अशोक कुमार भाटिया "अकुभा" की कविताएँ

अशोक कुमार भाटिया "अकुभा"

1. बीच की लकीर

एक पाला सच का
एक पाला झूठ का
दोनों के बीच एक छोटी सी लकीर
किसी एक पाले में खड़े हो जाओ
तो वो सच दिखता है
और दूसरा झूठा,
और अगर लकीर पर खड़े हो कर देखो
ते दोनों पाले झूठे दिखते हैं।

2. कविता

मैंने तेरे लिए कभी लिखी थी
एक कविता
बरसों की दूरी ने
परत दर परत
उस कविता पर चढ कर
उसे भारी भरकम बना दिया
कभी दिन रात उस कविता को
भर भर गिलास
पीते थे हम दोनों
और अरमानों के पंख लगा
उड़ते तस्सुवरों के आकाश में
वो बर्फ़ सी पथराई
आज पड़ी है
एल्बम के पन्नों के बीच।