खूबसूरत है वो इतना ...

गौतम राजरिशी
कहानी - गौतम राजरिशी

"शादी करके किसी एक शख़्स के साथ पूरी ज़िंदगी कैसे गुज़ारी जा सकती है" ...सुशांत ... सुश का बस यही वो डायलॉग था, जिसने लाल-गुलाबी-नीले-नीले खुशनुमा दिनों को गहरी काली-भूरी उदास शामों की चादर से ढँक दिया था। नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ कि क़यामत आ गई या धरती डोल उठी या फिर आसमान फट पड़ा और ऐसा भी कुछ नहीं हुआ कि रति टूट गई, बिखर गई, कहीं की नहीं रही। रति की सही सही प्रतिक्रिया क्या थी, ये तो अब इतने सालों बाद बता पाना संभव नहीं और सच तो ये है कि सुश ने आखिर ऐसा किस रौ में आकर कहा था, बाद के वर्षों में इस बारे में हर्ष जितना सोचता उतना ही उलझता जाता था। कहा तो और भी कुछ था सुश ने उस डायलॉग के साथ ...जैसे कि उसका शादी जैसी संस्था में विश्वास नहीं है...कि जमाना लिव-इन रिलेशन का है ...वगैरह वगैरह। अब कभी जो सुश से हर्ष पूछता कि क्यों कहा था उसने ऐसा अगड़म-बगड़म रति से, तो उसका बस एक ही जवाब होता ...”ख़ुद को मूर्ख साबित करने के लिए किसी मुहूर्त की दरकार थोड़ी ना होती है...आई वाज स्टूपिड एंड आई एम पेईंग फॉर माय सिन !”...वैसे उन दिनों सुश के पास ना तो लड़कियों के लिये वक़्त होता था और ना ही लड़कियों में कोई दिलचस्पी होती थी उसे, जिसके लिए हर्ष अक्सर उसकी क्लास लिया करता था। उसके तो बस दो ही शौक़ थे ... पहला, फुटबॉल और टेनिस और दूसरा, उसका प्रोफेशन। लेकिन सालों पहले सुश के उस डायलॉग का लब्बोलुआब जो उस वक़्त रति ने निकाला था वो यही था कि सुश की उसमें कोई दिलचस्पी नहीं।

वैसे कितने साल पहले की बात होगी ये? सोचने बैठता है हर्ष तो सदियों पुरानी बात लगती है और ऊँगलियों पर गिने तो बात बहुत साल पहले की भी नहीं है ... रति सुश की कंपनी में आई थी आईटी स्पेशलिस्ट बनकर तकरीबन आठ साल पहले। तब तक सुश को चार साल हो चुके थे कंपनी ज्वाइन किए हुये और रति के आते ही उसे सुश के अंडरस्टडी के तौर पर नियुक्त कर दिया गया था। सुश के जिम्मे में आईटी का पूरा दारोमदार था उस मल्टीनेशनल कंपनी का। उन्हीं दिनों कभी सुश ने फोन पर ज़िक्र किया था हर्ष से रति के बारे में। कुछ खास तो नहीं कहा था उसने, बस यही कि एक बहुत ही ब्राइट लड़की आयी है आईटी में...साउथ इंडियन है...गोल्ड मेडलिस्ट अपने बैच की...अपने ही इंस्टीट्यूट से है...जब सुश और हर्ष दोनों फाइनल सेमेस्टर में थे तब दाखिला लिया था रति ने उन्हीं के इंस्टीट्यूट में और फिलहाल वो उसकी अंडरस्टडी है कंपनी में। हर्ष ने शायद कुछ कह के छेड़ा भी था सुश को उस वक़्त रति के नाम को लंबा खींच कर छोड़ते हुये। हाँ, फोन कट जाने के बाद बहुत देर तक दिमाग पर ज़ोर डाल के सोचता रहा था वो इंस्टीट्यूट की लड़कियों के चेहरे को एक-एक कर ध्यान में लाते हुये और उसे रति के नाम से जोड़ते हुये, लेकिन इंस्टीट्यूट के भीड़ भरे कैम्पस के चेहरे इतना भी कहाँ याद रह पाते हैं और वो भी एक जूनियर का चेहरा।

