रामदरश मिश्र के उपन्यास में नारी का सामाजिक और राजनीतिक मुक्ति संघर्ष

- सोनिया माला

डॉ. रामदरश मिश्र
रामदरश मिश्र का जन्म 15 अगस्त 1924, को गोरखपुर में हुआ। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, निबन्ध, संस्मरण आदि विधाओं में अपनी कलम चलाई इनके उपन्यास पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ, बीच का समय, सूखता हुआ तालाब, अपने लोग, रात का सफर, आकाश की छत, आदिम का राग, बिना दरवाजे का मकान, दूसरा घर, सूखी हुई सुबह, बीस बरस, परिवार आदि है। इनकी लंबी साहित्य यात्रा समय के कई मोड़ो से गुजरी और नित्य नूतनता की छवि को प्राप्त होती गई। ये किसी वाद के कृत्रिम दबाव में नहीं आए, बल्कि वस्तु और शिल्प दोनों को सहज ही परिवर्तित होने दिया मिश्र जी अनेक साहित्यिक और अकादमिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित हो चुके हैं।  
सोनिया माला
        भारतीय समाज में नवजागरण के साथ 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में नारी जागरण भी प्रारम्भ हो गया था। इस समय को नारी जागृति का युग भी कहा जा सकता है। नारी घर की चारदीवारी का अतिक्रमण कर बाहर निकलने लगी थी। विकसित व्यक्तित्व के कारण वह पुरूषों के शोषण का विरोध करने लगी थी। मिश्र जी ने न केवल नारी जीवन के संघर्श को उकेरा बल्कि उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए भी वे सदैव तत्पर रहे है। नारी प्रारम्भ से ही साहित्य का केन्द्र बिन्दु रही है। मध्ययुगीन साहित्य में नारी के प्रति वैराग्य की भावना परिलक्षित होती है। रीतिकालीन साहित्य में नारी को विलासिता का केन्द्र बिन्दु माना गया है। वैदिक काल में नारी का व्यक्तित्व सशक्त था तथा उसे पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त थे। धीरे धीरे स्थितियां परिवर्तित होती गई और नारी की स्थिति विषम होती चली गई। पुरुषों ने भी नारी की स्थिति को सुधारने का प्रयास नहीं किया। मिश्र जी ने नारी की इस छटपटाहट को इन शब्दों में व्यक्त किया है - “भारतीय नारी परम्परागत दासता से मुक्त होना चाहती है। दासता के रुप में उसे दीन हीन परावलम्बी जीवन जीना पड़ता है। पुरुष सापेक्षता में ही जीवन के तमाम सम्बन्धों, मूल्यों और धार्मिक,  सामाजिक आस्थाओं को ढोना पड़ता है। वह उनसे मुक्त होना चाहती है और पुरुष के समान सम्मानपूर्वक जीना चाहती है।”1 मिश्र जी ने अपने उपन्यासों में नारी मुक्ति की अवधारणा के विविध पहलुओं पर जैसे सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवम् मनोवैज्ञानिक सभी पर प्रकाश डालते हुए इन क्षेत्रों में नारी के योगदान का वर्णन किया है लेकिन राजनीतिक दृष्टि से मिश्र जी की नारियाँ अधिक जागरूक एवं सजग नहीं है। मिश्र जी ने अपने उपन्यासों में आर्थिक पराधीनता के कारण नारी के शोषित रुप, आर्थिक रुप से स्वावलम्बी बनने के बाद नारी के व्यक्तित्व के विकास में आने वाले परिवर्तनों, समाज के गले सड़े ढांचें में व्याकुल नारियों, पुरानी परम्पराओं का विरोध करने वाली नारियों, बेमेल विवाह, विवाहेतर यौन संबंधों एवं विवाह पूर्व यौन संबंधों का शिकार नारियों, विधवा जीवन जीने के लिए विवश नारियों एवं आधुनिक एवं परम्परागत विचारधाराओं के द्वन्द्व में फंसी नारियों का चित्रण प्रचुर मात्रा में किया है। इसके साथ ही उन्होने अपने उपन्यासों में नारियों को राजनतिक कुचक्र का शिकार भी दिखाया है। मिश्र जी राजनीति को घर अवसरवादियों चापलूसों, झूठों, फरेबियों, दुष्टो़ं, अनपढ़ों व असामाजिक लोगों के लिए उपयुक्त मानते है। सभ्य व ईमानदार लोगों के लिए राजनीति में कोई स्थान नहीं है। नारियां सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर हो रहें शोषण से स्वयं को मुक्त रखने के लिए किस प्रकार के हथकंडों का प्रयोग कर रही है इसका विवेचन हम आगे देखेंगे।

