सुषम बेदी के कथा-साहित्य में नस्लवाद

- हरदीप सिंह

प्रोफेसर (डॉ.) हरदीप सिंह
जिस नस्लवाद को आइन्स्टाइन ने गोरे लोगों की बीमारी (1) कहा था और जिसे एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में सौंपती है (2) वह नस्लवाद आज दुनिया के सामने न केवल एक बड़ी चुनौती है बल्कि विकराल समस्या का रूप धारण कर चूका है। विदेशों में रह रहे भारतीयों (विशेष तौर पर यूरोपीय और अमरीकी देशों) के लिए नस्ली भेदभाव की स्थिति ने मानसिक स्तर पर हीनता का प्रभाव उत्पन्न किया है। प्रवासी भारतीयों को इन देशों में प्रत्येक स्तर पर नस्ली भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। जिस कारण उन्हें अति जलालत भरे और हीन होने का अहसास होता है, जिसका दर्द लगभग हर प्रवासी भारतीय को सहन करना पड़ता है। प्रस्तुत शोध पत्र में सुषम बेदी के कथा साहित्य में अमेरिका में रहने वाले प्रवासियों के प्रति नस्लवाद के स्वरूप का निर्धारण किया गया है, यही इस शोध आलेख की सीमा भी है।


अभय कुमार दुबे ‘समाजविज्ञान कोष’ में लिखते हैं कि नस्लवाद एक ऐसे विश्वास या विचारधारा का नाम है जिसके आधार पर एक रूढ़ मान्यता बनाई जाती है कि किसी प्रजातीय समूह के प्रत्येक सदस्य में कुछ निश्चित लक्षण होने अनिवार्य हैं। चमड़ी के एक खास तरह के रंग, बालों, शरीर के आकार-प्रकार और चेहरे के नाक-नक्श से जोड़ कर उस समूह के सभी सदस्यों में कुछ योग्यताएं या अयोग्यताएँ आरोपित की जाती हैं। इस प्रकार एक नस्ली छवि बना ली जाती है। प्राचीन काल से ही इस तरह की रूढ़ छवियों का कुछ समूहों को सुविधासंपन्न करने और कुछ को वंचित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। आधुनिक युग में नस्लवाद का लोकप्रिय तात्पर्य गोरी चमड़ी वालों द्वारा कालों और अश्वेतों को हीन मानकर उन्हें अधीनस्थ बनाने की प्रक्रिया के रूप में लिया जाता है।


आधुनिक समाजों में संयुक्त राज्य अमेरका में पाए जाने वाले नस्लवाद की समाज विज्ञान के हलकों में काफी चर्चा मिलती है। हाल में प्रकाशित कुछ अध्ययनों में दिखाया गया कि अमेरिकी समाज का नस्लवाद इतिहास की दुर्घटना न होकर सत्रहवीं सदी के बाद से योजनाबद्ध रूप से खड़ी की गई एक संरचना है जिसे कई तरह के परिवर्तनों के बाबजूद बरक़रार रखा गया है। आज अमेरिका का नस्लवाद वहाँ के सभी प्रमुख सामाजिक समूहों, नेटवर्कों और संस्थाओं में मुखर तो कहीं मौन भाव से प्रभावी होते हुए देखा जा सकता है।


वर्तमान दौर में आए दिन मीडिया द्वारा ख़बरें मिलती हैं कि प्रवासी भारतीय नस्लवाद के भेदभाव का शिकार तो होते ही हैं लेकिन कई बार नस्लवादी हिंसा में मारे भी जाते है। प्रवासी भारतीय लेखक भी इससे बचे हुए नहीं हैं अपने त्रासदायक अनुभवों को वे अपने कथा साहित्य में कलमबद्ध करते रहे हैं।


