सिम्मल के फूल

कंचन सिंह चौहान
- कंचन सिंह चौहान

वो बसंत के दिन थे। घरों के बाहर गमलों में पिट्यूनिया, पैंज़ी, लिली, डहेलिया ने जगह ले कर, अभी अभी गुज़रे शीत के तुषारापात से मुरझाये दालानों को रंगबिरंगा बना दिया था। सड़कों के किनारे बॉटलब्रश, पलाश, कनेर और सिम्मल से सज गये थे। शरीर पर कपड़ों के बोझ नही, बस थोड़े से अधिक गर्म कपड़े, कलाईयों तक आस्तीनें और स्टैण्ड कॉलर वाले कुर्ते खुद में ही अच्छा लगने का अहसास देने लगे थे।

शीशे के सामने खड़ी तपस्या खुद पर ही मुग्ध थी। "गौर से देखूँ तो? क्या है आखिर इस चेहरे में? जो स्कूल जाने से आने तक, छज्जे पर खड़े होने से बाज़ार जाने तक, जाने कितनी जोड़ी आँखें टकी रहती हैं, इस पर?" सोचते हुए उसने थोड़ा टेढ़े होते हुए आदम कद आइने में विश्लेषक निगाहों से खुद को देखा। पाँच फुट पाँच इंच ... लड़कियों के हिसाब से अच्छी ऊँचाई तो है ही। फिर सीधे खड़े हो कर आईने के और नजदीक गई जैसे अपना क्लोज़ अप लेना चाहती हो, "मिल्की व्हाइट इसे ही कहते हैं शायद।" दूध खौल कर थोड़ा गाढ़ा हो गया हो जैसे, वैसा हल्का बादाम और केशर छिड़का रंग। भवों में कुछ तो अतिरिक्त तराश थी ही।

"ये आँखें जो बिना काजल के कजरारी सी हैं, वो सबकी तो नही होतीं।" सोचते हुए उसने सिंगारदान पर पड़ी काजल की डिबिया उठायी और आखों की कोरों को बड़े सलीके से भर दिया। एक बार पलक झपका कर फिर से देखा उसने अपना चेहरा, जैसे किसी स्केच पर पेंसिल गाढ़ी कर हाईलाईट्स दे दी गई हों। नाक की कील पर बायाँ हाथ रख कर थोड़ा दबाव देते हुए उसने शीशे में देखा कि नाक बहुत तीखी तो नही, मगर सुडौल तो है ही। "क्या सच में बहुत बड़ी लगती हूँ?" सोचते हुए वो थोड़ा पीछे हटी और गर्दन के नीचे फिसलती निगाह को पसलियों के ऊपर ही रोक दिया " अपनी सहेलियों से ज्यादा भरा तो है ही।" शरारत से मुस्कुरा कर सोचते हुए वो आईने की तरफ पीठ कर के खड़ी हो गई और चेहरे को ४५ डिग्री पर मोड़ कर कुरते का पीछे से लुक देखने लगी।

"कालेज जाना है या फैसन परेड में?" कहते हुए हार कर कालिंदी देवी कमरे में ही आ गईं।

"यूनिफॉर्म में ही जा रही हूँ ना। प्रॉब्लम क्या है?" कहती हुई वह सधी कदम चाप के साथ तुनक कर बाहर निकल गई।

बाहर वत्सला आ चुकी थी। "चंचरीक से लड़ कर थक चुकी? जो आज अम्मा से?" सायकिल का स्टैण्ड लगाते हुए वत्सला बोली।

तपस्या ने सायकिल का स्टैंड हटाया और एक झटके में गद्दी पर बैठते हुए,पैडल पर तेजी से पैर चलाते हुए चल निकली। वत्सला दूसरी सायकिल पर समानांतर चल रही थी। तपस्या कुछ हठीले, कुछ मान भरे भाव से बोलने लगी " चंचरीक का नाम ना लिया करो। उस नवाबजादे को समझा दिया कि ऐसी लड़की ना समझना हमें, जिन्हे एक चिट्ठी लिखी और दूसरे दिन पिक्चर हाल में। हमें पढ़ना है। नौकरी करनी है। तुम्हारी तरह नेताओं के घर नही पैदा हुए हैं हम।"

" ये सब कहना ज़रूरी था?  इग्नोर करना भी एक चीज़ होती है।" वत्सला के सुर समझाइशी थे।

" नही कर पाते इग्नोर हम। क्यों करें? पूरी दुनिया उसकी गुलाम है क्या? वो सोचता है कि जिस चीज पर वह हाथ रख देगा, उसकी हो जायेगी। उसे नही पता कि दुनिया में हर चीज बिकाऊ नही होती।"

अब तक एक और सायकिल सामानांतर रेखा में, समान चाल में उन दोनो के साथ चलने लगी थी। यह निश्चय था। दोनो सहेलियाँ चुप हो गयीं।

कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के लड़कियों के साथ ऐसा होना बहुत सामान्य सी बात है। लड़के सुंदर लड़कियों को एक तरफा प्रेम करते हैं। लड़कियाँ पढ़ाई, घर, खानदान, इज्ज़त सब कुछ संजीदगी से लेते हुए इन प्रस्तावों को अनदेखा करती चलती हैं। वैसे भी एक सुंदर लड़की को जाने कितने प्रस्ताव मिलते हैं, वो कहाँ तक सबको स्वीकर करेगी। उसी तरह ये बात भी आई गई हो गई।