... कहाँ पता था उस समय कि यही रति का नाम बाद वक़्त में सुश को ताउम्र अकेलेपन के लिए अभिशप्त कर देगा और हर्ष को एक स्थायी अपराधभाव के बोझ तले ... कि फिर हर्ष और सुश के बीच में सब कुछ ठीक रहते हुये भी एक अपरिभाषित-सा अबोलापन आ जायेगा इस विषय को लेकर...कि दोनों अपनी दोस्ती में दुनिया भर की बातें तो कर सकेंगे सिवाय इस विषय के ... कि रति फिर एक तरह की दोहरी ज़िंदगी जीने को शापित हो जाएगी उम्र भर के लिये। पता होता भी तो कैसे। ये तो वो दिन थे जब दुनिया को रौंद कर आगे बढ़ते जाने का ख़्वाब महज ख़्वाब नहीं, हकीकत लगा करता था ... जब पूरे सिस्टम के खिलाफ़ मुट्ठियाँ उछालना और भृकुटियाँ टेढ़ी करना पसंदीदा शगल हुआ करते थे ... जब सारी लड़कियाँ खूबसूरत, मगर बोरिंग हुआ करती थीं। ये वो दिन थे, जब हर्ष इश्क़ में बौराया हुआ था और सुश बिंदास आज़ाद परिंदे सा उड़ता फिरता था। ये वो दिन थे, जब दोनों ओर से आने वाले फोन और खतों में हर्ष की तरफ से श्रेया ही श्रेया रहती थी और सुश की तरफ से टेनिस या फुटबॉल या फिर उसका जॉब। सच तो ये है कि सुश वो सबकुछ था जो गुपचुप तौर पर हर्ष होना चाहता था... तेज दिमाग, जबरदस्त स्पोर्ट्स मैन और लड़कियों में लोकप्रिय। दोस्ती की शुरुआत इंदौर के ख्यातिप्राप्त मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में दाखिला लेते ही हो गई थी ... फ्रेशर्स वेलकम डे के दिन ही तो, जब इन्ट्रोडक्शन के दौरान हर्ष ने खूब सारी रोमांटिक शायरी सुनाई थी और सबसे बुलंद वाह-वाही सुश की तरफ से आयी थी।
एक वो दिन था और अगले चार साल के प्रोजेक्ट, एसेसमेंट और सेमेस्टर्स की भागम-भाग में प्लेसमेंट होने तक, जब दोनों ही इंस्टीट्यूट में दो हंसों का जोड़ा के तौर जाने जाते रहे। प्लेसमेंट ने हंसों के इस जोड़े को अलग कर दिया हर्ष को दिल्ली भेज कर और सुश को पुणे। दोस्ती का तार लेकिन बंधा रहा बदस्तूर खतों और मोबाइल के जरिये। वहीं दिल्ली में हर्ष को मिली थी श्रेया ... एक इवनिंग कॉलेज में इंगलिश की लेक्चरर। पहली नजर के प्यार का मामला जैसा तो नहीं था, हाँ चार-पाँच मुलाकातों के बाद खुलते इश्क़ का अफसाना ज़रूर था वो और एक बार उस अफ़साने के मुखड़े से अंतरे तक पहुँच जाने के बाद, दीवानों की सहस्त्रों साल पुरानी फ़ेहरिश्त में अपना नाम सबसे ऊपर रखने के लिए दोनों ने फिर कोई कसर नहीं रख छोड़ी। वहीं दूसरी ओर, पुणे की पीली गुनगुनी तपिश और चितकबरी सर्दी वाली आबोहवा ने सुश की बेतरतीबी को थोड़ा-सा और बेतरतीब ही किया। सुबह की जॉगिंग, देर शाम तक ऑफिस का जॉब, टेनिस और फुटबॉल के बीच जगलिंग और जिम। सुश की इस तयशुदा दिनचर्या में और किसी अतिरिक्त वस्तु या व्यक्ति के लिए जगह नहीं थी। लेकिन उसी दिनचर्या ने हाशिये पर ही सही धीरे-धीरे रति के लिए कब जगह बनानी शुरू कर दी, ये ना तो अब ठीक से सुश ही बता सकता है और ना ही उसकी सारी बातों का राज़दार हर्ष।

