गज़ल- इस्मत ज़ैदी ’शिफ़ा’

इस्मत ज़ैदी 'शिफ़ा'
1 - ग़ज़ल

अह्द ओ पैमान जो देती है सियासत हम को
ऐसे वादों की है मालूम हक़ीक़त हम को

दौलत ओ ज़र से चकाचौंध हुई है दुनिया
आज सीरत की नहीं होती ज़ियारत हम को

साथ थी बाद ए सबा जब तो ये सोचा भी न था
इक ख़लिश देगी ये सूरज की तमाज़त हम को

हम नई नस्ल को दे पाएँ तो हो फ़र्ज़ अदा
जो कि अजदाद ने सौंपी थी विरासत हम को

उन की मशकूक निगाहों ने भरम तोड़ दिया
इक यक़ीं भी नहीं दे पाई रिफ़ाक़त हम को

कितने तब्दील हों माहौल मगर करनी है
क़द्र ओ तहज़ीब ओ तमद्दुन की हिफ़ाज़त हम को
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2 -  सैलाब मेरी आँखों में ...

जब से यादों के खुले बाब मेरी आँखों में
आ गया कैसा ये सैलाब मेरी आँखों में

क्यों नहीं अब मेरी उम्मीद की शम’एं रौशन
क्यों मचलते नहीं अब ख़्वाब मेरी आँखों में

मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

कोई आया ना  बचाने मुझे मैं बेबस था
था फ़क़त अश्कों का अहज़ाब मेरी आँखों में

मुज़्तरिब होता हूं पर लब ही नहीं खुलते हैं
और बिखर जाता है हर ख़्वाब मेरी आँखों में

अपनी उम्मीदों की ये जोत जलाए रखना
हैं ’शेफ़ा’ जीने के असबाब मेरी आँखों में
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3 - ग़ज़ल

देह पर इक सर्प की लिपटा हुआ चंदन मिला
राजनैतिक वीथिका को तब  नया आनन मिला
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अश्रु थे आँखों में और चेहरा अटा था धूल से
घूमता गलियों में वह  असहाय सा बचपन मिला
*
उसकी आहत भावनाएं सिस्कियाँ भरती रहीं
बंद अधरों में छिपे घावों का इक क्रंदन मिला
*
खुल गई हैं मन की सारी खिड़कियाँ यक्बारगी
जब विचारों का हुआ मंथन तभी  दर्शन मिला
*
मुद्दतें उस ने बिताईं शूल चुनने में ’शिफ़ा’
कितने संघर्षों से गुज़रा तब कहीं मधुबन मिला
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