तपस्या उस दिन कॉलेज से लौटते समय सायकिल के पैडल पर पैर मारती अपनी ही धुन में मगन थीं, नज़र जहाँ तक जाती वहाँ तक सिम्मल की डाल डाल फूलों से लदी थी। बस फूल ही फूल एक भी पत्ती नही। फूलों ने ज़रा भी जगह नही छोड़ी थी किसी के लिये। वो खुद में ही प्रफुल्लित थे। खुद में ही परिपूर्ण। डाली डाली हँसती सी, स्वयं के सौंदर्य से लदी, फूली और अभिभूत। तपस्या को ये सिम्मल बहुत कुछ खुद जैसे ही लगते थे। ज़रूरत नहीं उन्हें किसी पत्ते की।। खुद का साम्राज्य, खुद में अलमस्त। मन में सोचती और थोड़ी सी गर्व से भरती हुई तपस्या ने सायकिल कुछ घुमा सी ली ‌और सिम्मल के पेड़ के नीचे ठिठक गयी। गद्दी पर बैठे हुए ही, उसने फूल की एक डाली की तरफ हाथ बढ़ा दिया। ढेर सारे लाल फूल अब उसकी सायकिल के आगे बनी बास्केट में थे।

"ऐसे ही कभी मेरी गाड़ी की फ्रंट साइड सीट पर तुम भी आ गिरो, फिर देखो मैं तुम्हे कैसे सजा के रखता हूँ" आत्मलीन तपस्या ने इस आवाज़ पर चौंक कर देखा, तो उसकी सायकिल के सामने स्विफ्ट डिज़ायर खड़ी थी और ड्राइविंग सीट पर चंचरीक बैठा था। उसकी मुस्कान बहुत कुटिल थी। साँवले चेहरे पर कुछ बड़ी और सुडौल आँखें, गले में रस्सी जैसी सोने की चेन, दोनो हाथ में आठ अँगूठियाँ, कुछ सोने की, तो कुछ मासिक पगार पाने वाले पंडित द्वारा बताये गये रत्नों से जड़ी। एक कान में सोने की बाली। आँख पर मँहगा चश्मा। जाने क्या सोच कर उसके पिता ने इस लाड़ले का नाम चंचरीक रखा था। अपने नाम को सार्थक करने की मुहिम में उसने कोई फूल नही छोड़ा था, जिसका पराग ना ले लिया हो।

तपस्या ने सायकिल आगे निकालने की सोची। लेकिन चंचरीक अब उसके सामने आ चुका था।
"किस बात का इतना घमंड तपस्या? इस रूप का?" कहते हुए चंचरीक ने धक्का दे कर उसे जमीन पर गिरा दिया और तपस्या के कुछ समझने के पहले एक बोतल खोल कर उसका सारा द्रव्य तपस्या के चेहरे पर उड़ेल दिया। तपस्या कुछ समझती इस से पहले चंचरीक की स्विफ्ट सब कुछ धूल में उड़ाती जा चुकी थी। तपस्या के बगल में एक खाली बोतल छोड़ कर।

तपस्या तड़फ रही थी। जाने क्या था,  जो फैलता जा रहा था, उसके पूरे चेहरे पर, हाथों में, गले में, सीने पर और फैलने के साथ जलाता चला जा रहा था उसे। शायद गलाता भी। तपस्या दर्द से चीख रही थी। उसका सिर घूम रहा था। वो उठने की कोशिश में बार बार गिर जा रही थी और आख़िर वह बेहोश हो गयी।

कस्बे के अस्पताल में पहुँचते ही तपस्या पर लगभग २०‍ २५ बाल्टी पानी डाला गया, जिससे कि जितना हो सके केमिकल बह जाये। अयोध्या बाबू, कालिंदी देवी और निश्चय जब अस्पताल पहुँचे तो तपस्या की जगह जाने कौन था, उसी यूनिफॉर्म में, जिसमे तपस्या सुबह कॉलेज गई थी। बहुत गुरूर था अयोध्या बाबू को अपनी बेटी पर। उनके गुरूर की शकल बदली हुई पड़ी थी। जगह जगह से मांस के लोथड़े निकले हुए थे। शरीर फाड़ कर निकलता हुआ ताजा गुलाबी मांस। खून से सनी देह। दौड़ कर बेहोश तपस्या को सीने से लगा लिया था अयोध्या बाबू ने। "ये क्या है? ये सब क्या है?" वो पागल की तरह बोल रहे थे। कुछ नर्सों और डॉक्टरों ने जबर्दस्ती अयोध्या बाबू को तपस्या से अलग किया। निश्चय ने देखा, जहाँ, जहाँ तपस्या का शरीर अयोध्या बाबू से लगा था, वहाँ उनके कपड़े जल गये थे। सैकड़ों लीटर पानी पड़ने के बावज़ूद तपस्या के शरीर में इतना सारा तेज़ाब था कि उसे छूने से दूसरा व्यक्ति जल गया था, तो तपस्या का क्या हाल होगा? सोच कर काँप उठा निश्चय।

डॉक्टर ने एसिड पड़ने के कारण ७५%  जलने की बात बताई थी और तुरंत शहर के लिये रिफर कर दिया था।
तपस्या की आँखें खुली तो अयोध्या बाबू उसके सिरहाने खड़े थे, उसके सिर पर हाथ फेरते हुए। तपस्या को कुछ कुछ याद आया। चंचरीक ने बॉटल से कुछ फेंका था। एक तीक्ष्ण, असहनीय जलन चेहरे पर तेजी से फैलती जा रही थी। होश और बेहोशी के बीच अस्पताल जाते समय "तेजाब डाल दिया" जैसी कुछ आवाज़ कान में पड़ रही थी। तपस्या सोचते ही सिहर गई। उसके हाथ में बैंडेज जैसा कुछ बँधा था। चेहरे पर दर्द था, तीक्ष्ण छरछराहट। उसने हाथ चेहरे के पास ले जाना चाहा तो हाथ उठा नही पायी।

"मेरा चेहरा खराब हो गया बाबूजी?" उसने घबरा कर पूछा।

"किसने कहा?" अयोध्या बाबू ने हारे हुए से सवाल में जवाब दिया।

"उसने कुछ फेंका था, तेजाब ही रहा होगा, सब कह रहे थे, तेजाब फेंक दिया… शीशा दिखाओ मुझे। प्लीज़ बाबूजी शीशा दिखाओ मुझे" कहते हुए उसने हाथ पैर झटकने की कोशिश की तो सारे शरीर में दर्द उठ गया।