        “थकी हुई सुबह” में समाज के सड़े गले ढाँचे में छटपटाती लक्ष्मी की मनःस्थिति को मिश्र जी ने अत्यन्त सशक्त रुप में व्यक्त किया है- वह सोचती कैसा है नारी का जीवन कि यदि यह किसी नये रास्ते पर चलने के लिए निकलती है तो कदम कदम पर उसे अवरोध ही मिलता है। उसकी इच्छा का दमन ही होता है। उसने इन चार वर्षों में क्या क्या अनुभव नहीं किया? जब भी किसी काम के लिए उसने इच्छा व्यक्त की, “लड़की हो, यह तुम्हारें लिए नहीं है” कहकर टाल दी गयी बड़ी कठिनाई से तो उसने स्कूल में दाखिला लिया था। उसके लिए कितनी बोली ठोली सुनी जब उसने खेल में हिस्सा लेना चाहा तो उसका मजाक उड़ाया गया - “लड़की है तू क्या खेलेगी?” टूर्नामेंट के लिए स्कूल के लड़के बाहर गये उसकी भी इच्छा होती कि वह भी वहाँ जाती और वाद विवाद प्रतिस्पर्धा में भाग लेती। स्कूल में वह भाग लेती रही है, फर्स्ट आती रही है लेकिन टूर्नामेंट में चलने के लिए उससे किसी ने नहीं कहा और उसे भी अपने लड़की होने का अहसास था नहीं। ऐसे कितने संदर्भ हैं जहाँ उसे बार बार लड़की होने का बोध कराया गया और धीरे धीरे उसे लगने लगा कि वह सचमुच लड़की है - लड़कों से अलग।”2 उक्त वर्णन से स्पष्ट है कि इस पुरुष प्रधान समाज में नारी को पग पग पर उसके नारी होने का अहसास कराया जाता है। नारी की इस नियति को चित्रित करते हुए मिश्र जी कहते हैं - “अभी भी नारी प्राकृतिक कारणों से कमजोर मानी जाती है। सामाजिक व्यवहार की दृष्टि से भी परम्परागत विषमताओं व विडम्बनाओं को झेलने के लिए अभिशप्त सी दिखाई पड़ती है। बाप के घर से लेकर ससुराल तक और घर से लेकर समाज तक अभी भी वह दोयम दर्जे की नागरिक मानी जाती है। इसलिए अभी उसके संघर्श के लिए काफी कुछ बचा है। यानी अपनी अस्मिता और सम्मानपूर्ण जीवन यापन के लिए अभी भी एक लम्बी लड़ाई स्त्री को लड़नी है।”3

        डॉ सूर्यदीन यादव के अनुसार, “किन्तु विडम्बना यह है कि परम्पराओं रूढ़ियों में बंधी नारी ऊर्जावान होते हुए भी अपने साथ हो रहे अन्यायों, जुल्मों का खुल कर विरोध नहीं कर पाती है। वह किसी लाचारीवश रुढ़िवादी सामाजिक यातनाओं, अमानवीय तत्वों द्वारा ढाये जाते सितमों को सहन करती है जबकि ये सारे ढोंग, पाखंड, रस्मों-रिवाज मानवीय तत्वों द्वारा गढ़ पीट कर बनाये जाते हैं। उसे नारी चुपचाप सहन करती है नारी स्वयं तो भुगतती ही है, आने वाली पीढ़ी को भुगतने के लिए अपनी छाप छोड़ जाती है।4