फिजिकल-फिटनेस फ्रीक सुश … जो पंद्रह-पंद्रह पौंड के डंबल्स तो बड़ी आसानी से उठा लेता था सुबह-शाम … जो मैदान में हाफ-लाइन से लेकर गोल-पोस्ट तक फुटबॉल लेकर घंटों दौड़ता रह सकता था, जो रैकेट घुमाते हुये फ्लड लाइट की रौशनी में देर रात गए तक टेनिस के स्पंजी बॉल की धज्जियाँ बिखेरता रह सकता था ... उसी सुश को अपनी भावनाओं का शब्दाकार करने में पसीने छूटने लगते थे। हर्ष हमेशा चिढ़ाया भी करता था उसे उसकी इस अपाहिजता के लिए ... उसे “मि० रोमांटिकली चैलेंज्ड” कह कर। ज़ाहिर-सी बात थी कि ऐसे में उन बेफिक्र उन्मुक्त दिनों और बेपरवाह शामों के दौरान पसीने में भीगे थक कर चूर पुणे से आने वाले फोन और ख़तों में जब आहिस्ता-आहिस्ता टेनिस और फुटबॉल के दायरे सिमटने लगे थे और एक साउथ इंडियन गोल्ड मेडलिस्ट आईटी स्पेशलिस्ट लड़की उन सिमटे दायरों से उपजे रिक्त जगहों में पैबस्त होनी शुरू हो गई थी, तो इश्क़ में सुध-बुध खोयी दिल्ली के लिए उत्सव मनाना लाज़िमी था। श्रेया में तावजूद गुमशुदा हुये हर्ष ने तनिक देर से संज्ञान लिया सुश के ख़तों और फोन में आ रहे इस बदलाव का और जब लिया तो उसने उस सिमटते दायरे और रिक्त जगहों में हो रही नई पैबस्तगी को बकायदा शेम्पेन खोल कर सेलेब्रेट किया श्रेया के साथ…और जब इस सेलेब्रेशन में दोनों ने सुश को मोबाइल पर ही शामिल करना चाहा तो वो ठहाके लगता हुआ बार-बार यही दोहराता रहा था बस ... "यू गायज आर जस्ट क्रेज़ी” । दरअसल श्रेया का हर्ष की ज़िंदगी में आने के बाद से दो हंसों का जोड़ा की उपाधि को तीन तिलंगे के विशेषण ने विस्थापित कर दिया था ... तीनों की आपस में खूब छनती थी। सुश की छुट्टियों का बस कुछ हिस्सा पंजाब के उसके गाँव में बीतता और शेष दिल्ली में हर्ष-श्रेया के साथ।

...और दोनों की शादी हो जाने के बाद, हर्ष और श्रेया का एकमात्र चिंतन अब इस तीन तिलंगे विशेषण को चार चतुर या ऐसा ही कुछ में परिवर्तित करने के इर्द-गिर्द ही घूमता था। ऐसे में रति इस नए विशेषण को साकार रूप देने के लिए सबसे दमदार उत्तराधिकारी के तौर पर नजर आने लगी थी। दिल्ली की जनवरी की वो कोई ठिठुरती हुई शाम थी, जब सुश का फोन आया था। बातचीत शुरू होते ही हर्ष ने सुश की आवाज़ में छुपी एक विचित्र-सी उदासी को, एक अजीब-सी उद्वीग्नता को पढ़ लिया था...

"क्या बात है? परेशान लग रहे हो!"

