शेष - गुन्नार एकिलोफ़

गुन्नार एकिलोफ़ की स्वीडिश कविता का सरल सहज हिंदी अनुवाद, सुधीर सक्सेना द्वारा

शरद में या वसन्त में
क्या फ़र्क़ पड़ता है?
जवानी में या बुढ़ापे में
इसके क्या मानी?
कुछ भी हो
तुम्हें होना है विलुप्त
विराट की छाया में
तुम लुप्त हुए,
लुप्त तुम
अभी या निमिष पूर्व,
या कि हज़ार साल पहले
लेकिन तुम्हारा लुप्त होना ही
रहता है शेष।

(कविता कोश के सौजन्य से)