मुक्तिबोध की रचनाओं में जन जीवन एवं सुधारवादी दृष्टिकोण


सपना मांगलिक
इसलिए कि इससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ करने के लिए मेहतर चाहिए

समाज में गंदगी है,हम देख रहे हैं। वहशियत है, हम सिसक रहे हैं। अत्याचार है गुनाह है,हम तड़प रहे हैं। मगर आवाज कोई नहीं उठा रहा। क्यों? क्योंकि हर किसी के अन्दर मैं ही क्यों की भावना है,हर कोई फायदे और नुक्सान का गणित लगाने में व्यस्त है। ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं,ज्यादातर कवि और नायक भी ऐसे ही होते हैं और जो आगे बढ़कर आवाज उठाता है,इस गन्दगी को अपने स्वयं के हाथों से बुहारने की चेष्टा करता है वही अपनी मृत्यु के पचास वर्ष बाद भी जिन्दा रहता है और कहलाता है - गजानन माधव मुक्तिबोध। मुक्तिबोध समाज की विसंगतियों, अव्यवस्थाओं और विद्रुपताओं से अकेले ही मुठभेड़ करते हैं,इसमें उनका परिवार भी साथ छोड़ देता है, शिक्षा, मित्र और वह समाज भी काम नहीं आते जिसके लिए उसने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। द्वितीय महायुद्ध के वक्त व्यवस्था उस जानवर की भांति हो चुकी थी जिसके मुँह खून लग चूका हो और वह आदमखोर अब हर वक्त ही आम आदमी को चबा डालने की फिराक में रहता हो। व्यवस्था की तानाशाही और आम जनता को को घुटन भरी दबी कुचली जिन्दगी जीते देख अपनी कविता "नक्षत्र खंड" के माध्यम से वह जनता का आह्वान करते हैं। -
बशर्ते तय करो, किस ओर हो तुम, अब
सुनहले उर्ध्व आसन के
दबाते पक्ष में, अथवा
कहीं उससे लुटी टूटी
अंधेरी निम्न कक्षा में तुम्हारा मन,
कहाँ हो तुम?
मगर जनता से कोई जवाब न पाकर वह स्वयं इस अग्निगर्भ में कूद पड़ते हैं। और लिखते हैं कुछ ऐसा -
"कि जिससे वक्ष
हो सिद्धान्त-सा मज़बूत
भीतर भाव गीला हो।"
वह सत्ता के आम नागरिक पर हो रहे जुल्मों सितम से आहत थे। उससे भी ज्यादा क्षुब्द वह जनता के बिना किसी प्रतिकार के उस जुल्म को चुपचाप सहते जाने की प्रवृत्ति से थे। वह अकेले इस कारा से जूझ रहे थे। मनुष्य के विरूद्ध षडयंत्र पर कटाक्ष करती उनकी एक अन्य कविता देखें -
"दुनिया को हाट समझ
जन-जन के जीवन का
मांस काट
रक्त-मांस विक्रय के
प्रदर्शन की प्रतिभा का
नया ठाठ
शब्दों का अर्थ जब
नोच-खसोट लूट-पाट
तब मनुष्य उबकर उकताकर
ऐसे सब अर्थों की छाती पर पैर जमा
तोड़ेगा काराएं कल्मष की
तोड़ेगा दुर्ग सब
अर्थों के अनर्थ के"

मुक्तिबोध को सर्वाधिक प्रसिद्धि उनकी कवितायें 'अँधेरे में' और 'ब्रह्मराक्षस' ने दिलवाई। उनकी कविता 'अँधेरे में' वो अँधेरी गुफा है जिसमें प्रतीक और फंतासी रुपी असंख्य कोबरा छुपकर बैठे हुए हैं। कोई भी आलोचक या समीक्षक रुपी सपेरा जब - जब भी उस गुफा में पाँव रखने या अर्थ से छेड़छाड़ रुपी सरसराहट की चेष्टा करता है। यह कोबरा उसमे दाँत गड़ा कर अपना सम्पूर्ण जहर उगलने को फुँफकार उठते हैं। या फिर अपने बिम्बों की कुंडली में फँसा उसकी सोचने समझने की ग्रंथि को ही जकड लेंगे। पिछले पचास वर्षों में ऐसा कोई सपेरा (आलोचक ) हिंदी साहित्य जगत में पैदा ही नहीं हुआ जो मुक्तिबोध की रचनाओं के जहर को अपनी आलोचना के मन्त्रों से उतार सके या उन रचनाओं के तीखे विषपूर्ण दंत निकाल सके। अपनी प्रसिद्ध कविता 'अँधेरे में' में मुक्तिबोध एक अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्र उकेरते हुए लिखते हैं -
"गरीबों का वहीं घर, वही छत
उसके ही तल-खोह अँधेरे में सो रहे
गृह हीन कई प्राण
अँधेरे में डूब गए
डालों में लटके जो मटमैले चिथड़े
किसी एक अति दीन
पागल के धन वे
हाँ, वहाँ रहता है सिरफिरा कोई एक"