"यार, लगता है मेरे कमरे को और मुझे अब अलार्म घड़ी की ज़रूरत नहीं है ।" हमेशा ठहाके लगाने वाले सुश के इस फिलोस्फर मूड ने थोड़ा-सा हैरान किया हर्ष को।

"हुआ क्या? बताएगा कुछ ?"

"सुबह की नींद, ऑफिस जाने से पहले, शाम को टेनिस की टाइमिंग ... सब कुछ रति मुझे रिंग कर के याद दिलाती रहती है। अभी परसों कंपनी के काम से चार बजे सुबह निकलना था तो मैडम ने सवा तीन पर फोन करके जगा दिया।"

"हा! हा! शी इज दी वन सुश ... शी इज दी वन। डोंट लेट हर गो अवे प्यारे। ऐसी दूसरी नहीं मिलगी फिर तुझे।"

"अबे डोंट लेट हर गो अवे के बच्चे ... खुद को तो संभाला जाता नहीं मुझे, किसी और को क्या संभालूँगा। मुझे नहीं लगता हर्ष कि मैं किसी रिलेशनशिप के लिए तैयार हूँ अभी। मुझे अपना स्पेस बहुत प्यारा है। उसका कॉफी लेकर मेरे चैंबर में आ जाना या फिर लंच-आवर में मेरे ही टेबल पर बैठना ... ये सब ... ये सब कुछ ... कैसे कहूँ हर्ष ... तू जानता तो है, मुझे अपने स्पेस में जब कई बार तेरा भी अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं होता तो फिर उसका कैसे करूँ?"

"गॉड! तू और तेरा स्पेस ... शी इज इन लव विद यू, सुश! वो तुझे संभालेगी प्यारे ... मौका तो दे खुद को रिलेशनशिप के लिए। सब हो जाता है मेरी जान।"

“यू नो मी हर्ष। मेरी बेतरतीबी ही मुझे डिफ़ाइन करती है। रिलेशन के लिए ओर्गेनाइज़ होना ... उफ़्फ़, सोच के ही सिहर उठता हूँ।”

... और बातें यूँ ही चलती रही थीं। सुश हमेशा की तरह आश्वस्त नहीं हो पाया था। जाने क्यों इतना असहज-सा था रिश्ते की डोर में बंधने से। इसी टेलीफोनिक वार्तालाप के दो-तीन महीने बाद ही तो वो महा-एपिसोड हुआ था जब रति द्वारा बातों-बातों में सुश से शादी के बारे में राय पूछे जाने पर और खुद को लेकर सुश का मन टटोलने की कोशिश पर, सुश ने वो लिव-इन वाला डायलॉग मारा था और जिसके बाद रति एक तरह से सहम सी ही गई थी। कहाँ तो वो अपने इस टॉल-डार्क-हैंडसम बॉस को लेकर टीन-एज वाली रूमानी दुनिया में विचरण करने लगी थी, कहाँ श्रीमान जी के ऐसे रेडिकल आइडियाज ... उफ़्फ़! इंस्टीट्यूट में पहला ही सेमेस्टर तो था उसका, जब देखा था उसने इंटर-हाउस फुटबॉल चैंपियनशिप के फाइनल में आख़िरी सीटी बजने से कुछ लम्हे पहले टीम-कैप्टेन सुशांत कपूर की वो क़ातिलाना दौड़ गोल-पोस्ट की ओर और फिर सबको अचंभित करता हुआ वो विजयी गोल। कैसी तो हूक उठी थी रति के सीने में और कैसा तो विकराल रूप ले लिया था उसी हूक ने पसीने में तर-बतर जिस्म से चिपके हुये टी-शर्ट में ट्रॉफी उठाए आसमान की तरफ सर उठा कर ठहाके लगाते हुये कपूर सर को देखकर। सुशांत कपूर सर ... बेस्ट स्टूडेंट अपने बैच के, जिस पर उसके बैच की सारी लड़कियां फिदा रहती थीं। क्लास-रूम्स, लाइब्रेरी, कॉरीडोर कहीं से निकलते थे वो, लड़कियों की दबी-दबी खिलखिलाहट और जान-बूझ कर सुनाई गई फुसफुसाहट रति को एक अनाम-सी खीझ से भर देती थीं। फिर वो पास-आउट होकर चले गए तो इंस्टीट्यूट के बाकी के तीन साल जाने ऐसे और कितनी ही छिटपुट खिलखिलाहटों और फुसफुसाहटों में कब बीत गए, पता ही नहीं चला। कहाँ मालूम था कि नियति उसे घुमा-फिरा कर सदियों पहले उठी एक हूक को फिर से जीने के लिये विवश कर देगी।