        “थकी हुई सुबह” उपन्यास में नारी की संघर्श यात्रा और यातना कथा के कई पहलुओं को चित्रित किया गया है। डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ के शब्दों में “रामदरश कृत थकी हुई सुबह में नारी यातना के कई स्तर विश्वसनीयता के साथ खुलते हैं और नारी मुक्ति से सम्बद्ध कई सवालों को एक साथ जन्म दे डालते है”।5 लक्ष्मी के कटु अनुभवों ने उसे यह कहने के लिए विवश कर दिया है कि नारी की नियति पूरी जिंदगी रोते रहना है। वह कहती हैं, “औरत के पास रोने के सिवा और क्या है? वह किसी की बहू है, किसी की बेटी है, किसी की बहन है, स्वयं में जैसे कुछ नहीं है।6 एक अन्य स्थान पर वह कहती है, “कैसा है नारी का जीवन कि यदि वह किसी नये रास्ते पर चलने के लिए निकलती है तो कदम कदम पर उसे अवरोध ही मिलता है? उसकी हर इच्छा का दमन मिलता है।”7

       “परिवार” उपन्यास में नारी जीवन की विडम्बना का चित्रण करते हुए मिश्र जी कहते है, “एक लड़की पन्द्रह बीस बरसों के जाने-पहचाने परिवेश को छोड़कर एकाएक अपरिचित दुनिया में जा रही होती है-उस दुनिया में उसके साथ क्या सुलूक होगा, उसे पता नहीं रहता अपने गाँव की बहुओं और ससुराल गई अपनी सखियों के दुखद अनुभवों की गठरी उसके पास होती है। जाने-पहचाने घर संसार से अलग होने की पीड़ा के साथ अनजानी दुनिया के अप्रिय व्यवहार की आशंका उसके मन में भरी होती है। वह ससुराल के चक्रव्यूह में घिरी होती है, चारों और से लालची, महारथी उस पर बाण चलाते रहते हैं और वह एक बाण भी नहीं चला पाती चुपचाप सारे बाण सहने को अभिशप्त होती है।”8

        “रात का सफर” की ऋतु जज की बेटी होने के बाद भी ससुराल वालों की उपेक्षा व अत्याचार का शिकार हो जाती है। मिश्र जी ने ऋतु के माध्यम से समाज के सड़े गले ढाँचे में छटपटाती नारी की वेदना को अभिव्यक्ति दी है, “लेकिन डॉक्टर, औरों की मुखरता की अपेक्षा तुम्हारी उदासीनता मुझे अधिक कष्टकर लगी। वह मेरे भीतर ज़हर की तरह भीनती रही। इच्छा हुई तुम्हारें सामने तन कर खड़ी हो जाऊँ, तुम्हारा कॉलर पकड़कर तुमसे पूछूँ - इसीलिए मुझे ब्याह कर लाये थे? क्या मेरी कोई सत्ता ही नहीं है? क्या मैं तुच्छ कीड़ा-मकौड़ा हूँ? इतना ज़हर, इतनी घृणा तुम्हारें मन में मेरे लिए क्यों है? मैंने कौन सा अपराध किया है? लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकी मेरे संस्कारों ने मेरा रास्ता रोक लिया। पति से अभी तक तो पहली मुलाकात भी नहीं हुई, उससे यह संवाद कैसे कर सकती थी? मैंने चुपचाप झाडू उठायी, घर बुहारने लगी। रो भी नहीं सकी। अथाह वेदना भीतर ही भीतर पी गई। मुझे लगा कि उसी मुद्रा में मै इस घर से जुड़ गई हूँ।”9 नारी समाज के प्रति अपने दायित्व को उम्र भर निभाती रहती है जिस कारण अपनी मुक्ति का मार्ग तलाश नहीं पाती। ऋतु के माध्यम से समाज का यह रुप सामने आता है - “यह अजब है डॉक्टर कि हर हालत में औरत ही बदनाम होती है यदि उसका पति उसकी उपेक्षा करता है तो लोग और विशेषतया औरतें कहती हैं कि यही है जिसके पति ने उसे छोड़ रखा है और यदि औरत मर्द की उपेक्षा करती है तो वे कहती है कि यही है जो अपने मर्द की उपेक्षा करती है या जिसने अपने मर्द को छोड़कर कहीं और साँठ-गाँठ कर रखी है।”10