नस्लवाद का मूल कारण व्यक्ति का ‘आइडेंटिटी क्राईसिस’ है। जब व्यक्ति अपने भीतर की सत-चित्त और आनन्द स्वरूप चेतन सत्ता अर्थात् अपने आत्मिक स्वरूप को भूल कर देह समझ लेता है और देह के धर्म, नस्ल, रंग, व्यवसाय और जाति व् लिंग के स्वरूप को अपना स्वरूप समझ कर नफ़रत, ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा पर आधारित व्यवहार करने लगता है तो वह नस्लवाद का शिकार पहले स्वयं होता है फिर दूसरों को अपना शिकार बनाता है।


विदेश में खुद को स्थापित करने के लिए नस्लवाद की आग से गुजरने के अनुभवों को सुषम बेदी ने भी अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है।

सुषम बेदी
सुषम बेदी द्वारा रचित उपन्यासों के नाम इस प्रकार हैं – हवन(1989), लौटना (1994), कतरा दर कतरा (1994), इतर (1995), गाथा अमर बेल की (2000), मोरचे (2006)। इनका कहानी संग्रह है - चिड़िया और चील (1997), सुषम बेदी के कथा साहित्य में नस्सलवाद मुख्यतया निम्नलिखित रूपों में सामने आता है:


नौकरी में नस्लवाद
आज विश्व के सभी देशों में नस्लवाद की नीति दिखाई देती है। लगभग प्रत्येक प्रवासी भारतीय को इसे भोगना पड़ता है। वे चाहकर भी इसका खंडन नहीं कर पाते। विदेश में रहते प्रवासियों को नौकरी प्राप्त करते समय इस समस्या से जूझना पड़ता है। भारतीय लोग वहां चाहे जितना अधिक परिश्रम कर लें किन्तु उन्हें निम्न कोटि के कहा जाता है। वैसे अंग्रेजों के पास नस्ली घृणा का कोई ठोस तार्किक आधार नहीं है किन्तु फिर भी वे बार-बार उन्हें दबाने का प्रयत्न करते हैं।



नौकरी के लिए इंटरव्यू के समय अंग्रेज अधिकारी पक्षपातपूर्ण नीति अपनाते हैं परन्तु प्रायः उन्हें भारतीयों की क्षमता के आगे घुटने टेकने पड़ते हैं। ‘हवन’ और ’लौटना’ उपन्यास के माध्यम से सुषम बेदी ने नौकरी में नस्लवाद जैसी गम्भीर समस्या को उठाया है। प्रवासी भारतीय चाहे जितनी भी शिक्षा प्राप्त कर लें किन्तु नौकरी के समय उनके साथ भेदभाव की नीति को अपनाया ‘हवन’ उपन्यास में अणिमा को नौकरी लेते समय इसी भेदभाव की नीति का शिकार होना पड़ा किन्तु अपनी योग्यता के आधार पर वह नौकरी प्राप्त कर ही लेती है। यूनिवर्सिटी कैफेटेरिया में बैठी वह नौकरी पाने के सारे संघर्ष की कहानी अपनी सहेली नजमा को सुनाती है:
‘‘इस कॉलेज की नौकरी के लिए भी इंटरव्यू से पहले सब इसी तरह का शक मन में डाल रहे थे - एशियाई महिला और अंग्रेजी पढ़ाए अमरीकनों को। पर मेरे क्रेडेंशियल्स सबसे बढि़या थे। इनका खेल इन्हीं के पत्तों से खेलों, तब मिलती है सफलता। कई बार अपने आसपास व्याप्त नस्लवाद का यथार्थ रूप प्रवासी भारतीय उतनी गहराई से नहीं देख पाते जितना नौकरी पाते समय देखते हैं। उस समय नसलवाद का घिनौना रूप सामने आता है।(3)