अभी भी याद है उसे कंपनी में उसका पहला दिन, जब मैनेजिंग डायरेक्टर ने कपूर सर से उसका इन्ट्रोडक्शन करवाया था ये कहते हुये कि “रति ये हैं सुशांत कपूर, कंपनी के सारे कंप्यूटर इसके इशारे पे हुक्म बजाते हैं और तुम इसको असिस्ट करोगी”। कपूर सर थे अपने स्मार्ट ब्लू ब्लेजर और टाई में, लेकिन रति को दिख रहे थे उसी वर्षों पहले की पसीने से भीगी टी-शर्ट में। कैसी चौंधयायी-सी वो उस दिन से कपूर सर के आगे-पीछे घूमती रही थी। खुद पे गुस्सा भी आ रहा था अब रति को...कैसा हाल बना लिया था उसने इस अड़ियल मूडी के पीछे...लिव-इन रिलेशन, गॉड ! व्हाट डज ही थिंक ऑव हिमसेल्फ ! कैसी टीन-एजर सी करने लगी थी वो ... उनकी एक-एक चीज का ख़्याल रखना, सुबह फोन करके जगाना...और-तो-और क्लब जाकर टेनिस की कोचिंग लेने के बारे में सोचने लगी थी वो। पुणे के वो सुहाने बसंत के दिन कैसे तो रूखे-रूखे से हो गए थे अचानक से। कंपनी के गलियारे, ऑफिस के कमप्यूटर्स ... सब के सब जैसे उस पर हँसते दिखते थे। उन्हीं रूखे-सूखे बसंत के दिनों और उपहास उड़ाते गलियारे व कमप्यूटर्स के इर्द-गिर्द एक शीतल बयार लहराती आई थी, जब कंपनी में ही कार्यरत ह्यूमेन रिसोर्स विभाग वाले रंजन ने ... अमितेष रंजन ने रति को सहमे-सहमे प्रोपोज किया था। टॉल-हैंडसम सुश के डार्क शेड में अपनी सलोनी साँवली रंगत का संपूर्ण मिलाप देखती रति को गोरे-से मझौले कद वाले रंजन के प्रोपोजल को स्वीकारने में विलंब तो लगा, लेकिन ज़्यादा नहीं। समस्या ये थी कि बिहार के मिथिलांचल से आने वाले मांस-मछली खाने वाले रंजन के साथ रिश्ते को लेकर दक्षिण भारतीय शुद्ध शाकाहारी कर्मकांडी ब्राह्मण वाले रति के परिवार को ये रिश्ता मंजूर नहीं था। पूरी तरह डिजिटल हो चुके वक्त के तराजू पर रिश्ते अभी भी खानदानी परम्पराओं के बटखरे से ही तौले जाते थे। लेकिन रति के आँसुओं ने इन बटखरों का पलड़ा धीरे-धीरे हल्का कर दिया और दोनों परिवारों की रजामंदी से अगले साल मार्च महीने की कोई तारीख़ तय हो गई थी शादी के लिए, जिसमें करीब छह महीने शेष थे अभी।