"आऽऽऽ" एक बड़ी सी चीख के साथ फिर से बेहोश हो गई थी वह।

कालिंदी देवी फफक रही थी, अयोध्या बाबू ने कंधे का अँगौछा आँख पर रख लिया और आँसू पोंछते हुए वार्ड से बाहर निकल गये, नर्स को ये बताने कि तपस्या को होश आया भी और वो फिर से बेहोश हो गई।

तपस्या के दाये गाल से माँस का लोथड़ा बाहर निकला हुआ था। गले से ले कर वक्ष तक एसिड ने हाल बुरा कर रखा था। शरीर जला ही नही था, बल्कि जगह जगह से गला हुआ था। हाथ में पट्टियाँ बँधी थीं। पैर का भी बहुत सारा भाग जल गया था।

अयोध्या बाबू को अब आगे बस अँधेरा दिखायी दे रहा था। उनकी समझ में नही आ रहा था कहाँ से शुरुआत होगी। अपनी आर्थिक स्थिति वह जानते थे। पहली बात तो यह कि किसी तरह होश तो आये तपस्या को, फिर यह कि होश में आते ही तपस्या की सर्ज़री करायी जायेगी। सर्ज़री में कितना पैसा लगेगा, पता नही। गाँव पर आठ बीघा जमीन है़, उसे बेच देंगे। कालिंदी के गहने, उसने तपस्या की शादी के लिये रख रखे थे, उन्हे बेच दिया जायेगा। कुछ पैसे तपस्या की शादी के लिये डाकखाने में जमा करने शुरू किये थे, वो निकाल लेंगे। किसी से उधार माँगो भी तो क्यों देगा वो?  किसे नही पता कि चाय समोसे का होटल चलाने वाले की क्या औक़ात होती है। बहुत सारी कश्मकश के बाद फिर एक लंबी साँस के साथ खुद को दिलासा दिया अयोध्या बाबू ने कि कुछ भी करेंगे लेकिन इकलौती औलाद को बेचारा नही बनने देंगे।

वॉर्ड में लौटे तो कालिंदी देवी ने बताया की धीरेंद्र प्रताप सिंह के गुर्गे मधुसूदन मिश्रा का फोन आया था।  कह रहे थे कि धीरेंद्र बाबू को खुद बड़ा अफसोस है। चंचू को तो उन्होने उसी दिन से घर में घुसने भी नही दिया। उन्हे खुद नही पता कि कहाँ हैं वह?  चेक भिजवाने को भी कह रहे थे तपस्या के इलाज के लिए। लेकिन यह भी कह रहे थे कि लड़कौनी कि गलती समझ कर चंचरीक को माफ कर दें। अभी बड़ी लंबी जिंदगी पड़ी है, एफआईआर वगैरह ना ही दर्ज़ हो तो अच्छा।" अयोध्या बाबू चुप रहे, बंद ज्वालामुखी जैसे। मन में कोई बोल रहा था “नेताजी के भाई के कैरियर पर दाग आ रहा है, तो इतनी मनौवल, मेरी बेटी के शरीर और मन सब दाग दाग हो गये उसका क्या?"

तपस्या के जीवन में सब कुछ बदला गया उस दिन से... चेहरा, गति, रहन सहन... सब।

उसके हौंसलों की मौत हो गई थी। होश में आने के बाद,  बार बार फिर से बेहोश हो जाने का मन करता था उसका। हक़ीकत बहुत कठिन थी। उसे उस दिन और फिर एक एक दिन झेलना मुश्किल था, आगे ताउम्र, ना जाने कब तक? कैसे जी पायेगी  इसी तरह? कुछ पता नही था।

पता तो उसे यह भी नहीं था कि यह जो दुर्घटना हुई है, वह इतनी बड़ी बात है कि उस दिन से उसकी जिंदगी का रंग ही बदल जायेगा। वो उजला उजला सा दिखने वाला हर दिन, अब से धुँध भरा हो जायेगा। सिम्मल के फूलों पर मोहित हुआ करती थी वह। कभी यह नही सोचा था कि सिम्मल के पेड़ कितने कम दिनो के लिये, खूबसूरत लगते हैं। बसंत जाते ही हर तरफ फाहे फाहे उड़ते मिलते हैं। कभी किसी की आँख में गर्द बन, कभी किसी बिस्तर पर अनचाहा अस्तित्व लिये पहुँचते ही झाड़ दिये जाते हैं। अनचाहे, बदसूरत, बिखरे हुए। वैसी ही तो हो गई थी तपस्या...!! वो दिन भी थे, जब अपने अस्तित्व में किसी को जगह नही देती थी वह...! मान, स्वाभिमान, मुग्धता, सौंदर्य...! और अब ये दिन,  सब धुँआ, धुँआ....! फाहों सा सब कुछ हवा में...!! सब अनचाहा, सब बिखरा हुआ, बदसूरती के साथ।

सबसे नज़र बचा कर पर्स धीरे से खोलते हुए, तपस्या बार बार वह खाली बोतल देखती, जो चंचरीक घटना के दिन उसके बगल में फेंक गया था और निश्चय जाने कैसे उठा लाया था। ज़िंदगी उसी बोतल की तरह खाली हो चुकी थी।

दुनिया में एसिड अटैक जैसा भी कोई ज़ुर्म होता है या इस ज़ुर्म के इतने दुःखद और कष्टकारी परिणाम होते हैं, कुछ नही पता था तपस्या को। एक के बाद दूसरी सर्ज़री, एक के बाद दूसरा आश्वासन और हर बार तन और मन दोनो को मिलता असहनीय दर्द...! और इन सब के बाद जब घर आ कर छः महीने बाद उसने अपना चेहरा देखा, तब यह समझना कितना पीड़ा दायक था कि अब यह चेहरा हमेशा ही ऐसा दिखने वाला है। चेहरा जो सबकी पहचान होता है, वह अब तपस्या के पास नहीं था। उसकी पहचान बदल गयी थी। उस चेहरे को देखते ही अब लोग एसिड अटैक विक्टिम कहने लगते थे। यही शायद उसकी पहचान बन गयी थी अब। ... और फिर शीशे से  चिढ़ होने लगी थी उसे। खुद को दुनिया, परिवार, दोस्तों से अलग कर लिया था उसने।  कहानियों में प्यार में डूबे लोग कितने सुंदर, कितने निश्छल, कितने स्वार्थहीन हो जाते हैं। वह सोचती रहती "क्या मेरा ही अनुभव अलग होना था?"   और फिर तड़प कर सोचती, क्यों नही चंचरीक भी इस दर्द से गुज़र कर देखता। क्यों नही कोई  दण्ड उसके चेहरे को बिगाड़ कर, उसे शीशे के सामने खड़ा करता। अपनी सोच तालिबानी लगती तपस्या को। मगर वो असफल रहती, चंचरीक के प्रति खुद में दया और करुणा जगाने में।

