दीवाली की पाती - अम्मा ...

गिरिजेश राव

अम्मा! आज जब तुम दिया जलाओगी तो मुझे पता है कि आंसुओं को रोके रखोगी। दो बेटे, बहुएँ, नतिनियाँ और पोते लेकिन बरम बाबा के बगल का गँवारू मकान सूना रहेगा। अकेले पिताजी से इधर उधर की बातें कर अपना और उनका मन बहलाओगी। मुझे पता है अम्मा कि त्योहार के दिन रोना अच्छा नहीं होता – तुमसे ही सीखा है। इसीलिए आज तुम आँख नम नहीं करोगी।

 मुझे पता है अम्मा कि कल दलिद्दर खेदते वक्त तुमने जब सूपा खटकाया होगा तो मन ही मन गाजियाबाद और लखनऊ के घरों से भी दु:ख दलिद्दर खेद दिया होगा। नए जमाने की बहुएँ और बीबियों के गुलाम बेटों को इन रस्मो रिवाजों से क्या मतलब? एक क्षण के लिए तुम्हारे मन में ये बात आई होगी लेकिन झट तुमने खुद को धिक्कारा होगा और धर्मसमधा की दुर्गा माई से लेकर गाँव की हठ्ठी माई तक उन घरों की मंगल कामना के लिए कपूर और जेवनार भाखा होगा। मुझे पता है अम्मा।

 अम्मा दियों को धोने के बाद सुखाते समय तुम सोच रही होगी कि रोशनी के इस त्योहार में डूबते सूरज सरीखे बूढ़ों का क्या काम? लेकिन फिर मन मार कर तुम पाँच कच्चे दियों में गंगा, यमुना और जाने कितनों के लिए शुभ के घी दीपक बारोगी।

 मुझे याद है अम्मा दिए में तेल भरते तुम सिखाती रहती थी जाने कितनी बातें जो तुम्हारे हिसाब से लड़कियों को जानना जरूरी था। तुम्हारी कोई बेटी न थी सो बेटों को ही यह सब सिखा कर संतोष कर लेती थी। तुम्हारे बेटे नालायक निकले अम्मा क्या करोगी? उन्हें कुछ याद नहीं रहा।

 अम्मा, तुम्हारी एक बात याद है कि दिये की लौ पूरब की तरफ होनी चाहिए। मैंने अपनी बीबी को बता दिया है, बच्चे भी जानते हैं – बस उन्हें बताना पड़ता है अम्मा कि पूरब किधर है!

 अम्मा, मुझे याद है घर की हर महत्त्वपूर्ण चीजों पर दिया रखना – जाँता, ढेंका, चूल्हा, बखार, नाद, खूँटा, घूरा, इनार, नीम ... अम्मा! मुझे पता है कि कितनी सहजता से तुमने बदलावों को अपनाया है। जाँता की जगह मिक्सी, चूल्हे की जगह गैस स्टोव, बखार की जगह टिन का ड्रम ...

ढेंका, नाद, खूँटा, इनार ... सब अगल बगल रहते हुए भी खो गए अम्मा! आज इन्हें कोई नहीं पूछता लेकिन मिक्सी, गैस स्टोव और ड्रम के साथ खो चुके निशानों पर भी आज तुम दिया जरूर बारोगी। अम्मा मुझे पता है।

 बगल के बरम बाबा का अस्थान टूट चुका है। गढ्ढा हो गया है वहाँ। मुझे पता है कि तुम्हें ‘नरेगा’ नाम नहीं मालूम लेकिन ये पता है कि गाँव में खूब पैसा आ रहा है और लूट खसोट मची है। आज बरम बाबा के अस्थान दिया बारते तुम एक क्षण नासपीटों को कोसोगी कि मुए यहाँ तो मिट्टी पटवा देते, फिर राम राम कहोगी। त्योहार के दिन बद् दुआ? अरे सभी फलें फूलें! अम्मा एक बार फिर तुम गाँव के सारे देवी देवताओं को गोहराओगी। मुझे मालूम है अम्मा।

 काली माई के अस्थान पानी भरा है। नवेलियाँ नहीं जाएँगी वहाँ लेकिन कोसते हुए भी तुम किसी लौण्डे को पकड़ कर वहाँ दिया जरूर रखवाओगी। अम्मा, मुझे पता है।

 परम्परा से ही हठ्ठी माई का अस्थान पट्टीदार के घर में है। आज वहाँ तुम जब दिया जलाने जाओगी तो वह दिन याद करोगी जब बहुरिया बन उस घर में उतरी थी। तब बंटवारा नहीं हुआ था और सात सात भाइयों वाला आँगन कितना गुलजार रहता था! अम्मा तुम याद करोगी कि हठ्ठी माई वाले कोठार में तुम कितनी सफाई रखती थी! आज उस घर की औरतों के फूहड़पने को कोसोगी, और एकाध को खाने भर को झाड़ दोगी, फिर जुट जाओगी सलाना सफाई में – जल्दी जल्दी।

 दिया बार कर चुपचाप अपने घर जब वापस आओगी तो पिताजी को ओसारे में उदास बैठा पाओगी – मेरा इतना बड़ा परिवार और आज कोई नहीं यहाँ! पिताजी भावुक हो कहेंगे और तुम समझाओगी कि नये बसे घरों में दिवाली के दिन घर की लक्ष्मी को वहीं रहना होता है नहीं तो दिवाला पिट जाता है। दशहरे में ही तो आए थे सभी! और फिर बच्चों की पढ़ाई, आने जाने का खर्च, छुट्टी ... जाने कितनी बातें तुम ऐसे बताओगी जैसे उन्हें मालूम ही नहीं! मुझे पता है अम्मा!

और फिर घर के भीतर चली जाओगी क्यों कि तुम्हारी सिखावन को भुला कर आँसू ढलक आए होंगे और तुम्हें उन्हें एकांत में पोंछना होगा!

 अम्मा! मुझे पता है कि घर से बाहर तुम पूजा का प्रसाद और दिया वाली थाली लेकर ही निकलोगी। पूरे दुआर पर पिताजी से जगह जगह दिये रखवाओगी। उन्हें काम में उलझाए रखोगी। दिल के मरीज का बहुत खयाल रखना पड़ता है। अम्मा, मुझे पता है।

 सबके घर परदेसी बेटे बहुएँ कमा कर आए होंगे। गाँव गुलजार होगा और तुम्हारा घर उदास होगा। अम्मा कहीं मन के किसी कोने में तुम सोचोगी कि बच्चे अब दशहरे में गाँव क्यों नहीं आते? तुम्हें समझ भले न आए अम्मा लेकिन इस पाती में मैं समझाता हूँ।

अम्मा अब गाँव बदल गया है। बताओ अम्मा अष्टमी के दिन अब कीर्तन क्यों नहीं होता? होली के दिन लोग फगुआ क्यों नहीं गाते? लोगों में अब प्रेम नहीं रहा सो दशहरे का मिलना जुलना बस दिखावा और लीक पीटना रह गया है। दिवाली में आना तो बस बहाना है अम्मा, उन्हें अपना नया कमाया धन चमकाना है, लुटाना है और फिर चले जाना है एक साल के लिए ...

अम्मा! तुम्हारे राम लक्ष्मी मइया से हार गए। अब दशहरे के दिन जवान गाँव नहीं आएँगे ...