पंजाबी लघुकथा काफ़िर

गुरदीप सिंह खिंडा

हबीब के बारे में उसने सुना तो पहले भी काफी कुछ था, पर उसके गुस्से की तब हद न रही, जब प्रोफेसर बशीर साहब ने उसके बारे में यह बात सुनाई, मियाँ जी, इतना तो आप जानते ही हैं कि हबीब भट्टी अल्ला-ताला में विश्वास नहीं रखता और न ही मज़हबी रिवायतों को मानता है। पर सबसे बुरी बात यह है कि जब आप सुबह उठकर बांग देते हो तो वह कानों में उंगलियाँ डाल लेता है और भद्दी-भद्दी गालियाँ  निकालता है।

“हत् तेरी! शैतान का बच्चा।” मौलवी बुरा-भला कहता हुआ मसजिद में चला गया। दिन की आखिरी नमाज़ पढ़ी और घुटनों के बल हो अपने हाथ और आँखें आसमान की और कर लिए, “या अल्लाह! क्या इस क़ाफ़िर को क़यामत के रोज़ मुआफ़ किया जा सकेगा?”

“हाँ!” तभी जैसे गंभीर आवाज ने उसकी आत्मा सुन्न कर दी, “हाँ, मेरे बंदे। ऐसा हो सकता है क्योंकि वह उन लोगों में से है जो अपना भविष्य आप गढ़ते हैं, हर बात के लिए मेरी तरफ नहीं देखते।”



(अनुवाद: श्याम सुंदर अग्रवाल)