अणिमा अरविंद को अमेरिका के हालातों से परिचित करवाती हुई कहती है, ‘‘अरविंद, यह देश पहले कुछ खेपों में आए उन गोरों का है जो यहाँ के शासक और नियम-विधायक हैं। यहाँ की मल्टी-नैशनल कम्पनियों के मालिक हैं। अभी तुम विद्यार्जन कर रहे हो, कल नौकरी ढूँढने जाओगे तो देखना। ओफ! कितनी दुविधाग्रस्त है इन राज करने वालों की नीतियाँ एक तरफ यह देश दम भरता है कि संसार के हर इंसान को आजादी और तरक्की का माहौल देने के लिए इसका दरवाजा खुला है, दूसरी तरफ यहाँ जो आ चुके हैं वे अपने पीछे दरवाजा बंद कर देना चाहते हंै। हम ऐशियाई लोग अपने इस सीमित घेरे में ही ऊपर उठ सकते हैं, कभी राष्ट्रीय स्वर भी कुछ सोचेंगे, करेंगे-इसकी उम्मीद मुझे तो कम है ...हाँ,कोई इक्का - दुक्का टोकन के तौर पर अपने स्व के दायरे से ऊपर आ जाए तो और बात है।(4)

‘लौटना’ उपन्यास में एड मीरा से कहता है, ‘‘तुम्हारी बात नहीं करता... क्योंकि तुम तो मुझे अच्छी लगती हो...पर यह नहीं कह सकता कि फर्क नहीं पड़ता। अभी हिन्दुस्तानी तो फिर भी यहाँ कम हैं पर चीनी, कोरियाई इतने ज्यादा आ गए हैं कि सारी इकॉनमी पर बहुत बोझ डाल दिया है। नौकरियों के लिए प्रतियोगिता बढ़ती चली जा रही है। मॅँहगाई बढ़ रही है। अपने ही देश में हम लोग आपरेसर कहलाए जा रहे हैं...एक तो सारे ऐशियाई आकर हमारी नौकरियाँ छीनते जा रहे हैं, ऊपर से हमीं पर जातीय वैमनस्य और रंग भेद का आरोप लगाया जाता है। अपने देश में चाहे भूखों मरें, यहाँ आकर सभी अपने समान अधिकारों की बात करने लगते हैं।’’ (5)


शिक्षा में नस्लवाद

नस्लवाद का व्यापक रूप शिक्षा के क्षेत्र में भी देखा जा सकता है। स्कूलों और कालेजों में भारतीय बच्चे अपनी तीव्र बुद्धि के बल पर विशेष स्थान प्राप्त करते हैं तो इसे गोरे लोग सहन नहीं करते और बात-बात पर इन बच्चों को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं। विदेशों में नस्ली भेदभाव का प्रत्यक्ष रूप स्कूलों, कालेजों और यूनिवर्सिटियों आदि में रोजाना देखने को मिलता है। इन स्थानों पर अकसर ब्लैक, बास्टर्ड, ब्लैक डॉग और ब्लडी डॉग आदि गालियों से हमले होते हैं।


