छिपकली लघुकथा

अशोक कुमार भाटिया 'अकुभा'
- अशोक कुमार भाटिया "अकुभा"

विक्रम अपने कमरे में लेटा छत को एकटक देख रहा था। एक अदद छिपकली भी अपने शिकार एक मक्खी को पूरी तन्मयता से देख रही थी, बहुत देर तक बिना हिले। ऐसा लग रहा था जैसे सो रही हो।

विक्रम उसी तरह रीमा के बारे में सोच रहा था। क्या सचमुच यह रिश्ता समाप्त हो चुका है। क्या रीमा अब कभी वापस नहीं आएगी। कैसे, कैसे कैसे। कैसे वह रीमा को समझाए। विक्रम की आँखें किसी विचार में एक रेखा सी पतली हो चली थीं - बिलकुल उस छिपकली की तरह जो एकटक अपने शिकार को निहार रही थी। और छिपकली के इरादों से बेखबर मक्खी अपनी उछल उछलकूद में व्यस्त थी।

रेल यात्रा में पहली मुलाकात हुई थी रीमा से। वह विक्रम के सामने वाली सीट पर बैठी आयन रैंड का उपन्यास द फाऊन्टेनहैड पढ रही थी। कुछ देर बाद उसने उपन्यास के पन्नों के बीच अपनी उंगली को बुकमार्क की तरह फंसाकर बंद किया और खिड़की से बाहर देखने लगी। विक्रम को लगा कि यही समय है जब बात शुरू की जा सकती है। बातचीत, बस यूँ ही, समय गुज़ारने के लिए। तब नहीं सोचा था कि उपन्यास के हीरो के चरित्र की चर्चा विक्रम के एक कमरे के फ्लैट पर जा कर भी समाप्त न होगी।

उपन्यास के हीरो हार्वर्ड रोआर्क और हिरोईन डाॅमिनिक की तरह चलने वाला यह रोमांटिक सम्बंध अनेक उतारों चढावों के बावजूद दो वर्ष तक चला। विक्रम हावर्ड नहीं था लेकिन रीमा अपनी बेबाक समान्यताओं के बावजूद एक चट्टान से चरित्र की थी। लाख चाह कर भी विक्रम उसे समझ नहीं पाया था। कब रीमा की उंगली किताब में एक पन्ने में किसी किरदार पर फंस जाएगी और इस उलझन को सुलझा पाना विक्रम के लिए असंभव सा हो जायेगा, पता ही न चलता।

रीमा को छिपकलियों से बहुत डर लगता था। विक्रम, प्लीज कुछ करो। इसे यहाँ से निकालो। वह विक्रम के पीछे छिपते हुए कहती, जैसे कि छिपकली रीमा का शिकार करने के लिए ही निकली हो। आखिर विक्रम एक तौलिया ऊपर की ओर घुमाते घुमाते छिपकली को भगा कर दम लेता।

विक्रम ने देखा कि मक्खी एक स्थान पर आकर बैठ गई थी, छिपकली के ठीक सामने, खतरे से बेखबर। विक्रम के मस्तिष्क में चल रही अनगिनत तरकीबों मे से एक सही लग रही थी। हाँ, यह बिल्कुल ठीक है। तभी छिपकली ने एक झटके में मक्खी को पकड़ा और निगल गई ।
दिल्ली निवासी अशोक कुमार भाटिया "अकुभा" की यह पहली प्रकाशित कृति है। आत्मकथ्य: व्यवसाय से इन्जीनियर हूँ और पिछले चालिस वर्षों से अपने स्वयं के व्यापार में व्यस्त हूँ। पिछले कुछ सात सालों से कविता और कहानी लिख रहा हूँ यद्यपि अभी तक इन्हे कभी प्रकाशित नहीं करवाया।