हर नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों, जान पहचान वालों, सब ने किनारा कर लिया था अयोध्या बाबू के परिवार से। दुश्मनी धीरेंद्र प्रताप सिंह से जो पाली थी।

अयोध्या बाबू के एफ०आई०आर दर्ज़ कराने के दूसरे दिन चंचरीक सीधे कोर्ट में हाज़िर हुआ और अनन फानन में उसकी जमानत हो गयी। अयोध्या बाबू मुट्ठियाँ भींच कर रह गये थे।

गाँव की जमीन और कालिंदी देवी के ज़ेवर बेंच कर कुछ लाख रुपये का इंतज़ाम किया था। उससे कोई 4-5 सर्ज़री हो पाई थी। सर्ज़री के बाद अब जो थोड़े से पैसे बचे थे, उसी से मुक़दमा लड़ना था, मग़र, सबसे बड़ी बात यह थी कि धीरेंद्र प्रताप के खिलाफ मुक़दमा लड़ेगा कौन। इस शहर में तो कोई मुक़दमा लड़ने से रहा।
पूनम भल्ला अच्छी वकील थीं। औरत होन के कारण या फिर पता नहीं क्यों दर्द समझती थीं तपस्या का। टी०वी० और समाचारों में सुनने के बाद खुद आई थीं तपस्या का केस लड़ने को। किसी समाज सेवी संस्था से जुड़ी हुई थीं और लगातार महिलाओं के हक़ में लड़ाई लड़ रही थीं।

उनसे मिलने पर बहुत दिन बाद कुछ शब्द निकले थे निकले थे तपस्या के मुँह से " कितनी सजा दिलवा पायेंगी आप राहुल को।"

 " देखो बेटा एसिड अटैक में अब तक सिर्फ सात साल की सजा ही मिली है सबसे ज्यादा। वो भी तब, जब  विक्टिम का कोई अंग भी खराब हो जाये एसिड अटैक में।" पूनम भल्ला ने जानकारी देने के अंदाज़ में कहा था।
"जिसे एक दिन भी पुलिस थाने में नही रख पाई, उसे सात साल की सजा दिलवाना भी  मुमकिन नही लगता मुझे। फिर अगर मान भी लूँ कि सात साल की सज़ा आप उसे दिलवा भी देंगी, तो मेरे लिये ये वैसे ही होगा जैसे एक दिन की सज़ा। जो क़ैद मैं जीवन भर झेलूँगी, वो दूसरे के लिये सिर्फ सात साल क्यों?  मेरा पूरा शरीर एक बेज़ान पुतले की तरह हो गया है। मुझे इस दर्द के बदले में बस दर्द का सिंबल नही देना उसे। उसे महसूस होना चाहिये कि क़ैद के मायने क्या होते हैं। और सिर्फ सात ही साल देने हैं सज़ा के तो जाने दीजिये, टहलने दीजिये उसे। मैं हार गई हूँ। मैंने अपनी हार का मातम मनाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। उसे अपनी जीत का ज़श्न मनाने दीजिये।"
अजीब मौसम था उस कमरे का। ऊपर ऊपर ठहरा हुआ। स्थिर। मगर अंदर बहुत सारी हलचल।
पूनम भल्ला ने तपस्या के कंधे पर हलकी थपकी देते हुए कहा था "केस तो मैं लड़ूँगी बेटा। सुप्रीम कोर्ट तक लड़ूँगी। तुम बस अपना यह तेवर संभाल कर रखना।"

और फिर शुरू हुए थे लड़ाई के दिन। निचली अदालत में तारीखें पड़ने लगी। चंचरीक का वकील ये सिद्ध करने पर लगा हुआ था कि एसिड चंचरीक ने डाला ही नही। साथ ही यह भी कि तपस्या ने अपनी सुंदरता के चलते, कई लड़कों वश में कर रखा था और चरित्रहीन भी थी। उसने परोक्ष रूप से यह भी कहना चाहा कि तपस्या और निश्चय के नाजायज़ संबंध थे और शक़ के दायरे में निश्चय को लाने की कोशिश की थी।

अदालत में अयोध्या बाबू और तपस्या के साथ बैठा निश्चय आपा खो कर वकील के गिरहबान को पकड़ कर चिल्लाया था " साले तेरा ईमान धरम कुछ है या सब कुछ रात की शराब में घोल कर पी गया।" भरी कचहरी में हुई इस घटना पर वक़ीलों ने खूब हाय तौबा मचायी थी।

मुक़दमे में शंका के आधार पर सिर्फ छः महीने की जेल और दस हज़ार का ज़ुर्माना हुआ था, चंचरीक को।
जेल के दूसरे दिन ही जमानत हो ही जानी थी। लेकिन पूनम भल्ला ने बिना देरी के अगला मुक़दमा लखनऊ के हाई कोर्ट में लगा दिया था।

अपनी कुल जमा पूँजी लगाने और आघे का भी बहुत कुछ गिरवीं रखने के बाद जो मिला था वो यह पराजय थी। ना जाने कब तक परीक्षा लेनी थी ईश्वर को। अयोध्या बाबू की स्थिति अजीब सी हो गयी थी। उन्हे नींद आना लगभग बंद हो गया था। जिस लड़की पर सपूतों सा घमंड था, उस लड़की का ये हाल। उसके दुःख को कौन समझे? उसे चरित्रहीन साबित कर दिया गया? ऊपर से सामान्य दिखते थे, लेकिन उनके दिल और दिमाग एक पल को शांत नही थे।