उधर दूसरी तरफ कोई तूफ़ान था एक, जो अब तक शुतुरमुर्ग की तरह अहसासों के रेत में अपना सिर छुपाए बैठा था और जिसे अचानक से अपना दम घुटता सा महसूस होने लगा। इस घुटन का अहसास कहाँ से शुरू हुआ, इसका अब सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता था … अचानक से ही बंद हो गई अलार्म-घड़ी या ऑफिस चेंबर में गर्म कॉफी के मग से अकेली उठती भाप या लंच-ब्रेक के दौरान कंपनी की कैंटीन में बदल गया टेबल... या फिर इन सब कुछ ने मिलकर इकट्ठा ही इस नए-नए घुटन के अहसास को उभारा था। जो भी था, इस सबका का हर्ष को भान तक न था। हमेशा की तरह एक शाम मोबाइल लगाया था उसने सुश का। एक और नया कॉलर-ट्यून...उफ़्फ़ “खूबसूरत है वो इतना सहा नहीं जाता”... ये सुश की पुरानी आदत थी। हर हफ्ते बदलता था उसके मोबाइल का कॉलर-ट्यून उसके मूड के हिसाब से। मोबाइल देर से उठा था...दूसरी बार रिंग करने पर। सुश की आवाज़ में एक थकान जैसा कुछ था।

“क्या बात है प्यारे? सब ठीक तो है? किसकी खूबसूरती सही नहीं जा रही मेरी जान से?” हँसते हुये पूछा हर्ष ने।

“...आई मिस यू, हर्ष!” सुश के ऐसे कहने पर चौंक ही तो उठा था हर्ष। इतने सालों से जानता है वो सुश को। शायद ही सुश अपने इमोशन्स कभी ऐसे ज़ाहिर करता है। देर तक बातें होती रहीं और आनन-फानन वो दो दिन की छुट्टी लेकर पुणे चला आया। पहले की अपेक्षा दुबला गये सुश और हमेशा बात-बात में खुल कर ठहाके लगाने वाले सुश में कुछ तो ऐसा था जो कि उसके अपने सुश-सा नहीं था।  एमजी रोड वाले दोनों के पसंदीदा रेस्टोरेन्ट मार्ज-ओ-रिन की विख्यात चटनी सैंडविच खाते हुये हर्ष के “बदले-बदले मेरी सरकार नज़र आते हैं” वाले जुमले पर सुश का वो अजीब तरीके से मुस्कुराते हुये कहना कि “तुम ठीक कह रहे थे हर्ष ... शी इज दी वन”, उस छुपे हुये तूफ़ान की बस एक झलक दिखला रहा था। उत्तेजित हो उछल पड़ा था हर्ष और वेटर को बुलाकर ढेर सारे ऑर्डर देने लगा कहते हुये “लेट्स सेलेब्रेट ... मेरी जान को इश्क़ हो गया, हाय रेSSS इट्स सेलेब्रेशन टाइम।”
...और तब जब हर्ष ने मेनु-कार्ड देखते हुये ऑर्डर में चिकेन सैंडविच को शामिल किया, सुश ने ये कहते हुये टोक दिया था कि उसके लिये बस वेज ही मँगवाए ... कि उसने नॉन-वेज खाना छोड़ दिया है। एक थम से गए लम्हे में अपलक देखता रहा था हर्ष उसे। छुपे हुए तूफ़ान की गर्त में एक किसी सुषुप्त भूचाल का अंदेशा हो रहा था अब हर्ष को, जिसको किसी भी रिक्टर स्केल पर नापा जाना संभव नहीं लग रहा था फिलहाल तो।

“ओय होय, मेरे पंजाब के शेर को इस साउथ इंडियन लड़की ने घास-फूस खाने वाला बना दिया। कब से मि॰ सुशांत कपूर? रति को पता है ये?”