मुक्तिबोध की कवितायें सरल, सहज और आनंददायक नहीं हैं। यह बसंत की मादकता नहीं वरन जेठ की तन - मन सुलगाती भीषण गर्मी है। सावन की फुहारों से नम हुई सौंधी मिटटी नहीं वरन मरघटों में चिता के जलने के बाद आया सूनापन और आँखों में जलन पैदा करता हड्डियों की राख का धुंआ हैं,उनसे उठती दुर्गन्ध है जो जितनी भयावह है उससे भी कहीं अधिक सत्य,जीवन का शाश्वत सत्य है। मुक्तिबोध की कवितायें हमें प्रेरित नहीं करती वरन समकालीन समस्याओं पर मंथन करने को उकसाती हैं। तारसप्तक में मुक्तिबोध ने स्वयं कहा है - "मेरी कविताए अपना पथ खोजते बेचैन मन की अभिव्यक्ति है। उनका सत्य और मूल्य उसी जीवन-स्थिति में छिपा है। "मुक्तिबोध ने जिस समय कविता करना शुरू किया वह युग छायावाद का शिखर युग था। और जैसी जग की रीत है,मानव का मनोविज्ञान है, कि उच्चता पर पहुँचकर भी मानव संतुष्ट नहीं होता और कुछ नवीन तलाशता है। यही सृजन का आधार तत्व भी है,जहाँ संतुष्टि हो वहां नवीन सृजन होना असंभव है। अत: छायावाद के शिखर पर निराला और पन्त जैसे छायावादी भी तब मार्क्सवाद में रुझान लेने लगे जिसका असर उनकी कुछ रचनाओं में दृष्टिगोचर भी होता है। और मुक्तिबोध ने इस नयी डगर को पकड़ कर आगे बढ़ना ही उचित समझा। 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' के यह अंश देखें -
पी गया आसमान
अंधियाली सच्चाइयाँ घोंट के
मनुष्यों के मारने के खूब है ये टोटके
गगन में कर्फ्यू
धरती पर चारों ओर जहरीली छी: थू:

मुक्तिबोध की कवितायें अर्जेंटाइनी लेखक "बोर्खेज" की रचनाओं की तरह प्रतीक और कल्पनाओं से अपनी कहन को गति प्रदान करती हैं। मानो वे जागते हुए ऐसे ख्वाब देख रहे हों जो उनके और समकालीन जनता के दुसाध्य जीवन को साध्य बना दे। द्वितीय महायुद्ध के बाद लोगों की जो हालत थी उसमें यह स्वप्न हर कोई देखना चाहता था। मगर आँख बंद करने की हिम्मत नहीं थी। आम जन के वो स्वप्न जिन्हें लोग आँख बंद करके भी नहीं देख पा रहे थे। मुक्तिबोध ने उनके वही स्वप्न उनकी आँखों से उतार अपनी आँखों के घोंसलों में रख लिए और जिस प्रकार कौआ कोयल के अण्डों की देखभाल करता है ठीक वैसे ही मुक्तिबोध ने वह बड़ी ही सावधानी और जिम्मेदारी के साथ उन्हें हुबहू अपनी कविताओं के माध्यम से कागज़ पर उतार दिया। उनकी एक कविता में इसका प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है-
जिंदगी में जो कुछ है, जो भी है।
सहर्ष स्वीकारा है
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है
गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब
यह विचार-वैभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल-पल में
जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है
संवेदन तुम्हारा है