वह अकसर हाँफने से लगते थे। सिर दर्द से फटने लगता था। लेकिन कहे तो किससे? उस दिन अचानक पसीना पसीना हो गये। कालिंदी देवी और तपस्या जब तक समझतीं और अस्पताल तक ले जातीं, वे ढीले पड़ चुके थे। पड़ोसी जब उन्हे अस्पताल ले गये तो डॉक्टर ने उन्हे मृत घोषित कर दिया। उनका हार्ट फेल हो गया था।
टूटी छानी के घर में एक औ‌र मूसलाधार बरसात की तरह ये घटना बरसी थी। तपस्या एक बार भी फिर टूटी हुई थी, फिर से हारी और गिरी हुई। लगभग एक माह तटस्थ पड़ी रही वह। चुप चाप।  सबसे नज़र बचा कर, फिर देख लेती वह खाली बोतल, जिसके खाली होने के साथ वह भी खाली हो गयी थी। दूसरे कमरे से आता माँ का विलाप हृदय विदारक होता था। कलेजे तक जाने क्या धँसता जाता था उस विलाप से। फिर भी कभी बस आँखों की कोरों तक, कभी बस आधे गाल तक, आँसू आते और उन्हे पोंछ लेती। रोने का मन नही होता था।

उसने ध्यान दिया कि माँ की खाँसी बढ़ती जा रही थी। कलेजा पक्का कर उसने दुपट्टा चेहरे पर बाँधा और माँ को हॉस्पिटल ले गई। सब की निग़ाहें उसे घूर रही थीं सड़क पर। सब निगाहें जैसे कह रही हों कि यही है वह लड़की है, जिस पर एसिड अटैक हुआ है। बहुत सारे टेस्ट हुए। रिपोर्ट से पता चला कि टी०वी० काफी बढ़ चुका है। अच्छे खान पान और मँहगी दवाओं की ज़रूरत है। अब बारी थी तटस्थ तपस्या को गति में आने की। अयोध्या बाबू अपने पीछे कर्ज़ के अलावा कुछ नही छोड़ गये थे। तपस्या को चप्पू हाथ में लेना ही था। उसने शहर जाने का फैसला ले लिया।

थोड़े से भी कम पैसे के साथ गई थी वह शहर। पूनम भल्ला ने गर्ल्स हॉस्टल दिलवा दिया था। रात को कंपनी के पतों पर टिक मार्क कर के सुबह फोन करती,  मीठी और सभ्य आवाज़ सुन कर कंपनी की तरफ से तुरंत बुला लिया जाता इंटरव्यू के लिये। मगर सूरत देखने के बाद फिर कोई राजी नही होता कंपनी में जगह देने को।
निश्चय पढ़ाई के लिये दिल्ली जा चुका था। पूनम भल्ला से तपस्या की खबर पा कर वह तपस्या से मिलने तुरंत लखनऊ आया। इतने सारे अजनबियों, अजीब निगाहों, अजीब व्यवहार के बीच उस दिन निश्चय का हॉस्टल आना हर बार से बहुत ज़्यादा संबल देने वाला था। निश्चय को सामने देख विस्मित, प्रसन्न और थकी हुई तपस्या की आँख बिना रुके बरस जाना चाहती थीं, लेकिन इतना ज्यादा प्रेम दिखाना उचित भी तो नही था, निश्चय के सामने। पानी में पड़ी, पानी से भरी कौड़ियों की तरह उसकी भरी आँखे ना समझ पा रही थीं कुछ, ना समझा पा रही थीं। उसका मन बस ये हो रहा था कि निश्चय से लिपट जाये, क्योंकि बहुत दिनो से भागते रहने के बाद कोई चट्टान मिली थी उसे, जिस पर इतनी देर की दौड़ के बाद थोड़ी देर को टिका जा सकता है। निश्चय ने उसकी द्विविधा से डबाडब आँखें देखीं और पास आ कर उसके सिर पर हाथ रख उसे अपने पास समेट लिया। इससे ज्यादा खुद को नियंत्रित करना अब तपस्या के वश में नही था। वो निश्चय के कंधे से लग कर देर तक सुबकती रही। निश्चय ने उसके आँसू पोछते हुए "परेशान मत हो तपस्या! वैसे भी मैं तुम्हे दिल्ली ले चलने को आया हूँ।" ये बात तपस्या की समझ से परे थी, तो उसकी उठी निगाह में प्रश्न के भाव होना स्वाभाविक था, निश्चय ने उस निग़ाह पर ध्यान दिये बगैर आगे कहा "पता है तपस्या! मैं तुम्हारे जैसे बहुत सारे लोगों के लिये लड़ना चाहता हूँ। मैं तुमसे भी वही काम कराना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम जैसी बहुत सारी लड़कियाँ मिल कर एक ऐसा आंदोलन चलायें कि दोबारा किसी की हिम्मत ना हो किसी फूल को बदरंग करने की।"

तपस्या के शून्य दिमाग में कुछ नही जा रहा था। उसे कुछ सुनाई नही दिया, उसके दिमाग में बस अपनी बात घूम रही थी। "मुझे नौकरी चाहिये निश्चय। कुछ दिन बाद मेरे घर में खाने को एक अन्न नही बचेगा। बाबूजी चले गये हैं। मैने अब भी कुछ नही किया, तो मेरी माँ की जिंदगी की उलटी गिनतियाँ शुरू हो जायेंगी। मुझे उसका इलाज कराना है। ये आंदोलन, सज़ा, कुछ नही करना मुझे। मेरे पास जो बचा है, मुझे उसे बचाये रखना है।
"तुम दिल्ली चलो तपस्या! मैं एक हफ्ते के अंदर तुम्हे नौकरी दिलवा दूँगा।" निश्चय ने पूरे विश्वास से विश्वास दिलाया।