        “बिना दरवाजे का मकान” की दीपा को ताई बस में सफर करने के दौरान मर्दो के स्वभाव और प्रकृति से अवगत कराते हुए कहती है कि इस पुरुष सत्तात्मक समाज में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए हिम्मत की आवश्यकता होती है। दीपा कहती है, “हमारी जाति की औरतें अगर बिकेंगी तो गरीबी की मार से बिकेंगी और आपके यहाँ की औरते बिकती है खाली शौक पूरा करने के लिए। गरीबी से बिकना बेभिचार नहीं है बीबी जी, शौकिया मरद की गोद बदलते रहना बेभिचार है।”11 दीपा इस सड़े गले समाज में निर्दयी लोगों के बीच छटपटा रही है। मानवता और भावुकता नाम की चीज नहीं रह गई है। लोग मौका परस्त बन दूसरों की मजबूरी का पूरा फायदा उठाना चाहते हैं।

        “बीस बरस” उपन्यास में नारी को शिक्षित दिखाया गया है। शिक्षा के बल पर नौकरी प्राप्त कर गाँव के कुछ आवारा लड़कों के द्वारा बदसलूकी पर वह निडरता से उनका सामना करती है और अपनी रक्षा करने में अपने आपको सक्षम मानती है। इस प्रकार शिक्षिका समाज के इस गले-सड़े ढांचे से निकलकर अपनी मंजिल को आगे बढ़ाना चाहती है। वह जानती है कि घर की चार दीवारी से बाहर निकलकर बाहर जाना है तो समस्यायें आयेगी ही और उनका सामना खुद ही करना होगा। इस उपन्यास में शिवरामा का विधर्मी लड़की से विवाह करना और समाज द्वारा उसे स्वीकार कर लेना सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। यहाँ लेखक ने पुराने रूढ़िवादी समाज के भीतर से नये सामाजिक मूल्यों की आहट को पहचाना है। यहाँ इस बात के संकेत भी मिलते हैं कि समाज द्वारा पुरानी परम्पराओं के टूटने को स्वीकार करना व अस्वीकार करना परिस्थितियों पर निर्भर करता है। शिवरामा की माँ के मन में पहले तो यह चिढ़ उठती थी कि इस विधर्मी बहू के कारण उसके घर की बदनामी हो रही है और बायकाट को रहा है लेकिन वन्दना ने अपने स्वभाव, हिम्मत और परिश्रम से सास का मन जीत लिया। शिवरामा की मृत्यु के समाचार से उस पर वज्रपात तो होता है किन्तु वह अपने बाल काटे जाने का विरोध करती है। जब खबर आयी कि शिवरामा लड़ाई में मारा गया, पूरा घर जैसे काँप कर गिर गया और वन्दना का तो हाल मत पूछिए। वह तो कठमारी रह गयी न रोना, न बोलना केवल सूनी आँखों से सामने देखते रहना। उसकी चूड़ी फोड़ी गयी, चुप रही, सिन्दूर पोंछा गया, चुप रही लेकिन जब उसके केश कटने की बारी आयी तो जोर से चीख पड़ी -“नहीं ई.....ई...” झटक कर खड़ी हो गयी और रोने लगी- “अरे बहू क्या करती है? भगवान ने यह कहर ढाया है तो सब कुछ सहना ही पड़ेगा जब तुम्हारा सुहाग ही छिन गया तो इन बालों से क्या मोह?”

        “नहीं,माँ जी नहीं इन बालों ने क्या किया है कि इन्हें कटवाऊँ जिन्दगी है तो जीनी ही पड़ेगी और जीऊँगी तो अपने को कुरुप और घिनौना बनाकर नहीं।”

        “अरे इस बेशर्म को देखो” तमाम औरतें बोल पड़ी उन्हें लगा जैसे भगवान ने विधवाओं से कर्तव्य निभवाने का दायित्व उन्हीं को सौंपा है और उसे नहीं पूरा करेंगी तो पाप उन्हीं को लगेगा अतः पड़ोस की एक जबरदस्त औरत ने उसे पकड़ लिया और नाई से कहा-“काटो इसके बाल।”

         वन्दना उसके शिकंजे में असहाय सी तड़प रही थी। देर से यह दृष्य देख रहा था उसने पास में पड़ा डंडा उठा लिया नाई पर जोर से तड़का - “छोड़ दो भौजी को, नहीं तो खैर नहीं है नहीं कटवाना है बाल नाई सहम कर अलग हो गया किन्तु औरते भनभनाने लगी।”12