‘हवन’ उपन्यास की अणिमा कहती है, ‘‘अब वह साठवें दशक वाला अमीरी और सत्ता विद्रोही युवकों का युग खत्म हो चुका था। गरीबी, बेरोजगारी और प्रवासियों की भरमार ने यहाँ के सचेत युवक का युग समाप्त हो चुका था। गरीबी, बेरोजगारी ओर प्रवासियों की भरमार ने यहाँ के सचेत युवक को बड़ा कंजरवेटिव बना दिया था। ज्यादा से ज्यादा युवक युवतियां पढ़ लिखकर अच्छा कैरियर बनाना चाहते थे, ये चाहे भारतीय हों या विदेशी। हर विषय को लेकर ‘जाॅब अपोरचूनिटीस’ के सवाल उठाए जाते। जिस विषय से जुड़ी जॉब ओपोरच्युनिटी सर्वे के दौरान सब से ज्यादा होतीं उसी विषय को पढ़ने वाले भी की बहुसंख्यक हो जाते हैं। सबसे ज्यादा भीड़ कम्पयूटर साइंस और एम.बी.ए. क्लासों में थी। दिन पर दिन लगातार नये प्रवासियों के आगमन ने कहीं कहीं इस युवा वर्ग को अमेरिका की इस प्रवासी स्वागत नीति के खिलाफ भी कर दिया था। व्यक्तिगत रूप में वे शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में हर ऐशियाई से दोस्त के रूप में पेश व्यक्तिगत रूप में वे शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में हर ऐशियाई से दोस्त के रूप में पेश आते पर प्रवासियेां के पूरे समाज के प्रति उनमें विद्रोह का भाव था। उन्हें लगता उनकी नौकरियाँ उनके हक उनसे छिन रहे हैं। कोई संगठित विद्रोह जैसी बात नहीं थी और इस तरह का अनुदार नजरिया तो अकसर महसूस हो ही जाता था, तभी तो इस देश का उदारवादी दल भी कमजोर पड़ रहा था। अणिमा के आने के दो साल बाद ही सन 1980 में चुनावों में रिपब्लिकन नेता की इतनी भारी जीत हुई थी कि लगता था कि लोग उदारवाद से एक दम आजीज आ गए हैं पर उदारवादी रूख की चिंगारियां अभी भी ढेरों युवकों में थीं।’ (6)


पश्चिमी समाज में भारतीय शिक्षा को निम्न समझा जाता है। विदेशी शिक्षा की तुलना में भारतीय शिक्षा को हीन समझा जाता है। कदम कदम पर प्रवासी भारतीयों को अपनी शिक्षा के कारण नस्लवाद का शिकार होना पड़ता है। भेद भाव की नीति अपनाकर प्रवासी भारतीयों का आत्मवश्विास तोड़ने का प्रयत्न किया जाता है।

‘लौटना’ उपन्यास में मीरा जब अपनी उच्च शिक्षा के बल पर नौकरी प्राप्त करने जाती है तो एक भारतीय प्रोफैसर उसे कहने लगी, ‘‘मुझे नहीं लगता कि तुम्हें असिस्टैंट प्रोफैसर बनने की कोई उम्मीद भी करनी चाहिए...वह कभी नहीं होगा। देखो, हिन्दुस्तान से पीएच.डी. कर लेना कोई बड़ी बात नहीं। सैकड़ों पीएच.डी. करते हैं वहाँ। कोई ठीक स्टैंडर्ड तो है नहीं वहाँ ...अब यहाँ तो पीएच.डी. में इतना काम करना पड़ता है...पहले कोर्स वर्क ही दो-चार साल करते रहो, तब जाकर थीसिस लिखने की बात होती है। भारत में तो बस छूटते ही थीसिस लिखी और बात खत्म...तभी बड़ी कच्ची, बड़ी घटिया किस्म की थीसिस लिखते हैं लोग। हिन्दुस्तानी पीएच.डी. के बूते पर तुम्हें नौकरी ढूंढनी ही नहीं चाहिए। उनकी कोई कीमत नहीं यहां।’’ (7)


‘चिड़िया और चील’ कहानी संग्रह की ‘पार्क में’ कहानी में पर्शियन गल्फ में हलचल की बहस मनु और अंग्रेज आदमी बिल में होती है। मनु युद्ध के विरूद्ध बात कर रहा था और बिल हक में अचानक बिल आपे से बाहर हो जाता है और मनु पर बरस पड़ता है, ‘‘यही तो स्वार्थी और नीचपन है तुम्हारा। तुम्हारे जैसे गददारों ने ही इस देश को कमजोर बना डाला है। चले जाओ यहांँ से... लौट जाओ अपने देश को। तुम साले हिन्दुस्तानी बस यहांँ का फायदा ही उठाना जानते हो। क्या किया है तुमने इस देश के लिए। बस कमा लिया, बच्चे पढ़ा लिए, जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना। चले जाओ अपने देश को, हमारा खाते हो हमीं को गाली देते हो।’’ (8)