"इतना आसान नही निश्चय! मैं रोज़ कर रही हूँ यही। नौकरी ढूँढ़ना सबके लिये मुश्किल काम हो सकता है, मगर मेरे लिये असंभव है। जमाना अच्छी पैकिंग का है, मेरा खोल उधड़ गया है।"

"तुम एक बार चल के देखो मेरे साथ, मेरे कहने से। अगर कुछ ना होगा तो ठीक पंद्रह दिन बाद, मैं तुम्हे दोबारा लखनऊ की ट्रेन में बैठा दूँगा। लेकिन एक और बात कि अगर मैने अपना वादा पूरा किया, तुम्हे बदले में मेरा काम करना होगा।" निश्चय की इस बात पर उठी तपस्या की संशय भरी निगाह तुरंत सामान्य हो गई "मेरे कैम्पेन का काम" सुन कर

दिल्ली पहुँचते ही एक बड़े से बूटीक़ में निश्चय ने तपस्या को काम दिला दिया। वहाँ की डिजाइन हुई ड्रेसेज़ पूरे देश और विदेश तक जाती थीं, बड़ी बड़ी कंपनियों को भी। शुरूआत में एक साल की ट्रेनिंग थी, जिसके उचित पैसे उस एक साल में मिलने ही थे,  फिर अगर काम में सफाई और दिमाग में क्रिएटिविटी हो तो उसी बुटीक में काम। तपस्या के पास समय नही था। उसने एक साल का काम चार महीने में सीख लिया। अब डिज़ायनिंग में भला कौन था तपस्या का सानी। छः महीने होते होते, तपस्या बुटीक मालकिन की चहेती बन गयी। बुटीक की आय बढ़ने लगी और तपस्या की सेलरी।

घर पर पैसे भेजने और दिल्ली में अपने रहने का खर्च निकालने के साथ अब उसके पास इतना पैसा था कि वह खुद का बुटीक खोल सके। साथ साथ उसने पार्लर का काम भी सीख लिया था।  बस जगह ढूँढ़नी थी। निश्चय ने अपना कैंपेन चलाने के लिये जो फ्लैट लिया था,  उसके एक भाग में तपस्या का बुटीक कम पार्लर चलने लगा था। निश्चय ने बहुत सारी एसिड अटैक विक्टिम का आत्मविश्वास जगा कर उन्हे अपने आंदोलन से जोड़ लिया था। तपस्या जैसी बहुत सी और एसिड अटैक विक्टिम उसमें साथ काम कर रहीँ थीं। सबकी अपनी लड़ाई, सबकी अपनी कहानी।

शुरुआत में तपस्या चेहरे पर दुपट्टा लपेटे बिना कहीं नही जाती थी। निश्चय ने उसे कहा "मुझे तो तुम अब भी उतनी ही खूबसूरत लगती हो और जिन्हें नही लगती, उनके लिये खुद को छिपाने की क्या ज़रूरत?" यूँ मुश्किल तो था उस चेहरे के साथ बाज़ार, मेट्रो, मॉल में घूमना। लेकिन निश्चय ने तपस्या में खूब सारा आत्मविश्वास भर दिया था।

तपस्या ने आईना देखना फिर से शुरू कर दिया था। उसे लगा कि यह एसिड अटैक उससे सँवरने का अधिकार नही ले सकता। उस दिन जाने क्या सूझी उसे, अपने पार्लर में ट्रेनिंग ले रही लड़की से उसने विशेष हेयर स्टाइल में अपने बालों को शेप देने को कहा। अभी कुछ ही दिन पहले डिज़ाइन किया हुआ सूट निकाला, जिसमें धागों की भारी एम्ब्रायडरी करी थी उसने। कुछ सोचा और फिर वही सूट पहन कर शीशे के सामने खड़ी हो गई। दायें गाल का काला दाग सामने था। उसने इग्नोर किया और आँखों मे जाने कितने दिनो बाद काजल फिर से लगा लिया। पास पड़ी एक छोटी सी बिंदिया अपने माथे पर लगा कर, वो तैयार हो गई। आज निश्चय के साथ प्रेस कॉंफ्रेंस में जाना था ना। उसने मुस्कुरा कर अपना चेहरा देखा। मुस्कान सभी चेहरों को कितना सुंदर बना देती है।

सीढ़ियाँ उतर कर, जब वह हॉल में पहुँची, तो निश्चय हतप्रभ सा देखता रह गया। तपस्या ने मुस्कुरा कर पूछा "क्या हुआ? सोच रहे हो कैसी अजीब लड़की है कि पता है कुछ भी कर ले शकल जैसी की तैसी रहनी है, फिर भी शौक को जिंदा कर रही है।"

निश्चय विस्मित था अब भी, जाने किस मैग्नेटिक एफेक्ट से वो पास आता जा रहा था और तपस्या के बहुत नज़दीक आ कर अचानक जैसे कुछ ख़याल आ जाये इस तरह ठिठकता हुआ बोला " सोच रहा हूँ कि तुम जानती थी, कि तुम इतनी सुंदर हो, तो पहले क्यों नही ये काम कर लिया।"

तपस्या को ये उम्मीद नही थी। वो झेंप गयी " मैने सोचा, प्रेस कॉंफ्रेस में चल रहे हैं, थोड़ा ठीक ठाक चलें।"
"हम्म्म् चलें?" निश्चय ने एकटक तपस्या को देखते हुए कहा।

"अ ... हाँ और क्या?"
प्रेस कॉंफ्रेंस में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनो मीडिया शामिल थे। प्रश्न पर प्रश्न शुरू हुए।
"निश्चय जी आप ने एसिड अटैक की समस्या को अपने कैंपेन के लिये क्यों चुना?"
"क्योंकि मैने ये दर्द बड़े पास से देखा था।"
"सुना है आप और तपस्या जी एक ही जगह के हैं।"
"जी सही सुना है।"
"यह भी कि आप दोनो एक ही कॉलेज में पढ़ते थे।"
"जी यह भी सही सुना है।"

