गिरिजेश राव

प्रतिमाओं को गढ़ा जाता है उस अनुभव को मूर्त करने के लिये, मूर्ति इसीलिये कहते हैं। सूक्ष्म स्तर तक सभी नहीं जा सकते इसलिये स्थूल विग्रह का आधार दिया जाता है कि उसी बहाने जीवन सत्त्व से कुछ जुड़ाव बना रहे। ~ गिरिजेश राव "सनातन कालयात्री"
गिरिजेश राव उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले के एक छोटे से गाँव घोरठ के निवासी हैं जिसे कुछ पुरनिये सन् 1857 की क्रांति के पश्चात दो विद्रोही सैनिक बन्धुओं द्वारा बसाया गया बताते हैं तो कुछ उससे भी पहले महोबा से निष्कासित राजपुरुषों द्वारा।

इन्हों ने अभियांत्रिकी स्नातक मदन मोहन मालवीय इन्जीनियरिंग कॉलेज गोरखपुर से और परास्नातक की शिक्षा रुड़की विश्वविद्यालय से पूरी की। अभियांत्रिकी प्रबन्धन की जीविका के कारण भारत भ्रमण होता रहता है। इनकी अभिरुचि स्वाध्याय है।

पिछले आठ वर्षों से ‘आलसी का चिठ्ठा’ और ‘कविता विहंगम’ नाम के हिन्दी ब्लॉग लिखते रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं।

लेखक वृंद