विभा रश्मि की लघुकथा

विभा रश्मि
रोटली महारानी


"आज दिनभर जंगल से लकड़ियाँ काटनी-बीणनी होंगी। लकड़ी के गट्ठरों को भील बस्ती तक एकला न तो काट सकूँ , न 'टो' सकूँगा, माथे पर उठाए-उठाए कैसे फरूँगा।"

रमेस ने कूट की तेज धार को देखते हुए कहा।
"हम सब छोरे हैं तेरे लारे , तू एकला नहीं रमेस।"
"ताई मरण वाली है, आज या कल तो मोत, मैं तो मोत से डरपता हूँ।"
रमेस के चेहरे पर हल्का दर्द और डर के भाव एक साथ उभर आए थे- 
"अगर आज - कल में मरेगी  तो  इलाज रा पिसा बच जाएगा।"
"मेरा बापू आज सबेरे  बड़े बापू से कह रहा था।"
सारे लड़के-लड़कियाँ, अपने-अपने ढोर-बकरियों को वन में चरता छोड़, अपने पक्के भायले की मदद में जुट गये। मिल कर सबने लकड़ी बीणी-काटीं। रमेस की उँगली और हथेली पे 'कूट' चलाते-चलाते फाले पड़ गये थे। 
छोरे-छोरियों ने लकड़ी के गट्ठर अपणे माथे 'टो' कर जद कच्ची बस्ती तक पहुँचाये तो सारे बिरादरी के 'मनक लोग' कच्चे-पक्के टापरों-टपरी के आगे उकडूँ  बैठे दिखे।
"तेरी ताई बापड़ी बचगी है, 'भोपा जी' ने पूजा-अर्चना की और पुरखों-पितरों पे एक बकरे का चढ़ावा माँगा, तब मानता माँगी।"
"इब तबियत पाणी ठीक वैइग्यो है।"
"दवा और डाग्दर रा पिसा बचा, मौताणे रे झगड़े -झंझट से छूट गयो। लाकड़ियाँ बचीं, मिरतु-भोज रा पिसा बचा। " 
"बचत होग्गी  रे।" बापू और बड़े बापू ने उन्हें देख तम्बाकू खाए काले-पीले दाँत पाड़ दिये ही ही करके।
"रमेस तू अब कई दिणा तक जंगल नहीं जाएगा, लकड़ी बीणने-काटणे री छुट्टी। सब बापड़ी ताई ने किदा।"
"रमेस तेरी ताई बाचगी, उसे बलाने  और कियाकरम में  सारी लकड़ी भस्म हो, राखोड़ी बन जाती...।"
" इब या लकड़ी म्हाने दस दिनां री साग-रोटी देग्गी। चुल्हा बलेगा म्हारा घराँ में, दोन्यू टैम रा।" 
बड़े बापू री खुसी पतो पड़ री थी।
"तेरी ताई होस में है इब । साग-रोटी री तपती नहीं पड़ेगी, कुछ दिनां पाछे रोटली-साग बणाने लग जायेगी।" बड़े बापू को केवल अपनी भूख ही महत्वपूर्ण लगी।
"रोटी के टिकड़े के आगे रिसते भी ओछे, 'रोटली' होवे महारानी।" 
कहते-कहते बापू  ने हाथ जोड़कर माथे से छुला दिये। उसका पेट मरोड़े खान लग्या था...।