उनकी कल्पनाएँ उनके प्रतीक, ठीक उस योगी की तरह हैं जो वशीकरण का हुनर रखती हैं। वशीकरण भी कुछ ऐसा ही होता है जो सामने वाले को अपनी कल्पनाओं में ऐसा उलझा देता है जिससे प्रभावित इंसान उन्हीं में उलझ कर रह जाता है उसे न बाहर जाने का मार्ग दिखाई देता है न अन्दर की स्तिथि को वह समझ पाटा है। मानो किसी रहस्मयी जगह में विचरण कर रहा हो। और जब वशीकरण टूटे तो उसकी सांस बढ़ी हुई,माथे पर पसीना,जहन में सिर्फ और सिर्फ हैरानी बाकी बचे कि - क्या देख लिया उसने? ब्रह्मराक्षस कविता की यह पंक्तियाँ उनकी कविताओं के विषय और उनकी दुर्बोधता को सिद्ध करने में पूरी तरह से सार्थक हैं।
"समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।"

‘एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथन’ में मुक्तिबोध लिखते है -
"दुख तुम्हें भी है।
दुख मुझे भी है
हम एक ढहे हुए मकान के नीचे
दबे है।
चीख निकलना भी मुश्किल है
असंभव
हिलना भी
भयानक है बड़े-बड़े ढ़ेरों की
पहाड़ियों-नीचे दबे रहना और
महसूस करते जाना
पसली भी टूटी हुयी हडडी
भंयकर है! छाती पर वजन टीलों
का रखे हुए
उपर के जड़ीभूत दबाव से दबा हुआ
अपना स्पंद
अनुभूत करते जाना
दौड़ती रूकती धुकधुकी
महसूस करते जाना भीषण है
भंयकर है!
वाह क्या तजुर्बा है!!
छाती में गडढ़ा है!!!

मुक्तिबोध की कवितायें अपने समकालीन लेखकों की तुलना में अधिक लम्बी और दुर्बोध हैं। उनकी कविताओं की एक खासियत यह भी है की उनमे आदि तो आपको फिर भी मिल जाएगा मगर अंत ढूँढने से भी न मिलेगा। यह ठीक भूलभुलैय्या महल की तरह से हैं जहाँ आप पानी समझोगे वहां आप ठोस धरातल से टकराओगे और जहाँ धरातल समझोगे वहां मिथक का पानी बह रहा होगा और आप उसमे गले तक डूब जाओगे। इस अंश से उस अंश तक आप भटकते रहोगे मगर बाहर जाने का वो गूढ़ दरवाजा आपको मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मुक्तिबोध अपनी कविताओं की इस खासियत से पूरी तरह से वाकिफ थे तभी तो उन्होंने अपनी डायरी में इसके कारण पर लेखनी चलाई - "यथार्थ के तत्व परस्पर गुम्फित होते है और पूरा यथार्थ गतीशील, इसलिए जब तक पूरे का पूरा यथार्थ अभिव्यक्त न हो जाए कविता अधूरी ही रहती है।"

वास्तव में मुक्तिबोध की कविताओं का फलक हमारी सोच से भी बड़ा है। उनकी कल्पनाएँ ठीक उसी नटखट बच्चे जैसी हैं जिसे विभिन्न रंग और केनवास देकर अकेले छोड़ दिया जाए। जिस तरह वह बालक केनवास का एक इंच भी सफ़ेद नहीं छोड़ता उसे अपने विभिन्न रंगों से सरोबार कर देता है। और अनायास उनपर उभर आई विचित्र आकृतियों को देख पुलक उठता है। मुक्तिबोध का काव्य सृजन भी ठीक वैसा ही है। वह रूपक और कल्पनाओं का प्रयोग करते उनमे इतना खो जाते थे कि उसका अंत कहाँ करना है,और कब करना है?यह खुद उन्हें भी ज्ञात नहीं रहता था। जो समझ आता,जैसा आता वह तो बस कल्पनाओं के रंग भरे जाते थे। मेरी इस बात को उनकी कविताओं के शीर्षक भी पुष्ट करते हैं जैसे ब्रह्मराक्षस, चाँद का टेढ़ा मुँह, बैचैन चील इत्यादि। इसी की बानगी उनकी कविताओं में भी देखिये -
"बेचैन चील!
उस जैसा मैं पर्यटनशील
प्यासा-प्यासा,
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील
या पानी का कोरा झाँसा
जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब
इनकार एक सूना!