‘अजेलिया के फूल’ कहानी की नायिका ने एक प्रोफेसर निक से विवाह किया है। नायिका को इस बात का दुख है कि उसे बेगाना समझकर अपने से अलग रखा जाता है। अपने मन का दुख व्यक्त करती हुई वह कहती है,

‘‘अब मुझी को देख लीजिए... बीस सालों से ब्याही हूँ निक से... अभी भी किसी नए आदमी से मिलती हूँ तो पहला सवाल यही पूछता है, ‘किस देश से हैं आप?’ एक बात कहूं आपसे... मैं सोचती थी कि यहीं की हूँ और दरअसल यहीं की होकर रहना चाहती हूँ... लेकिन एक विदेशी बनकर ही... अमरीकी बनकर नहीं।’(9)


नायिका अपने पति निक के साथ बहुत खुश है। गम है तो इस बात का कि निक का परिवार उसे स्वीकार नहीं करता है। इस बात को लेकर वह अकसर भावुक हो जाती है और कहती है, ‘‘नहीं, पति की बात नहीं... पति की बात नहीं... वे तो यूं भी निराले हैं... वैसा उदार इन्सान कभी नहीं देखा होगा... लेकिन उन्होंने खुद भी तो अपने समाज की अवहेलना कर ही मुझसे शादी की थी... निक के माँ-बाप ने ही कभी भी इस शादी को अपना आर्शीवाद नहीं दिया... जब समाज की रजामंदी ही नहीं थी किसी को स्वीकारने को बाध्य भी कैसे किया जा सकता है... यूँ वे मिलते हैं, फिर बच्चों से भी बड़ा प्यार करते हैं।’ (10)


यह बेगानेपन का अहसास ही है जो मन में घृणा का भाव कम नहीं होने देता। यह भाव एक पीढ़ी अपनी दूसरी पीढ़ी को देती है। यही कारण है कि दोनों जातियाँ साथ-साथ रहते हुए भी अलग-अलग जीवन व्यतीत कर रही हैं। उस स्कूल का प्रिंसीपल शारदा पर बहुत विश्वास करता है। जब भी कोई छात्र समस्या बन जाता है तो उसे शारदा के हवाले कर दिया जाता और वह कोई न कोई तरीका खोज ही लेती छात्र के साथ सम्प्रेषण का हल। मैलकम को भी उसके हवाले कर दिया जाता है। मैलकम हर समय अपने पास चाकू रखता है। शारदा के समझाने पर वह उससे कहता है, ‘‘आप अपना वक्त जाया कर रही हो, मिस। मेरी माँ कहती है हम लोग चाहे कितना ही पढ़-लिख लें, कितने ही होशियार बन जाएं ... हमारा जिस्म का रंग हमेशा लोगों में नफरत ही जगाता रहेगा ... हमारी नियति हमारी चमड़ी के रंग से शापित है।’ (11)


इस प्रकार सुषम बेदी ने अपने कथा साहित्य द्वारा शिक्षा में फैले नस्लवाद को उजागर किया है। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय बच्चों, युवकों और युवतियों के प्रति भेदभाव पूर्ण नीति को अपनाया जाता है। कहीं न कहीं अंग्रेजों के मन मस्तिष्क में यह बात हावी होती जा रही है कि प्रवासी भारतीयों के कारण इनसे नौकरी और शिक्षा के अवसर छीने जा रहे हैं। इसी कारण विदेश में नस्लवाद की नीति तीव्रता से फैल रही है।


