पुस्तक समीक्षा: बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य

पूरी दुनिया अदीब और गैर अदीब लोगों में बंटी हुई है। लेखक भी दो तरह के होते हैं, एक वे जिनकी किताब छप चुकी होती है दूसरे वे जिनकी नहीं छपी होती।
 - अनूप शुक्ल की 'बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य' से एक अंश
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बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य
लेखक: अनूप शुक्ल
विधा: व्यंग्य
प्रकाशक: रुझान पब्लिकेशंस, जयपुर, राजस्थान
संस्करण: पेपरबैक, 126 पृष्ठ
मुद्रित मूल्य: 150 रुपये
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धारदार व्यंग्य के लिये प्रसिद्ध अनूप शुक्ल का नाम हिंदी के प्रतिनिधि ब्लॉगरों में शामिल है। अभियांत्रिकी में परास्नातक एवं रक्षा मंत्रालय की पैराशूट फ़ैक्ट्री के अपर महाप्रबंधक अनूप जी सन् 2004 से हिंदी ब्लॉगिंग में उपस्थित हैं। फ़ुरसतिया, पलपल इंडिया, तथा अब सुप्तप्राय चिट्ठा चर्चा समेत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होते रहे हैं। 'बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य' उनकी पहली प्रकाशित पुस्तक है।

इस पुस्तक का नामकरण भी आलोक पुराणिक ने किया है और प्राक्कथन भी उनका ही है। त्रुटिहीन छपाई, अच्छे कागज़ और साफ़ सुथरे मुखपृष्ठ वाली पुस्तक के बैक कवर पर अनूप जी का सचित्र संक्षिप्त परिचय मौजूद है। पुस्तक में 31 व्यंग्य संकलित हैं और लेखक ने इसे अपनी पत्नी को समर्पित किया है -
जीवन संगिनी सुमन को
जिनके लिये अम्मा हमेशा कहा करती थीं,
"गुड्डो अगर नहीं होतीं तो हम इतने दिन जी नहीं पाते" 
लेखक: अनूप शुक्ल
एक व्यंग्य संकलन का आरम्भ ऐसी मर्मस्पर्शी पंक्तियों से होना, इस बात का भरोसा दिलाता है कि व्यंग्य का उद्देश्य मात्र टांगखिंचाई नहीं होता, बल्कि वह एक भावुक हृदय से निकली हुई कृति भी हो सकता है।

अनूप शुक्ल के व्यंग्य हमारे समाज में गहरी घुसी भ्रष्टाचार जैसी बीमारियों को बड़ी सहजता से अनावृत करते हुए सिस्टम की विद्रूपताओं को भी सामने रखते हैं।

अनूप शुक्ल छोटे-छोटे कथनों में बड़ी बात कह जाने में सिद्धहस्त हैं।  आइये देखें इस संकलन की कुछ झलकियाँ। पुस्तक का नाम जिस रचना पर आधारित है, वह लेखक के निम्न फ़ेसबुक स्टेटस के गिर्द घूमती है।
सोचते हैं कोई बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी की बात कह डालें, लेकिन फिर आलस्य हावी हो जाता है। इस चक्कर में दूसरे बाज़ी मार ले जाते हैं। 
उसी स्टेटस पर आई प्रतिक्रियाएँ तथा उनपर आगे हुए विमर्श केंद्रित इसी रचना से कुछ अंश:

समीक्षक: अनुराग शर्मा
किसी भी बात पर फ़ट से सहमत हो जाना समझदार होने का साइनबोर्ड है। पर बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य अद्भुत होता है। अनिर्वचनीय, अवर्णनीय, गूंगे का गुड़ टाइप। आधुनिक सौंदर्यबोध के उलट।

हिंदुस्तान अमेरिका हो जाना चाहता है, अमेरिका हिंदुस्तान होने की सोचता है। पाकिस्तान ...! अब छोड़िये, पाकिस्तान के बारे में क्या कहें। पड़ोसी मुल्क के बारे में कुछ कहना शोभा नहीं देता।

बेवक़ूफ़ इन सब झमेलों में कत्तई नहीं पड़ता। वह किसी और के जैसा होने के लिये नहीं हुड़कता।

'काम छोड़ो महान बनो', तथा 'महान बनने के कुछ आसान उपाय' जैसी रचनायें अनूप शुक्ल की 'फ़ुरसतिया' फ़ेम का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 'शंकरजी बोले तथास्तु' वर्तमानकाल पर पौराणिक पृष्ठभूमि का आरोपण है परंतु 'आदमी रिपेयर सेंटर' भविष्यगामी व्यंग्य रचना है।

'ऑनलाइन कविता स्कूल' जहाँ साहित्य की ऑनलाइन कक्षाओं पर कटाक्ष है, वहीं 'आज हमने बॉस को हड़का दिया' एक कर्मचारी की कुंठा की  गाथा है। "हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे" की प्रश्नोत्तरी जहाँ पाठक को सोचने पर मजबूर करती है वहीं 'चिंता करो, सुख से जियो' की फ़िक्र के ज़िक्र की बानगी देखिये:

हमने घर की दीवारों पर चिंता थेरेपी वाले पोस्टर लगा रखे हैं - चिंता करो, सुख से जियो। चिंता सरोवर में डुबकी लगायें, अपना वजन मनचाहा घटायें। बढ़ते वजन से परेशान, नियमित चिंता से तुरंत आराम।

बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य पढ़ने में जितना आनंद आया, उतना ही आज आपके साथ उसकी चर्चा करने में आ रहा है। लेकिन यदि पूरी किताब हम ही पढ़ देंगे तो वह आपके आनंद की अमानत में खयानत सा हो जायेगा। इसलिये हम चर्चा यहीं बंद करते हैं। आप अपनी प्रति मंगाकर बेवक़ूफ़ी के सौंदर्य का पूरा आनंद उठाइये।
पुस्तक 'बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य'; लेखक: अनूप शुक्ल; समीक्षक: अनुराग शर्मा