मुक्तिबोध की कोई कविता कहीं समाप्‍त नहीं होती,वह तो एक के बाद दूसरी कल्पनाएँ और उन कल्पनाओं के तले में जा कर अन्य संभावनाएं ढूँढने में व्यस्त हो जाया करते थे । इस कविता में तो मुक्तिबोध ने स्वयं इस बात को सिद्ध कर दिया है –
"नहीं होती, कहीं भी ख़त्‍म कविता नहीं होती
कि वह आवेग-त्‍वरित काल यात्री है।"

मुक्तिबोध ने लगभग दौ सौ से अधिक कविताएँ लिखी जिसमें ‘एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथन, दिमागी गुहा, अंधकार का ओरांग-उटांग’ आदि कविताएँ शमिल है। अपने समकालीन रचनाकारों और उनकी रचनाओं की समीक्षा वह अपनी कविता में तंज करते हुए कहते हैं कि -
"और मैं सोच रहा कि जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और वह ठीक चुनाव नहीं कर पाता है "

मुक्तिबोध नकारात्मक समय में सकारात्मकता के लिए जंग लड़ रहे थे और इस जंग में उनके साथी केवल मात्र उनके विचार बने। उन्होंने जिससे प्रेम किया उसे प्रेम जीवन की चकाचौंध से था मुक्तिबोध के ह्रदय में पसरे सन्नाटे से नहीं। उन्होंने समाज के शोषित वर्ग को अपना समझ उनके हक में आवाज उठायी मगर यहाँ भी वह अकेले पड़ गए क्योंकि समाज में जो शोषित थे वह शोषण के खिलाफ खड़ा होना जानते ही नहीं थे और जो ईमानदार थे,वह खामोश थे बाकी बचे बेईमान वह तो इन खामोशों की खामोशी का फायदा उठाकर अपनी धूर्तता का चीख - चीख कर महिमा मंडनकर रहे थे। मुक्तिबोध जानते थे कि अकेला चना कभी भाड़ नहीं भूंज सकता मगर फिर भी उन्होंने प्रयास किया और उन तमाम खामोशों की जुबान बन गए जो बोलना तो चाहते थे पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। मुक्तिबोध उन्हें ललकारते हुए कहते -
"कभी अकेले में मुक्ति न मिलती
यदि वह है तो सबके ही साथ है।"

उन्हें पता था कि तत्कालीन सत्ता और समाज के खिलाफ जो संघर्ष आज उन्होंने छेड़ा है। कल उसका पारितौशिक उन सबको जरूर मिलेगा। उनकी कल्पनाएँ सच होकर ही रहेंगी,सूखे कुंएं से पानी की धार निकल ही आएगी। यह बात सुनने वाले तो बहुत थे मगर समझने वाला कोई न था।
"मैं विचरण करता-सा हूँ एक फैंटेसी में
यह निश्चित है कि फैंटेसी कल वास्तव होगी।"

यूँ मुक्तिबोध की कवितायें आम मानस के मस्तिष्क के लिए सुपाच्य नहीं थी। मगर जिनको इंगित करके लिखी गयीं थी उनकी बदहजमी का विशेष कारण साबित हो रहीं थी। इनदिनों साहित्य में खेमेबाजी चल रही थी और कुछ खेमे सत्ता के तलवे चाटने और काबिल को नाकाबिल साबित करने में महारत हासिल किये थे। शायद यही वो कारण था कि बेहतरीन कहानियों,जनवादी लेखों और कविताओं की सुन्दर बिम्बात्मक अभिव्यक्ति के वावजूद मुक्तिबोध अपने समकालीनों से कम प्रतिष्ठा अर्जित कर सके। उनकी समस्त ख्याति उन्हें मृत्योपरांत ही प्राप्त हुई जैसे कि एक सैनिक ताउम्र सरहद पर मौसम की मार और दुश्मनों की गोलियां झेलता रहे,उसे कोई नहीं पहचानता। असली पहचान और परमवीर का सम्मान उसे शहीद होने के बाद ही मिलता है -
''बिल्लियों के नाखून
और भी धारदार हो गए,
अजीब तरह से हुआ खून
मूर्च्छित कर वश में किया गया।''

मुक्तिबोध ने खुद को किसी भी पाश्चात्य लेखक या कवि से प्रभावित कभी नहीं माना मगर जर्मन उपन्यासकार काफ्का और अर्जेंतैनी लेखक ब्रोंखेज के अस्तित्ववाद का उनकी रचनाओं पर गहरा प्रभाव नजर आता है। जैसा कि काफ्का ने कहा है - "स्वयं और दुनिया के संघर्ष में दुनिया को पीछे रखो" कुछ ऐसा ही भाव मुक्तिबोध की इस कविता का भी है -
व्रणाहत पैर को लेकर
भयानक नाचता हूँ, शून्‍य
मन के टीन-छत पर गर्म
हर पल चीख़ता हूं, शोर करता हूँ
कि वैसी चीख़ती कविता बनाने से लजाता हूँ