सामाजिक परिवेश में नस्लवाद

दो संस्कृतियों के आपस में मिलने और मूल्यों के बीच आपसी टकराहट से सामाजिक परिवेश में तनाव पैदा होता है। मनुष्य एक सामाजिक जीव है। तनाव की स्थिति सामाजिक विरोधों का मानसिक प्रतिबिम्ब होती है। सामाजिक यथार्थ निरंतर गतिशील है और मनुष्य स्वयं भी सामाजिक यथार्थ का हिस्सा ही है। सामाजिक तनाव को परम्परा और परिवर्तन के बीच का विरोध भी कह सकते हैं।

हीन भावना
भारतीय गोरे लोगों के सामने स्वयं को हीन समझते हैं और अपनी इसी हीन भावना के कारण नस्लवाद का शिकार होते हैं। नस्लवाद के भय से बचने के लिए अनेक बार वे अपने आपको भारतीय ही नहीं कहलाते।
‘हवन’ उपन्यास की राधिका नस्लवाद के कारण हीन-भावना की शिकार है। उसने अपनी सहेलियों को अपना नाम लोरा बताया है। राधिका के साथ शाॅपिंग करते हुए स्टोर में गीता को उसकी सहेली मिली तो अपना परिचय देते हुए गीता को मिसेज जॉनसन नाम से संबोधित किया। आपको गलतफहमी हुई कि राधिका उन्हें टोककर टूटी-फूटी हिन्दी में समझाने लगी, ‘‘ममी, वह तो मजाक में मैंने अपना नाम इन्हें लोरा जाॅनसन बतला दिया था, करें क्या आपके हिन्दुस्तानी नाम किसी की समझ में नहीं आते। मुझे सब बुलाते थे, रै-डि-खा, इट इज सो फनी, इजंट इट!’’ (12)

उपर्युक्त वाक्य जो कि सरल साधारण प्रतीत होता है, बहुत जटिल प्रकृति को धारण किए हुए है और बहुत सारी संभावनाओं से ओत-प्रोत है। प्रवासी भारतीय नस्लवाद से मुक्त नहीं हो सकते और न ही होना चाहते हैं क्योंकि वे गर्व से भारतीय नहीं कहलाना चाहते।

ऐसी स्थिति को अणिमा अकसर भोगती है। जबकि वह किसी बात में भी अंग्रेजों से कम नहीं। ‘‘बातचीत के दौरान कोई जिज्ञासा करता, ‘क्या तुम हिन्दू हो’ तो अणिमा, को अजीब सा लगता। एक हिन्दू के रूप में उसने खुद को कभी महसूस करके नहीं देखा था, वह धार्मिक है भी नहीं। सिर्फ जब स्कूल काॅलेज के फार्म भरने होते थे तभी हिन्दू शब्द का इस्तेमाल किया होगा। पर बाहर के देश कितनी अलग तरह से देखते हैं। हिन्दू बहुसंख्यक हैं और मुस्लिम, सिख, ईसाई अल्पसंख्यक। अणिमा को अजीब लगता है इस देश में आकर। वह भी माइनारिटी में गिनी जाने लगी है। मन में कचोट सी हुई ...वह मेन स्ट्रीम में कभी नहीं होगी। हमेशा भिन्न होने का अहसास...।’’ (13)

बेगानापन
प्रवासियों में पनप रही बेगानगी का एक कारण नस्ली भेदभाव भी है। ऐसी स्थिति में वह भीतर से टूट जाते हैं। अनेक बार मनुष्य अपनी पहचान गंँवा लेने के पश्चात इस स्थिति को ग्रहण करता प्रतीत होता है। उसके लिए उसकी भारतीय पहचान महत्वपूर्ण है, परन्तु परिस्थितियों के अनुकूल उसे अपनी पहचान गंँवानी पड़ती है, जिसके कारण उसका भीतर से टूटना स्वाभाविक है। अर्थोपार्जन के लिए संघर्ष करता व्यक्ति भीतर तक झंझोड़ा जाता है।