किसी दूसरे चैनेल के पत्रकार ने पीछे से उठ कर पूछा " सुना तो ये भी है कि आप पहले तपस्या जी से प्रेम करते थे।"

निश्चय कुछ कहता इस से पहले तपस्या बोल पड़ी " हम एक कॉलेज में पढ़ते थे। उस समय हम सिर्फ पढ़ाई के बारे में सोचते थे और कैरियर के बारे में। हमें बस अपनी पढ़ाई और कैरियर से प्यार था।"

फिर से एक पत्रकार की आवाज़ आई " तब समय नही था, लेकिन अब तो किसी ना किसी के साथ शादी करनी ही है, दुनिया को इतनी सीख देने वाले आप क्या किसी एसिड अटैक विक्टिम से शादी कर सकते हैं?"
निश्चय ने तपस्या की तरफ गहरी नज़रों से देखा और कहा "हाँ! अगर वो तैयार हो, तो।"

कांफ्रेंस खतम होने के बाद तपस्या तेज़ क़दमों से बाहर निकल गयी। वह गुस्से में थी। निश्चय ने हाथ बढ़ा कर पीछे से तपस्या की बाँह पकड़ ली। तपस्या ने गुस्से में पलटते हुए कहा "ये क्या तमाशा है निश्चय?"

"तुम्हें सच में सब तमाशा लगता है तपस्या?"

"सब तमाशा ही लगता है। एक तमाशे का अंजाम मैं आज तक भुगत रही हूँ।"

"उस तमाशे के समय भी मैं तम्हे इतना ही चाहता था। तुम्हे कभी ये अंदाज़ नहीं हुआ?
" "
" "
"नहीं हुआ।" तपस्या ने खीझते से सुरों में कहा।

"कैसे होता? जो आज हो रहा है, वो पहले ही कभी हो जाने का डर, कैसे पता चलने देता तुम्हे। तब, जब चंचरीक तुम्हारा दीवाना था, से ले कर आज तक मैने दिन रात तुम्हे चाहा है। सुना औरत निग़ाह पहचानने में बहुत तेज़ होती है। पता नही कैसे तुमने आँखें बंद ही रखीं हमेशा।"

तपस्या गंभीर हो चुकी थी "मैने उस उम्र में प्यार का भयानक रूप देख लिया जिसमें लड़कियाँ प्यार के अलावा कुछ नही सोच पातीं। प्यार करने के लिये सबसे पहले एक खूबसूरत चेहरा होना चाहिये। चंचरीक जिस चेहरे को प्यार करता था, जिसके पीछे पड़ा था, उसे उसने खुद बरबाद कर दिया। अब मेरे पास कुछ नही है, किसी के लिये।"
"
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"चेहरे को चंचरीक चाहता था, मै तब भी तपस्या को चाहता था, अब भी तपस्या को ही चाहता हूँ। लेकिन मैं चंचरीक नही, मुझे कुछ भी जबर्दस्ती नही चाहिये। जब तक तुम ना चाहो।"

इसके आगे कुछ कहने सुनने की ना तो जरूरत थी, ना समय। तपस्या और निश्चय  इस समाज से तेजाब की आग को जड़ से हटा देने के मकसद में लगे थे। कितनी अप्लीकेशन, कितनी रिट, कितने बिगड़े चेहरे बस यही था जो दिख रहा था।

पूनम भल्ला ने जी जान लगा दी थी। उस लड़ाई का एक ईमानदार और मुख्य हिस्सा थीं पूनम भल्ला। धीरेंद्र प्रताप के कई प्रलोभन आ चुके थे। तपस्या को चरित्रहीन प्रमाणित करने के कई प्रयास भी किये जा चुके थे। लेकिन तपस्या को ना प्रलोभनो पर डिगना था और ना ही उसे चरित्र प्रमाण पत्र की परवाह।

निचली अदालत से हाई कोर्ट जाने कितनी तारीखों मे जाने कितनी बार हार कर आज फैसला आना था। चंचरीक किसी भी दिन नही आया कोर्ट में। अंगभंग होने की दलील में पूनम भल्ला ने बार बार तपस्या का चेहरा सामने रखा था, जो शरीर का एक भाग था और भंग ही था। उसकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हुई थी जिससे। डॉक्टर के शुरूआती सर्टिफिकेट दिखाये थे, जो बताते थे कि जिंदगी और मौत में बस एक लकीर का अंतर था और ज़रूरी नही कि हमेशा शहादत के बाद ही परमवीर चक्र दिया जाये। कुछ लोग जो मौत को चूम के वापस आ जाते हैं, वीरता का पदक उन्हे भी मिलना चाहिये। ७५ %जली लड़की के अपराधी पर हत्या नही तो हत्या के प्रयास का मुक़दमा ज़रूर चलना चाहिये।

आज महत्वपूर्ण बहस हो सकती थी। इसीलिये तपस्या और निश्चय भी थे कोर्ट में। चंचरीक का वक़ील दलील दे रहा था। " मी लॉर्ड मेरी साथी दोस्त बिना किसी आधार के उम्र क़ैद की दलील दे रही हैं। जबकि वह भी जानती हैं कि एसिड अटैक में अंग भंग ना होने की स्थिति में सात साल से अधिक सजा नहीं दी सकती। तपस्या बिलकुल स्वस्थ हैं, किसी भी प्रकार की डिसैबिलिटी नहीं आई है उनमें।"