        “दूसरा घर” उपन्यास की रमा का विवाह पिता द्वारा एक व्यापारी से तय कर दिया जाता है तो वे तैयार नहीं होती। उनकी दृष्टि में व्यापारी दिन रात रुपये पैसे की भाषा में बात करता है - न साहित्य, न संस्कृति, न देश न समाज ... बस अपना लाभ और फूहड़ मनोरंजन वे पिता जी की बात का विरोध करती हैं। पिता के न मानने पर वे पिता का पैसा लेकर चली जाती हैं और शास्त्री जी के साथ सूरत में जाकर कोर्ट मैरिज कर लेती है। बाद में शास्त्री जी किसी नर्स से प्रेम करने लगते है। पहले तो रमा टूट जाती हैं लेकिन फिर उनका विद्रोही रुप सामने आ जाता है, मिश्र जी ने यहाँ रमा की मनः स्थिति का चित्रण किया है- “धिक्कार है मुझे जो अपने को इतना लाचार समझ रही हूँ मैं अगर पिता की इच्छा के विरुद्ध विद्रोह कर सकती थी तो क्या पति की अमानवीय हरकतों के खिलाफ नहीं कर सकती?  मैं पढ़ी-लिखी हूँ,  बी.ए. पास हूँ क्या यह शिक्षा मेरे लिए कोई ताकत नहीं?  क्या शिक्षा ने मुझे कुछ भी आत्मबल नहीं दिया है? क्या मैं भी उन औरतों में से हूँ जो सारी यातना सहकर भी पति को परमेश्वर मानती हैं?” वह अपने आप से कहती है - “उठ खड़ी हो और अगर तेरा पति तेरे सिर पर अपनी लपंटता का कोई बोझ लादता है तो झटककर फेंक दे और संसार के सामने उसे नंगा कर दे अभी बहुत से लोग हैं जो तेरे साथ खड़े हो सकते हैं।”13

        इसी उपन्यास में रामकली को समाज में विद्यमान बुराइयों से जूझते हुए दिखाया है। उसका पति बहादुर खुद तो काम नहीं करता। ऊपर से पत्नी रामकली मेहनत मंजूरी कर कुछ पैसा कमाकर बच्चों का पेट भरने के बारे में सोचती है तो बहादुर इस पर भी उसे भला बुरा कहकर समाज में बेइज्जत करता है। रामकली पति द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार का खुलकर विरोध करती है। रामकली के शब्दों में, “इसे पुलिस में दे दो,  साला जेल काटे मैं संभाल लूँगी बच्चों को यह नहीं रहेगा तो बच्चे ज्यादा ठीक ढंग से संभलेंगे।”14

        उपरोक्त सन्दर्भ में रामकली को पुरुषों द्वारा नारी का दमन करने का विरोध करते हुए दिखाया गया है।

        मिश्र जी ने “दूसरा घर” उपन्यास में राजनीतिक कुचक्र का भी पर्दाफाश किया है। शोभा को जब उसके घर से उठा कर मुसलमान बनने के लिए विवश किया जाता है तो उसकी भयानक मनःस्थिति का परिचय मिलता है-“मुझे एक कमरे में ले जाया गया उस कमरे में तरह तरह के हथियार रखे थे। उन्हें देखकर मैं बुरी तरह डर गयी। मकान मालिक वीभत्सता से हँसा। ये सब तुम्हारी जाति वालों के लिए हैं, एक एक की बोटी कटवाकर रख दूंगा। अब चल तू इस कमरे में बन्द हो जा और अपने को या तो मुसलमान बनाने के लिए राजी कर या फिर इन हथियारों में से कोई एक चुनकर बता कि किससे तुझे हलाल किया जाये।”15