‘हवन’ उपन्यास में अणिमा का पति जब विदेश आता है तो विदेशी चकाचैंध में डूब जाता है। उसे वहांँ के लोगों में बहुत अपनापन नजर आता है। किन्तु अणिमा पहले से इस देश में रह रही है और बेगानेपन के भाव से परिचित करवाती हुई कहती है, ‘‘तुम सिर्फ न्यूयार्क को देखकर ही यह बात कर रहे हो, यहांँ रोज इतने नए-नए देशों, रंगों के प्रवासी आते हैं कि न्यूयार्क तो एक मेल्टिंग पाट बन गया है। वहांँ ऐसा अजनबीपन महसूस नहीं होता, पर यह भी सच है कि अमेरिका के दूसरे हिस्सों में तुम परदेसी ही बने रहते हो।’’ (14)

‘इतर’ उपन्यास में निकोल पहले तो बाबा रामानंद के धार्मिक कार्यों की ओर आकर्षित होती है किन्तु जब धर्म के नाम पर उससे छेड़खानी करते हैं तो वह पुलिस तक पहुँच जाती है। उसकी किसी भी बात पर भारतीय प्रवासी विश्वास ही नहीं करते। उन्हें लगता है कि अंग्रेज हमारे साथ नस्लवाद की प्रवृति अपनाकर बेगानापन साबित करना चाहते हैं।

‘‘जरूर किसी ने जलन के मारे... ये अमरीकी बड़े नस्लवादी हैं। जरूर किसी ने झूठ-मूठ की शिकायत लगा दी होगी। आचार्य रजनीश के साथ भी तो ऐसा हुआ था... स्थानीय
लोगों को वे खटकते थे...हो सकता है।’’ (15)

अंग्रेजों में नस्लवाद इस प्रकार छा गया है कि वे भारतीय को बेगाना बताने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। अंग्रेजों का यह रंग भेदभाव व्यवहार किसी तार्किक आधार पर नहीं खड़ा बल्कि केवल मनोरथ भ्रान्ति का शिकार है और काले रंग के प्रति उनकी पहुंँच अप्रसांगिक और अतार्किक है।

‘चिड़िया और चील’ कहानी संग्रह की ‘पार्क में’ कहानी में पर्शियन गल्फ में हलचल की बहस मनु और अंग्रेज आदमी बिल में होती है। मनु युद्ध के विरूद्ध बात कर रहा था और बिल हक में अचानक बिल आपे से बाहर हो जाता है और मनु पर बरस पड़ता है, ‘‘यही तो स्वार्थी और नीचपन है तुम्हारा। तुम्हारे जैसे गदद् ारों ने ही इस देश को कमजोर बना डाला है। चले जाओ यहां से ...लौट जाओ अपने देश को। तुम साले हिन्दुस्तानी बस यहाँ का फायदा ही उठाना जानते हो। क्या किया है तुमने इस देश के लिए। बस कमा लिया, बच्चे पढ़ा लिए, जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना। चले जाओ अपने देश को, हमारा खाते हो हमीं को गाली देते हो।’’ (16)

यह नस्लवाद केवल जाति तक ही सीमित नहीं है बल्कि रंगभेद भी उसमें समाया हुआ है। अंग्रेजों को हर उस व्यक्ति से घृणा है जिसका रंग काला है। वो चाहे भारतीय हो, पाकिस्तानी हो या फिर अफ्रीकी ही क्यों न हों। उनके हृदय में रंगभेद की नीति ने घर किया हुआ है। यही कारण है कि रंगभेद के शिकार प्रवासी चाहकर भी पश्चिमी समाज को नहीं अपना पाते। यह पराई धरती पर बेगाने होने का भाव उनके मन मंे विद्रोह की भावना उत्पन्न करता है।

