चलती ज़िंदा लाशें - कैलाश मंडलोई


तरह-तरह के चेहरे
तरह-तरह की पोशाकें
समझ नहीं पाया
मेरा मन
स्वप्न या जाग्रति।

भीड़ में चलती
ज़िंदा लाशें
पूछतीं
अपने आप से
अपने
सपनों का बोझ
पराये कंधे पर टिकाए
आसान नहीं होता
अपने कंधों पर
अपनी ही अर्थी ढोना।

झूठी शान,
दिखावे के पीछे
भागती भीड़
सभ्यता की खोल ओढ़े
खुद अपने ही हाथों
अपने ज़मीर को मार कर
हँस रही है लाशें
मानवता पर
अपने मुर्देपन पर
स्वप्न या जाग्रति
समझ न पाया मेरे मन।