्तर पर घर की सफ़ाई और रंगाई पुताई का काम होता है मगर यहाँ वर्षभर साफ़-सफाई रहने से अलग से ऐसे प्रयासों की आवश्यकता कम ही दिखाई देती है। कुछ लोग तो दोस्तों के साथ मिलकर यह त्योहार मनाते हैं लेकिन कुछ लोग परंपरा को मानते हैं और वो इस दिन शाम की पूजा के बाद घर से बाहर नहीं निकलते।

इंग्लैंड में भी यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल लंदन के मेयर ने ट्रफैल्गर स्क्वायर में एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें पूरी दुनिया के लोग शामिल हुए। इस कार्यक्रम में भारत की रंग-बिरंगी छवि देखने को मिली। रंगारंग क्रायक्रमों का वहाँ के नागरिकों ने भी जमकर लुत्फ़ उठाया। हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, तमिल जैसे गीत की धुन पर श्रोता झूम-झूम कर नाचे। भारतीय लज़ीज व्यंजनों ने सबका मन मोह लिया। इंग्लैंड में हर साल ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पर ये आयोजन दीपावली के दिन नहीं होता। अमूमन ऐसे आयोजन जगह जगह किये जाते हैं और ख़ासतौर पर इन्हें वीकएंड में रखा जाता है।  जरूरी नहीं कि वह उसी वीकेन्ड में हो। त्योहार से पहले या बाद में भी समय की सुविधानुसार रखा जा सकता है।

 कैनेडा में काफी पंजाबी रहते हैं, वहाँ की दूसरी भाषा के तौर पर पंजाबी को शामिल किया गया है। ऐसे में वहाँ भी लोग बड़े उल्लास से यह त्योहार मनाते हैं।  पूजा-पाठ की सामग्री भी आसानी से मिल जाती है, लेकिन वहां इन दिनों हल्की ठंड होती हैं जो सूरज ढलने के साथ-साथ बढ़ती जाती है। ऐसे में लोग देर रात घर से बाहर कम ही निकलते हैं। हालांकि दूरदराज के क्षेत्रों में भारतीय समुदाय के कम होने के कारण वहाँ इतनी रौनक देखने को नहीं मिलती।

अमेरिका में भारतीयों और भारतवंशियों की बड़ी जनसंख्या है। त्योहार के मौसम में वहाँ ग्राहकों को लगभग सभी सामग्री मुहैया कराई जाती है और यही कारण है कि अगर भारतीय ज़मीन को दो पल को नज़रअंदाज़ कर दें तो हर्षोल्लास देखकर कहीं से लगता नहीं कि हम देश से बाहर हैं। वहाँ तो मिट्टी के दीपक से लेकर दरवाजे के तोरण, बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने, रंगोली की सामग्री, पान के पत्ते, आम के पत्ते तक सब कुछ मिल जाता है। न्यूयॉर्क, शिकागो, सेन फ्रांसिस्को, वाशिंगटन डी सी जैसे महानगरों में अधिकांशतः वहाँ के मेयरों या बड़े नेताओं का भारतीयों की खुशी में शामिल होना न सिर्फ भारतीयों के प्रभाव को दर्शाता है बल्कि उनकी अन्य संस्कृतियों और देशवासियों की परम्पराओं को आत्मसात करने की क्षमता एवं सबके प्रति सद्भावना को भी उजागर करता है। इस बार न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यालय को दीवाली के अवसर पर लड़ियों से सजाया जाना और लेज़र से दीपक के साथ 'हैप्पी दिवाली' लिखा जाना भी भारतीयों को गर्वानुभूति कराता है।

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में अक्टूबर में रोशनी का ये त्योहार मनाया जाता है। पूरा शहर रोशनी से नहाया प्रतीत होता है।

मेलबर्न में हर साल फ़ेडरेशन स्कवायर पर दीवाली समारोह का आयोजन किया जाता है जिसमें बॉलीवुड का जलवा देखने को मिलता है। जहाँ भारतीय साजो-सामान के साथ-साथ फ़ूड स्टॉल्स भी लगाए जाते हैं। इस आयोजन में भारतीय ही नहीं मूल ऑस्ट्रेलियन सहित दुनिया के कई देशों के लोग भी शामिल होते हैं और जमकर आयोजन का लुत्फ़ उठाते हैं। वहाँ की सबसे ऊँची इमारत से आतिशबाज़ी की जाती है। यहां भी दिवाली के नज़दीकी सप्ताहांत ही इस कार्यक्रम का आयोजित होता है, पर संयोग है कि इस बार दिवाली रविवार की है सो ऐन दीपावाली वाले दिन ही ये कार्यक्रम हुए।

वियतनाम में रहनेवाले भारतीय भी ये त्योहार पूरे जोशो-ख़रोश से मनाते हैं। यहां बॉलिवुड संगीतकारों को बुलाया जाता है। भारतीय एक जगह एकत्र होते हैं। जहाँ सब मिलकर एक साथ त्योहार मनाते हैं। खाना-पीना होता है विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और उपहार एवं मिष्ठान्न का आदान-प्रदान होता है।

दुबई के फ़रारी वर्ल्ड में दिवाली के अवसर पर ढोल की धुन पर लोग झूमते हैं। भारतीय सिनेमा के नृत्य कार्यक्रमों पर ज़ोर रहता है। लेज़र शो का आयोजन होता है। अवसर का लाभ उठाने और अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए हर छोटी-बड़ी भारतीय दुकान में सामर्थ्यानुसार खरीद पर छूट दी जाती है।

रूस में भी पूरे परम्परागत तरीके से भारतीय समुदाय यह प्रकाशपर्व मनाता हैं। घरों में ही वो पूजा पाठ करते हैं। घर में दीप प्रज्वलित करते हैं। लेकिन घर से बाहर दीप जलाने की अनुमति वहाँ भी नहीं होती। घर के आसपास फुलझड़ी इत्यादि जलाते है परंतु वहां के नियम कानून के दायरे में रहकर। मॉस्को में भारत के काफी छात्र रहते हैं जो या तो स्वयं दिवाली कार्यक्रम का आयोजन करते हैं या फिर विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित दिवाली कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। यह सुखद आश्चर्य की बात है कि भारतीय पर्वों और त्योहारों की तैयारियों से लेकर उन्हें मनाने तक में स्थानीय लोगों की बड़ी हिस्सेदारी होती है।