दामोदर मोरे की कविताएँ

दामोदर मोरे

यह डरे हुए पेड़

यह रास्ते
आगे पीछे देखकर
क्यों चुपचाप चल रहे हैं ...?

यह डरे हुए पेड़
आपस में बिना बोले
क्या बोल रहे हैं ...?

यह बीमार बादल
क्यों बरस रहे हैं
झोपड़ियों की आंखों से ...?

यह क्या
चू रहा है
टपकते आंसुओं से ...?

यह दर्द भरे पेड़
क्यों घूर - घूर कर देख रहे हैं
मालि की तरफ ...?

यह कांटे
क्यों बहका रहे हैं
कच्ची कलियों को ...?

इंसान के लहू की
क्यों प्यासी बन गई है
यह मिट्टी ...?

हाथी को
क्यों डरा रही हैं
यह चीटियां ...?

मौत क्यों मंडरा रही है
भ्रमर की तरह
मासूम फूलों पर ...?

भूख -भूख कर
कितने आंसू सूखे हैं
फूलों के गालों पर...?

पड़ा है अकाल
संवेदना का
इस भूमि पर

सूख गया है
इंसानियत का झरना
इस भूमि पर

राज कर रहे हैं
बेर और बबूल के कांटे
फूलों पर

और आम का पेड़
खड़ा है नंगा सत्ता के आंगन में
अपनी छाया खोकर

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चलें तो कैसे चलें

समय के डरावने बादल क्यों कर रहे हैं
दुख दर्द की धधकती बारिश ...?


हमारी मनोभूमि में कौन बो रहा है
असहिष्णुता के बबूलबीज ...?


सांप्रदायिकता की कड़ी धूप में
कितने कुम्हलाए हुए हैं एकता के कोमल फूल ...?

घृणा के कांटे जो बार-बार चुभ रहे हैं, लहुलुहान कर रहे हैं
राष्ट्रीय एकता के रास्ते पर चलें तो कैसे चलें?
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मुस्कुराहट

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों
इस हास्य व्यंग्य कवि सम्मेलन में
मैं तुम्हें कैसे हसाऊँऔर हंसू
अस्पृश्यता के जहरीले डंक ने
दिए हैं मेरी आंखों में आंसू ...?

नीच ठहराई गई जाति से उपजे
हीनताबोध  की गटर से निकलने के लिए
मैं अंदर ही अंदर छटपटा रहा हूं
ऊपरी गली ने कहां कैद कर रखी मेरी मुस्कुराहट
उसी को मैं ढूंढ रहा हूं ।

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इंसानियत की हिफाज़त

नफरत के जहर के झरने
बस्ती-बस्ती में कौन बहा रहा है ...?

आदमी आदमियों के बीच भेदभाव की दीवार

कौन - और क्यों खड़ा कर रहा है ...?

जातिवाद के आतंक का डरावना डायनासोर

गलियों-गलियों में क्यों घूम रहा है ...?
लोकतांत्रिक मूल्यों की महकती बगिया को
हे संविधान शिल्पी ...! अब मैं कैसे बचाऊँ ...?

हे कलम के सिपाहियों ... अरे जागो! ... जागो!
उठो! ... उठो! ... कलम को हथियार बनाओ

कंधे से कंधा मिलाकर शब्दों के मोर्चे में शामिल हो जाओ ...!
इंसान और इंसानियत की हिफाज़त के लिए!
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कविता का हथौड़ा

प्रिये ...! तू  पूछ रही है ...
आप क्या कर रहे हो ...?
कैसे कहूं ...? कैसे सहूं ...?
उत्पीड़न की दर्दनाक पीड़ा से फड़फड़ा रहे

पेड़ों के दुःख दर्द की जड़ें

कविता की कुदाल से मैं खोद रहा हूँ...!

प्रिये ...!  तू पूछ रही है ...
आप क्या कर रहे हो ...!
मासूम फूलों के गालों पर आंसू कैसे देखूं ?
बहिष्कृत बगिया के जिंदगी की
बहार लुटनेवालेे बेरहम हाथों पर
मैं कविता के तीर चला रहा हूं ...!

प्रिये ...!  तू कह रही है
चलो ना ...! कहीं घूमने जाएंगे ...!
तन मन को जला रही जातिज्वाला की गर्माहट

निगल नहीं सकता अवमान के जहर की कड़वाहट
अब मेरी नरमाहट कूड़े में फेंक रहा हूं
कविता के हथौड़े से अमानुष सोच पर चोट कर रहा हूं ...
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