        इस प्रकार कथन से स्पष्ट होता है कि वह शोभा को एकान्त में ले जाकर डरा धमाकर मुस्लिम धर्म अपनाने हेतु विवश करते है। इसी उपन्यास में रजिया को मुसलमानों के गुण्डे ही उठा ले गये हैं। लोग आपस में ही राजनीति की आड़ में एक दूसरे को बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं। कुछ मुसलमान कासिम की पार्टी पर घिनौना आरोप लगाकर उसकी राजनीति चौपट करना चाहते हैं। कासिम इन आरोप से बोखलाया हुआ है। वह इस आरोप को धोना चाहता है लेकिन लोग हैं कि रजिया के अपहरण का अनर्गल आरोप लगाकर बदनाम करने से नहीं चूकते हैं। उदाहरण द्रष्टव्य है-
        “हाँ मुझे शक है कि कासिम की पार्टी उसे उठा ले गयी है। बहुत दिनों से इस गुण्डे की नजर रजिया पर थी। उसे बहुत गन्दी नजरों से देखता था। हमारे मोहल्ले में हिन्दू बहुत कम हैं। वे अपनी जान बचाने में ही लगे रहे। उन्हें लड़की उठाकर भागने की न तो फुरसत थी-न सुविधा आखिर रजिया अपने मौहल्ले से कहीं बाहर भी तो नहीं गयी।”16 मिश्र जी ने यहां यह स्पष्ट किया है कि राजनीतिक लोग दूसरे को नीचा दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यहाँ रजिया के अपहरण के द्वारा मुसलमान आपस में ही बंट गये हैं और वोट की खातिर व लोगों की सहानुभूति बटोरने के लिए दूसरे की बेटी का अपहरण करने में भी नहीं चूकते व इसका आरोप दूसरे सम्प्रदाय पर लगाते है। इस प्रकार रजिया राजनीतिक कुचक्र के कारण शोषित नारी पात्र है। दोनों सम्प्रदाय के गुण्डे लोग अपना पराया नहीं देखते। उन्हें जो अच्छा लगता है करते जाते हैं। इन गुण्डों की कोई जाति बिरादरी नहीं होती सये अपने आकाओं की बात मानकर कुछ भी गलत कार्य करते रहते हैं।

        इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि मिश्र जी ने अपने उपन्यासों में ऐसी नारियों का चित्रण किया है जो सामाजिक विद्रूपताओं को झेलने के लिए अभिशप्त हैं। इन विद्रूपताओं के अन्तर्गत नारी की आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक शोषण के विविध स्तरों से गुजरना पड़ता है। ये नारियाँ चाहकर भी इन विसंगतियों से मुक्त नहीं हो पाती है। राजनीतिक कुचक्र का सबसे अधिक प्रभाव नारी की इज्जत पर पड़ता है। पूर्णतः निर्दोष होते हुए भी उसे मानसिक व शारीरिक यातना से गुजरना पड़ता है। राजनीतिक चकाचौंध का शिकार होकर कुछ नारियाँ स्वेच्छा से भी पुरुषों के प्रति आकर्शित हो जाती है और जीवन नष्ट कर डालती हैं। मिश्र जी ने नारियों की इस स्थिति के मूल में समाज के ढाँचे को ही उतरदायी माना है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1)  (सं) डॉ. स्मिता मिश्र, अन्तरंग साहित्य सहकार, दिल्ली, 1999, पृ. 129
2)  रामदरश मिश्र रचनावली,खण्ड सात, थकी हुई सुबह,नमन प्रकाशन, दिल्ली, 2000,पृ. 282/283
3)  अन्तरंग,  वही, पृ. 129
4)  डॉ सूर्यदीन यादव, रामदरश मिश्र की कविताः सृजन के रंग, पृ. 36
5)  डॉ. वेद प्रकाश अमिताभ, रामदरश मिश्रः रचना समय, भारत पुस्तक भंडार, दिल्ली,1999, पृ.130
6)  रामदरश मिश्र रचनावली, वही,  पृ. 330
7)  वही, पृ. 282
8)  रामदरश मिश्र, परिवार, शान्ति पुस्तक मंदिर, दिल्ली,2006,  पृ. 16
9)  रामदरश मिश्र रचनावली, भाग छः, रात का सफर, वही, पृ. 379
10) वही, पृ. 407
11) रामदरश मिश्र: रचनावली, खण्ड छः,  बिना दरवाजे का मकान,वही,  पृ. 565
12) रामदरश मिश्रः एक अन्तर्यात्रा, प्रकाश मनु,पृ. 103/104
13) रामदरश मिश्र: रचनावली खण्ड सात, दूसरा घर,   वही,  पृ. 214
) वही, पृ. 168
15) वही, पृ. 229
16) वही, पृ. 230