“कब से का पता नहीं और नहीं, उसे कुछ नहीं मालूम”, सुश ने निर्विकार सा कहा।

...फिर जो कुछ भी हुआ सब किसी बिजली की कौंध सा ही हुआ। कब सुश का मोबाइल झटक कर हर्ष ने कब रति का नंबर मिलाया और कब बकायदा चीखते हुये उसने रति को सारी बातें सुना दी...ये तो अब बस मार्ज–ओ-रिन की दीवारें बता सकती हैं या फिर सामने खड़ा वो वेटर, जिसको ढूंढ निकालना बड़ा मुश्किल होगा अब इतने सालों बाद।  हाँ, वहाँ से बस चंद किलोमीटर दूर कुछ दरका था उधर रति के कमरे की दीवारों पर हर्ष का फोन कट जाने के बाद...कैसे तो कैसे उसे अपना पूरा वजूद पिघलता दिख रहा था कमरे के फर्श पर और उस दरकने, उस पिघलने की परिणति ये हुई थी आने वाले दिनों में कि लंच-ब्रेक का टेबल तो वापस नहीं बदला, लेकिन सुश के ऑफिस चेंबर में कॉफी मग से उठने वाली अकेली भाप को फिर से एक और कप से उठने वाली भाप की संगत मिल गई थी और अलार्म-घड़ी ने वापस तयशुदा वक़्तों पर फिर से बजना शुरू कर दिया था...और साथ ही लौट आये थे सुश के वो चीर-परिचित ठहाके।

लेकिन नियमित समय पर बजती हुई अलार्म-घड़ी वक़्त की रफ़्तार को कम तो नहीं कर सकती थी। साल बीता और नए साल का मार्च का महीना मुश्किल से हफ्ते भर दूर रह गया था। इन बीते छह महीने में जहाँ हर्ष और श्रेया इस आने वाले मार्च को लेकर चिंतित रहते थे, वहीं रति ने एक दोहरी ज़िंदगी का लिहाफ़ ओढ़ लिया था, जिसमें लिहाफ़ के ऊपर अमितेष रंजन था और अंदर सुशांत कपूर। आने वाले मार्च को लेकर लिहाफ़ के ऊपर तो खूब सारी बातें होती थीं, लेकिन उसी लिहाफ़ के अंदर उसी मार्च को लेकर एक विचित्र-सी चुप्पी रहती थी। काश कि उस चुप्पी भर से मार्च का आना टल जाता!

दिल्ली की सिहरती फ़रवरी के आखिरी दो दिन बचे थे, जब देर रात गए कॉलबेल बजने पर रज़ाई से नहीँ निकलने का ऐलान किए हुये हर्ष पर भुनभुनाती हुई श्रेया ने दरवाजा खोला था और सामने सुश और रति को पाकर खुशी से चिल्ला उठी थी। किसी अंदेशे से कांपता हुआ हर्ष अपने ऐलान को भूल कर दौड़ा आया था बाहर और पहली बार इतने सालों बाद चार चतुर एक साथ थे। दोनों के इस अघोषित आगमन पर जहाँ हर्ष और श्रेया एक साथ खुश और उत्तेजित तो थे, लेकिन श्रेया थोड़ी-सी असहज भी थी। बातों में पता चला कि रति जा रही है दो दिन बाद मद्रास अपने घर और सुश छोड़ने जा रहा है साथ में उसे मद्रास तक। श्रेया का असहज होना थोड़ा सा इस बात को लेकर था कि बस दो कमरे के इस फ्लैट के दूसरे कमरे में दो दिन के लिए सुश और रति एक साथ थे। हर्ष के कुछ भी समझाने पर श्रेया का बस एक ही सवाल होता था “फिर उस बेचारे रंजन का क्या?”