मुक्तिबोध जनवादी कवि थे और जनवादी कवि की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अपने ह्रदय पर जन -जन के दुःख धोता है मगर उसके दुःख उसकी पीड़ा से लोग जानकार भी अनजान बने रहते हैं। इस कार्य में उसके मित्र,और अपने बहुत पीछे छूट जाते हैं और जो शृंखला उसके सामने बनती जाती है वो उसके विरोधियों और सत्ता के चापलूसों की होती है जो उस अकेली मुखर आवाज को दबाने और कुचलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ना चाहते। आम आदमी को इस घने अंधेरे से निकलने को उकसाते हुए मुक्तिबोध चकमक की दुनिया के इस अंश में क्या कहते हैं देखें -
अधूरी और सतही जिन्‍दगी के गर्म रास्‍तों पर
हमारा गुप्‍त मन
निज में सिकुड़ता जा रहा
जैसे कि हब्‍शी एक गहरा स्‍याह
गोरों की निगाह से अलग ओझल
सिमटकर सिफ़र होना चाहता हो जल्‍द
मानों क़ीमती मजमून
गहरी, ग़ैर-क़ानूनी किताबों, ज़ब्‍त पत्रों का

सत्ता को उनका यह प्रतिकार कहाँ सहन था नतीजा यह हुआ कि सन 1962 में उनकी एक प्रसिद्द पाठ्यपुस्तक पर रोक लगा दी गयी। मुक्तिबोध को इस बात का बड़ा धक्का लगा। इस आघात के बाद टूटे ह्रदय और अंतस में क्रोध की चिंगारियों को इधर - उधर पूरे जिस्म में आतिश सा कौन्धाते हुए वह लिखते हैं –
"कि कंधे से अचनाक सिर कटा और
उड़ गया, ग़ायब हुआ।
वह जा गिरा
उस दूर जंगल के
किसी गुमनाम गड्ढे में"

और इसके ठीक दो वर्ष वाद 11 सितंबर 1964 को उनकी मृत्यु भी हो जाती है। मुक्तिबोध की कुछ प्रमुख कविताओं में 'अंधेरे में', 'चाँद का मुँह टेढ़ा है', 'भूरी-भूरी खाक धूल' शामिल हैं। दुर्भाग्य से मुक्तिबोध अपने जीवनकाल में अपनी किसी किताब को प्रकाशित होते नहीं देख पाए। मुक्तिबोध की पहली किताब 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' जब प्रकाशित हुई, तब मुक्तिबोध की मौत हो चुकी थी। मुक्तिबोध भुक्ति और मुक्ति के अंतर्द्वंद में जूझते रहे। भुक्ति से मुक्ति का मार्ग ढूढने और उसपर अग्रसर होने की ललक उनमें कूट कूटकर भरी हुई थी। यही जिजीविषा उनसे इन ह्रदय भेदी कविताओं की रचना करवाती रही। जिन्हें आज उनकी मृत्यु के पचास वर्ष से भी ज्यादा व्यतीत होने पर भी कालजयी नई कविता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। अंत में उनकी एक और रचना को उद्धृत करते हुए मैं इस लेख का समापन करूँगी -
“बावड़ी में वह स्वयं
पागल वृतिकों में निरंतर कह रहा
वह कोठरी में किस तरह
अपना गणित करता रहा
औ मर गया ”
सन्दर्भ -
  • नेमिचन्द जैन, मुक्तिबोध रचनावली-4,राजकमल प्रकाशन, 1980 पृ.108
  • वही, पृ.105
  • रामविलास शर्मा; भाषा और समाज; राजकमल प्रकाशन, 1968, पृ. 406
  • स. न. ही. न. अज्ञेय; आलवाल; नेशनल पबिलिशिंग हाउस, दिल्ली, 1977; पृ 11
  • स. न. ही. न. अज्ञेय; तार सप्तक, भारतीय ज्ञानपीठ, कलकत्ता, 1943 पृ. 110
  • गंगा प्रसाद विमल; मुक्तिबोध का रचना संसार; सुषमा पुस्तकालय,दिल्ली; 1986, पृ. 71
  • गजानन माधव मुक्तिबोध; नयी कविता का आत्म संघर्ष तथा अन्य निबन्ध; राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1971, पृ. 4
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