"डिसैबिलिटी मीन्स व्हाट?" अपनी जगह पर बैठी हुई तपस्या चीख पड़ी थी बार बार एक ही दलील सुन कर।"
जज ने थोड़ी कड़क और संतुलित आवाज़ में कहा, "आपको जो भी कहना है विटनेस बॉक्स में आ कर कहें।" तपस्या ने विटनेस बॉक्स में खड़े हो कर फिर से अपनी बात कहनी शुरू की, "मै पूछना चाह रही थी कि डिसैबिलिटी मीन्स व्हाट मीलॉर्ड? मैं घर से नहीं निकली तीन साल तक। बिकाज़ आई वाज़ नॉट ऐबल टु फेस प्यूपल। किसी भी आफिस में नौकरी देने को कोई तैयार नहीं था, क्यों? बिकाज़ आई वाज़ मोर डिसैबल दैन अ डिसैबल परसन। उस व्यक्ति से कोई डरता नहीं है। लेकिन मेरा चेहरा डराता है। मुझसे घिन आती है लोगों को। मेरा शरीर डिफॉर्म नहीं हुआ मीलॉर्ड! मेरी आत्मा डिफॉर्म हुई है। मेरा मन डिफॉर्म हुआ है।"
सारी अदालत शांत थी। जज ने अपना फैसला लिखना शुरू कर दिया था।

चंचरीक को उम्र कैद के साथ साथ कई महत्वपूर्ण फैसले दिये थे जज साहब ने आज। यह भी कि अब खुलेआम तेज़ाब बेचना अपराध होगा। यह भी कि एसिड अटैक विक्टिम को तुरंत पाँच लाख रुपये और किश्तों मे ५० लाख रुपये की सहायता राशि दी जायेगी। यह भी कि एसिड अटैक सर्वाइवर के लिये रोजगार की सुविधा उपलब्ध कराई जायेगी और रिहैबिलिटेशन सेंटर बनाये जायेंगे।

पूनम भल्ला, तपस्या और निश्चय अद्भुत खुशी से नहाये हुए थे। कुछ कहना मुश्किल हो रहा था सबका। निश्चय ने काजू की बर्फी का एक टुकड़ा तपस्या के मुँह में डालते हुए कहा "जीत मुबारक़ मेमसाब" और देखा तो तपस्या के चेहरे पर आँसू लुढ़क रहे थे। वह लगना तो निश्चय के सीने से चाह रही थी, लेकिन दौड़ कर पूनम भल्ला से लिपट गयी।

तपस्या की मनःस्थिति अजीब सी थी। जाने कितने दिनो की तमन्ना थी, एक बार चंचरीक से मिलने की इस तरह़। इस तरह जिसमें बस देख कर बता सके वह कि जीतने के लिये ओहदा नही जज़्बा चाहिये, कि अपनी शर्तों पर जीने का अधिकार सिर्फ तुम्हे नही, मुझे भी है, अमीरी, गरीबी, पुरुष, नारी से परे।

कितने ही टी०वी० चैनल के संवाददाता माइक लिये एक जगह खड़े थे। शायद चंचरीक वहीं होगा। तपस्या उधर ही चल दी। तपस्या को देखते ही सभी माइक और कैमरे उसकी तरफ घूम गये। उन्होने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी। लेकिन तपस्या को  कुछ नहीं सुनाई दे रहा था। वह सबको हटाती हुई आगे बढ़ी जा रही थी। निश्चय बिना कुछ सोचे समझे उसके पीछे था। छँटती भीड़ से उन्मादिनी सी गुज़रती तपस्या के सामने अचानक अजीब सा कुछ आ गया। यह चंचरीक था। जिसकी तलाश में वह यहाँ आई थी। " सुनो चंचरीक" कहते हुए उसने अपने पर्स से एक बोतल निकाल ली। चंचरीक की आँखें फट गयीं। चेहरा सफेद पड़ गया। धीरेंद्र प्रताप सिंह चीख पड़े। चंचरीक ने पूरी ताकत से भागने की कोशिश की, लेकिन रई रई जमीन लोगों से भरी पड़ी थी। निश्चय पीछे रह गया था। वह वहीं से चीखा "तपस्या पागल मत बनो, बोतल दूर फेंको।" लेकिन इतनी देर में तपस्या बोतल खोल कर चंचरीक के नज़दीक पहुँच चुकी थी और "सप्प्प" की आवाज़ के साथ बोतल का सारा लिक्विड चंचरीक पर फेंक दिया था। चंचरीक अपने चेहरे पर हाथ रख कर चिल्ला रहा था। वह तुरंत गिरा और बेहोश हो गया। धीरेंद्र प्रताप सिंह पागलों की तरह चीख रहे थे। दुनियाँ की कोई गाली उन्होंने नहीं छोड़ी थी, जो तपस्या के लिये निकली ना हो। कई साथियों ने मिलकर उन्हे पकड़ रखा था, और वह " अरे छोड़ो याऽऽर! चंचूऽऽ चंचूऽऽ। अरे उसे गाड़ी में डालोऽऽ। डॉक्टर के पास ले चलो" की आवाज़ के साथ पागल हाथी की तरह सब कुछ तोड़ कर निकलना चाह रहे थे।

तपस्या चुपचाप खड़ी थी। मीडिया ने उसे घेर रखा था। पुलिस उसे पकड़ने के लिये पहुँच चुकी थी। उसने शांत भाव से एसआई से कहा " पानी था इंस्पेक्टर साहब! बोतल में एसिड नहीं था।" इंस्पेक्टर ने फिर से चंचरीक की तरफ देखा वह बेहोश पड़ा था। उसका चेहरा और बाल सब भीगे हुए थे। तपस्या ने चंचरीक की तरफ हिक़ारत से देखते हुए कहा "बस झलक दिखाना चाहती थी चंचू बाबू को उस दर्द की, जिसने मुझे सामान्य से असामान्य बना दिया।"

चंचरीक अब भी बेहोश था। निश्चय तपस्या के कंधे पर हाथ रखे मुस्तैद सिपाही सा खड़ा था। बुटीक की बहुत सी लड़कियाँ वहाँ आ गयी थीं। सबके दाग अचानक खिले खिले से दिखने लगे थे। तपस्या, उनमें से एक को गले लगा कर आगे बढ़ गई। मौसम में चमकीली रंगत थी। बसंत और फागुन एक दूसरे गले मिल रहे थे। सामने के सिम्मल के पेड़ में फिर कुछ लाल फूल अँखुआ आए थे। तपस्या ने निश्चय की तरफ देख कर कहा " लड़ाई अभी खतम नही हुई निश्चय।"