 अगली सुबह श्रेया की असहजता पूरी तरह उभर कर सामने आ गई थी जब वो अपने कॉलेज लेक्चरर के अवतार को ब्रेकफास्ट टेबल पर ले आई थी। सब चुपचाप बस सुन रहे थे उसको ... तीन ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी ... ये ठीक नहीं है ... इसमें उस बेचारे रंजन की क्या गलती है ... रंजन को सब बता देना चाहिए, वगैरह-वगैरह। रति सर झुकाये बस चुपचाप सुने जा रही थी। सुश टेबल के नीचे उसकी हथेली थामे हुये था और हर्ष असहाय-सा ब्रेड कुतरता हुआ सिर हिला रहा था सहमति में।  ब्रेकफास्ट खत्म होते-होते श्रेया ने ये घोषणा कर दी कि वो और हर्ष भी जाएँगे मद्रास रति के घर, रति के पापा को समझाने और इधर रंजन को बुला कर उसे सारी स्थिति से अवगत करवा दिया जाये और उस से कहा जाये कि वो रति को भूल जाये। एक भारी-भरकम सी ख़ामोशी पसर गई पूरे कमरे में श्रेया की इस घोषणा से, जो देर बाद ... बहुत देर बाद हौले हौले रति की सिसकियों से थोड़ी हल्की हुई।  रति के आँसुओं में नहाये अल्फ़ाज़ ने उस दो कमरे के फ्लैट को पूरी तरह भिगो डाला था। जाने क्या-क्या बोलती गई वो ... कि पापा हार्ट के मरीज़ हैं ... वो नहीं संभाल पायेंगे ये दूसरा झटका ... रंजन के साथ ही शादी को लेकर इतना बवाल मच चुका है और अब तो कार्ड तक छप के बाँटे जा चुके हैं ... और फिर हिचक हिचक के रोते हुये उसने तीनों को अपनी कसम से बांध लिया कि अब जो हो रहा है उसे नियति मान कर होने दिया जाये।

... और फिर रति चली गयी। खिसकती हुयी वो नामुराद मार्च की तारीख़ भी आ पहुँची। मिथिलांचल से आई बारात ने सुना खूब धूम मचाया मद्रासियों के कबीले में। बेढंगे दिन गुज़रते जा रहे हैं तब से बस ... अनमनी-सी शामों और सुबह तक की रतजगों को लपेटे हुये। तीन साल पहले रति ने गोल-मटोल से बेटे को जन्म दिया, जिसे सुश अर्जेन्टीना के विख्यात फुटबॉलर के नाम पर “मेसी” कहकर बुलाता है और अभी छह महीने पहले हुयी रति की बेटी को “सानिया” {जिसके लिए रति जाने कितनी बार हर्ष और श्रेया से शिकायत कर चुकी है कि उसे कोई और टेनिस वाली का नाम नहीं सूझता, ये तो भाग गई मुआ पाकिस्तानी क्रिकेटर के साथ ... उसकी तरफ़ से सेरेना चलेगा, एना चलेगा ... लेकिन सुश सानिया पर ही अड़ा हुआ है}। रंजन इस सब से अब तक अंजान है और रति से टूट कर प्यार करता है। तमाम लड़कियों से सुश का रिश्ता जुड़वाने की हर्ष और श्रेया की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। अब तो ऐसी कोई चर्चा उठाने पर वो एकदम से आग-बबूला हो जाता। मन के चंद सीलन भरे कोनों में वो अब भी हर्ष और श्रेया को दोष देता है रति की शादी नहीं रुकवा पाने के लिए।

इन बीते सालों में वैसे तो बहुत कुछ बदल गया है ... जैसे कि रति जॉब छोड़कर, रंजन का तबादला होने पर उसके साथ पटना चली गई है ... दो बच्चों की किलकारियों में अलार्म-घड़ी ने एकदम ही बजना छोड दिया है...सुश की छुट्टियों को अब हर्ष का साथ या पंजाब के गाँव की बजाय पटना ज़्यादा भाने लगा है कि उसके ऑफिस चेम्बर में कॉफी मग से उठने वाली भाप को अपनी संगत ढूँढने के लिए पुणे से दूर पटना के डाक-बंगला चौराहे से थोड़ा आगे मौर्या कॉम्पलेक्स में जाना पड़ता है ... लेकिन एक चीज जो बिलकुल नहीं बदली पिछले कई सालों से वो है सुश के मोबाइल का कॉलर-ट्यून। हर्ष पक चुका है पूरी तरह सुन-सुन कर वही-वही गाना, जब भी कॉल करता है सुश को “खूबसूरत है वो इतना सहा नहीं जाता, कैसे हम खुद को रोक लें रहा नहीं जाता...” ।