तपन शर्मा की लघुकथाएँ

तपन शर्मा

ऑनेस्टी

शाम के सात बजे थे कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी। स्नेहा ने दौड़ कर दरवाज़ा खोला।

"आप आ गए? कुछ बात बनी?" स्नेहा ने तपाक से सूरज के ऊपर सवाल दाग़ दिए।

"बस एक दो जगह ही बात बन पाई। यानि दो-ढाई लाख रूपए तक की।" सूरज के चेहरे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट थीं।

"अच्छा स्नेहा, ये बताओ कि अब 500 और 1000 के पुराने नोटों की कुल कितनी रकम बाकी रह गई है?"

"यही कोई साठ लाख।"

तभी उनकी बेटी अन्वेषा दौडती हुई आई और अपने पापा से लिपट गई।

"पापा पापा, आज हमारे स्कूल में स्टोरी कम्पटीशन था और मैं फर्स्ट आई। अन्वेषा के चेहरे की चमक उसकी खुशी का इज़हार कर रही थी।"

"ठीक है", सूरज ने बड़े ही अनमने ढंग से अन्वेषा से कहा। वह जल्दी-जल्दी अपने फोन के नंबर देख रहा था।

"पापा, पूछो न क्या टॉपिक था?"

"ठीक है, जल्दी बता अनु बेटा, पापा को बहुत काम है। फ़टाफ़ट बताओ और जाओ यहाँ से। जाकर खाना खाओ।" सूरज ने फोन में देखते हुए कहा।

"ऑनेस्टी इज़ द बैस्ट पॉलिसी" बेटी अन्वेषा ने बड़ी ही मासूमियत से कहा। सूरज ने अपना चेहरा ऊपर नहीं उठाया।

दो चेहरे

रमन छह साल का छोटा सा बच्चा था। उसके पिता आशीष एक बड़े बिज़नसमैन थे। अगले सप्ताह रमन के चाचा की शादी थी। उसी सिलसिले में रमन अपनी मम्मी और पापा के साथ मॉल में शौपिंग करने गया हुआ था।
शॉपिंग के बाद वे लोग बाहर निकले तो फुटपाथ पर आठ-नौ साल का एक बच्चा खिलौने बेच रहा था। रमन की नज़र एक खिलौने पर पड़ी और खरीदने की जिद करने लगा।

आशीष ने बच्चे से पूछा - कितने का है?
पचास का एक खिलौना है।
पचास का? पचास के दो खिलौने देने हैं तो बता...
पैंतीस का एक दे दूंगा साहब पर उससे कम नहीं हो पायेगा।
-रहने दे ...

इतना कहकर आशीष रमण और उसकी मम्मी के साथ गाडी में बैठकर घर की ओर निकल गए। थोड़ा सा आगे जाकर एक लाल बत्ती पड़ी। आशीष की नज़र शनि देव की बाल्टी लिए एक नौजवान पर पड़ी।

हाथ का इशारा करते हुए आशीष ने उसे बुलाया। ऑडी गाड़ी का शीशा खुला, अन्दर से एक हाथ निकला और बाल्टी में पैसे डाल दिए। सबने शनि देव के आगे हाथ जोड़े और तभी ट्रैफिक सिग्नल ग्रीन हो गया।