‘सरस्वती की धार’ कहानी की नायिका शारदा काले हिस्पैनिक बच्चों की आबादी के स्कूल में पढ़ाती है। स्कूल का बारह साल का मैलकम अंग्रेजों से नफरत करता है। उसके मन की घृणा का भाव इस कदर बढ़ गया है कि एक दिन जब समाज विज्ञान की कक्षा में शारदा किलन्टन के बारे में पढ़ा रहे थी तो वह बोला, ‘‘हमें नहीं पढ़ना इन राष्ट्रपतियों के बारे में ...यहाँं सब सफेद राष्ट्रपति हैं ...कोई भी काला तो कभी राष्ट्रपति बना नहीं।’’ (17)
यह बेगानेपन का अहसास ही है जो मन में घृणा का भाव कम नहीं होने देता। यह घृणा का भाव एक पीढ़ी अपनी दूसरी पीढ़ी को देती है।

सुषम बेदी के कथा साहित्य के उपर्युक्त संक्षिप्त अध्ययन के पश्चात निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नस्ली व्यवहार के फलस्वरूप प्रवासी भारतीयों को मानसिक संत्रास को भोगना पड़ता है। सामाजिक गति के फलस्वरूप, प्रवासी को नस्लवादजनित घृणित व्यवहार सहन करने की एक मजबूरी यह है कि वह तुरन्त अपने देश वापिस भी नहीं आ सकता क्योंकि घरवालों के लिए उसका बिम्ब पूँजी में परिवर्तित हो चुका है और पूँजी की यह चमक रिश्तों की गरिमा को भी परिवर्तित कर देती है। मूल वासियों का प्रवासियों के प्रति नस्लवादी व्यवहार सोच को बदलने के लिए के लिए भी तैयार नहीं, फलस्वरूप प्रवासियों की भूमिका कोने लगे हुए सीमावर्ती मनुष्य वाली बन जाती है। यही कारण है कि विदेशी नागरिकता प्राप्त करने के बावजूद भी प्रवासी नस्लवादी व्यवहार के कारण हीन-भावना का शिकार हो जाते हैं। इसी हीन भावना के कारण वे मानसिक तौर पर विदेश को अपना नहीं पाते। इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नस्लवाद एक भयानक मानसिक बीमारी है जिसका आधार दैहिक रूप रंग है जो अज्ञानताजनित है। लेकिन नस्लवाद का यह मानसिक रोग विश्वशांति और सदभाव के लिए एक बड़ा खतरा है।
सन्दर्भ
1 - Jerome, Fred, and Taylor, (2006) Rodger. Einstein on Race and Racism Rutgers University Press,
2 - Calaprice, Alice (2005) The new quotable Einstein. pp.148–149 Princeton University Press,
3. बेदी सुषम: हवन (1996) पृष्ठ 70
4. बेदी सुषम: हवन (1996) पृष्ठ 98
5. बेदी सुषमः लौटना (1997) पृष्ठ 43
6. बेदी सुषमः हवन; (1996) पृष्ठ 65
7. बेदी सुषमः लौटना ; (1997) पृष्ठ 132-133
8. बेदी सुषमः चिड़िया और चील; (1997) पृष्ठ 66-67
9. बेदी सुषमः चिड़िया और चील ; (1996) पृष्ठ 108
10. वही ; पृष्ठ 108-109
11. बेदी सुषम: चिड़िया और चील ; 1997) पृष्ठ 137
12. बेदी सुषमः हवन; (1996), पृष्ठ 55
13. बेदी सुषमः हवन ; (1996), पृष्ठ 66
14. बेदी सुषम: हवन ; (1996) पृष्ठ 98
15. बेदी सुषमः इतर ; (1996) पृष्ठ 132
16. बेदी सुषमः चिड़िया और चील; (1997) पृष्ठ 66-67
17. बेदी सुषम: चिड़िया और चील ; (1997) पृष्ठ 130
शोध केंद्र एवं परा-स्नातक हिंदी विभाग, सतीश चन्द्र धवन सरकारी कॉलेज, लुधियाना, मोबाइल 9417717910, (सह-अध्येता, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला)