साक्षात्कार जो मैंने लिए - यूनुस खान

भोपाल में बिताए बचपन के दिनों को याद करता हूँ तो आंखों के सामने वो गली-मुहल्ले आ जाते हैं और कानों में विविध-भारती गूँजने लगता है। भोपाल की उन गलियों और सड़कों पर चलते हुए हम हमेशा विविध-भारती के दायरे में होते थे। हर घर और दुकान से रेडियो की आवाज़ आ रही होती थी। तब शायद अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन विविध-भारती में माइक्रोफोन संभालना होगा और तमाम महत्वपूर्ण शख्सियतों से रूबरू होने का मौक़ा मिलेगा। मुझसे कहा गया है कि अपने साक्षात्कारों से जुड़ी हुई यादें आपसे बांटूं। 

यादों के दरीचों से जाने कितनी-कितनी आवाज़ें कानों में गूंज रही हैं। पर अपना पहला इंटरव्यू फौरन ही याद आ रहा है। 1996 में मैंने विविध-भारती पर अपना पहला इंटरव्यू लिया था गीतकार योगेश जी का। मुझे याद है कि जब पता चला कि कल योगेश जी आ रहे हैं और मुझे उनसे बात करनी है तो जैसे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। और ये सहज भी था। जिस गीतकार के गाने कंठस्थ रहे हों, जिसके आप मुरीद रहे हों- उससे रूबरू होना सौभाग्य। नहीं तो क्या है! तब वो ज़माना था जब हम काग़ज पर सवाल बाक़ायदा लिख लिया करते थे। हालांकि इतने बरस बाद अब बिना काग़ज़ के ज़ेहनी तैयारी के साथ इंटरव्यू लेते हैं। बहुत बरस बात जब फिर योगेश जी से पिछले बरस और भी लंबा इंटरव्यू लेने का मौक़ा मिला, तो हमने मिलकर पुराने दिन फिर याद किये। उस पहले इंटरव्यूे और अभी वाले इंटरव्यू को मिला दें तो योगेश जी का पूरा जीवन वृत्त हमने रिकॉर्ड कर लिया। उन्होंने मुंबई के अपने संघर्ष के बारे में हमें बताया। अपने एक मित्र के बारे में बताया, जिसका बहुत बड़ा योगदान था उनके करियर को बनाने में। और अपनी रचना प्रक्रिया भी बताई। बताया कि किस तरह 'कहीं दूर जब दिन ढल जाये' उन्होंने लिखा और किस तरह आया उनका मशहूर गैर फिल्मी गीत 'कुछ ऐसे भी पल होते हैं, जब रात के गहरे सन्नाटे मीठी सी नींद में सोते हैं'। इंटरव्यू के बाद चर्चगेट की सड़कों पर टहलते हुए योगेश जी से बतियाना बहुत ही सुखद था।   

शुरूआती दौर के बहुत ही यादगार इंटरव्यूज़ में से एक था दादामुनि अशोक कुमार के साथ एक पूरा दिन बिताना। यूनियन पार्क चेम्बूर का दादामुनि का भव्य घर और उस घर में पसरा दादामुनि का अकेलापन। अशोक कुमार ने बताया कि कई दिन हो गये, वो घर की पहली मंजिल से नीचे नहीं उतरे हैं। सामने हॉल की खिड़की से गोल्फ-कोर्स नज़र आ रहा था। दादामुनि ने बताया कि एक ज़माने में वो वहां गोल्फ़ खेला करते थे। जब दादामुनि को ये पता चला कि मैं भी मध्य-प्रदेश से ही हूं तो उन्होंने बहुत बहुत बातें याद कीं। पंद्रह के पहाड़े का वो तरीक़ा भी- जो मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड वाले इलाक़ों में खूब चलता है--'पंद्रह एकम पंद्रह दूनी तीस तिया पैंतल्ला चौको साठ......'। दादामुनि से बातें करना एक पूरे युग से होकर गुज़रना था। उसमें उनके ज़माने की नायिकाओं की, बॉम्बें टॉकीज़ की बातें थीं तो उनमें किशोर कुमार भी थे। दादामुनि की शादी का रोचक किस्सा भी था और फिर ज़ईफ़ी आने के बाद का निपट अकेलापन और उदासी भी। हिंदी सिनेमा की एक इतनी बड़ी शख्सियत एक घर में महदूद। दुष्यंत का शेर याद आ गया-
'एक बूढ़ा जी रहा है, इस शहर में या यूं कहें
एक अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है'।
इस इंटरव्यूल के कुछ दिन बाद दादामुनि का देहावसान हो गया। जब भी उनकी याद आती है तो ज़ेहन में गूंज उठता है फिल्म  'आर्शीवाद' का गाना- 'जीवन से लंबे हैं बंधु/ ये जीवन के रस्ते'।  

आज जब ये याद करने बैठा हूं, तो कई लोगों के चेहरे याद आ रहे हैं। संगीतकार ओ.पी. नैयर जब विविध भारती आए तो तय था कि हमारे वरिष्ठू साथी अहमद वसी उनसे बातचीत करेंगे। नैयर साहब का जलवा ही अलग था, कार से उतरते ही जैसे उनकी नज़रें कुछ खोज रही थीं। कहीं एक तरफ मैं खड़ा था। जाने क्यों वो मेरी तरफ आए तो मैं पसीना-पसीना हो उठा। दरअसल वो कंधे पर हाथ रखकर चलने के लिए एक लंबा व्यक्ति तलाश रहे थे। और संयोग से मैं वो व्यक्ति बन गया। बहरहाल...इंटरव्यू वसी साहब ले रहे थे। फिर एक और वरिष्ठ साथी कमल शर्मा भी शामिल हुए और बीच इंटरव्यू में मुझे भी भेज दिया गया। इसकी वजह ये थी कि सवालों को टालने में बेहद माहिर नैयर साहब ज़ोरदार बैटिंग कर रहे थे। और शरारती सवाल पूछने के लिए उम्र में सबसे छोटे होने की वजह से मुझे भेजा गया। दोहरा चौहरा कर सवाल फिर फिर दाग़े गये जिनमें से कुछ के जवाब नैयर साहब ने दिये और वो दिन मेरे लिए बड़ा यादगार बन गया। नैयर का ये कहना कितना दिलचस्पे था--
'नैयर ने कभी किसी गाने की दो ट्यून नहीं बनायी, कभी कोई गाना दूसरी बार रिकॉर्ड नहीं किया, पहला टेक ही फाइनल रहा'।
या उनका रफ़ी साहब से नाराज़ हो जाने वाला और फिर बरसों बाद रफ़ी से एका हो जाने का किस्सा। उफ़! नैयर का स्टूडियो में मौजूद होना ही कितना ठसकदार था हमारे लिए। 

नौशाद साहब और ख़ैयाम से भी विविध भारती में मुलाक़ातें हुईं। हालांकि उनसे सीधे बातचीत रिकॉर्ड करने का मौक़ा नहीं मिला। संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंदजी के आनंदजी से विविध भारती के चर्चगेट स्टूडियोज़ में मुलाक़ात हुई थी। वो इंटरव्यू कोई और ले रहा था, पर मैं उन्हें सुनने के लिए वहां मौजूद था। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया था कि किस तरह 'सफर' के गाने 'जिंदगी का सफर' रिकॉर्ड करने के लिए उन्होंने किशोर कुमार को ऊंचे स्टूल पर बैठाया और माइक नीचे लगाया। उन्होंने हमें बताया था कि इस तरह माइक जब नीचे हो- तो आवाज़ का सोज़ ज्यादा उभर कर आता है। 

एक बार किसी काम से मन्ना डे के घर जाने का मौक़ा मिला। मेरी सहयोगी और अब जीवन संगिनी ममता भी साथ थीं। परिचय करवाया गया। बताया गया कि हम किस क़दर मन्ना दा के दीवाने हैं। उन्होंने फौरन ही पूछा, ममता सिंग, डू यू सिंग? और एक ठहाका पसर गया। ममता जी एकदम निरूत्तर हो गयीं। कुछ इंटरव्यू बहुत ही मुश्किल होते हैं। इसकी वजह शायद सामने वाली शख्सियत की छवि होती है। शत्रुघ्न‍ सिन्हा से बातचीत के लिए उनके घर जाते वक्त मैं बहुत सतर्क था। पता नहीं कब किस बात पर वो नाराज़ हो जाएं। या कोई सवाल उन्हें अच्छा ना लगे। पर उन्होंने तो बचपन में कार की फ्यूल टैंक में पानी का पाइप जोड़ देने से लेकर जिंदगी के कई और किस्से बड़ी ही आत्मीयता से सुनाये। हम सबको हैरत तब हुई जब उन्होंने रामधारी सिंह 'दिनकर' की 'रश्मिरथी' की पंक्तियां बहुत ही प्रभावशाली तरीक़े से सुनायीं। एक फिल्मी सितारे के मुख से 'दिनकर' की प्रांजल भाषा वाली पंक्तियां सुनना हमारे लिए बहुत ही सुखद आश्चयर्य बन गया।

जाने माने सेक्सोफौन और मेटल फ्लूट वादक मनोहारी सिंह से मुलाक़ात बड़ी ही दिलचस्प रही। एक बार हमारी सहकर्मी और राष्ट्री्य पुरस्कार प्राप्त गायिका छाया गांगुली ने बताया कि आज मनोहारी दादा स्टू्डियो में आ रहे हैं। मैंने चहकते हुए उनसे कहा कि आप मुझे ज़रूर मिलने का मौक़ा दीजिएगा। जब मनोहारी दादा को मैंने बताया कि मैं उनका कितना मुरीद हूं और किस तरह से उनके दोनों कैसेट मैंने कहीं कहीं से जुगाड़ कर जमा कर लिए हैं तो वो जज्‍बाती हो गये। उनकी आंखें भीग गयीं। पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों को शायद इतना नाम नहीं मिलता और पता नहीं क्या बात थी, क्या वजह थी कि मैंने मनोहारी दादा को इतना जज्बाती होते देखा। इसके कई बरस बाद जब मैंने फोन पर उनसे बात की और उनसे कहा कि मैं उनसे एक लंबी बातचीत करना चाहता हूं तो उन्होंने अपनी खराब सेहत का हवाला दिया। पर मैंने उनसे कहा कि अगर आप इंटरव्यू नहीं देंगे तो मैं आपके घर के आगे भूख हड़ताल पर बैठ जाऊंगा। इस बात पर वो हंस पड़े और आखिरकार मेटल फ्लूट और सेक्सोफोन लेकर स्टूडियो आए। उन्होंने जब ‘जा रे उड़ जा रे पंछी’ और ‘हुई शाम उनका ख्या्ल आ गया’ जैसे गानों के अपने पीस बजाकर सुनाए तो जैसे रोमांच हो गया था। इन पंक्तियों को लिखते हुए मैं बिल्कुल उसी दिन में जा पहुंचा हूं। 

सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से बात करने का सपना भला किसका ना होगा। मुझे किसी-किसी संदर्भ में उनसे टेलीफोन पर बात करने का मौ़क़ा दो तीन बार मिला। उनके घर जाने और उनके चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ। मुझे याद है कि जब फोन पर मैंने उनसे इंटरव्यू की बात की तो उन्होंने कहा, मेरे गाने के बारे में तो सारी बातें पहले ही हो चुकी हैं। क्या बार-बार वही बातें दोहराऊं। पर जब मैंने उनसे झोंक में कह दिया कि चलिए गाने की बात करेंगे ही नहीं, कुछ और ही बात करते हैं तो वो झट से बोल पड़ीं-
'चलिए शुरू करते हैं'।
शुक्र है कि मेरा रिसर्च तगड़ा था और मुझे गाने से इतर उनकी रूचियां पता थीं। मैंने लता जी से क्रिकेट, फोटोग्राफी, जूलरी डिज़ाइनिंग और परफ्यूम के शौक़ के बारे में बातें कीं। जब मैंने उनसे परफ्यूम गिफ्ट करने की उनकी आदत के बारे में पूछा तो उन्होंने तपाक से कहा कि जब आप मेरे घर आयेंगे तो मैं आपको भी परफ्यूम गिफ्ट करूंगी। लता दीदी ने फोटोग्राफी और क्रिकेट के बारे में भी विस्तार से बताया। वो बातें आज हमारे संग्रहालय की अनमोल निधि हैं। 

जब देव आनंद को दादा साहेब फालके पुरस्कार मिला, तो मैंने उनके दफ्तर फोन किया। पता चला कि वो तो महाबलेश्वर में हैं। किसी तरह होटल का नाम पता लगाया और वहां का नंबर खोजकर फोन किया। ऑपरेटर फोन फॉरवर्ड करने को राज़ी नहीं हो रही थी। किसी तरह दो तीन बार उसे फोन फॉरवर्ड करने को राज़ी करवाया और आखिरकार देव साहब ने फोन उठाया— है....लो। दिल की धड़कनें एकदम तेज़ तेज़ दौड़ रही थीं। देव साहब से बड़ी फलसफाई बातें हुईं। उन्हों ने बताया कि वो जिंदगी में हमेशा पुरानी बातों को भूलकर आगे की सोचते हैं। उन्हें कोई गिला-शिकवा नहीं कि इतनी देर से अवॉर्ड क्यों दिया जा रहा है। बहुत बहुत अच्‍छा रहा फोन पर बातें करने का वो अनुभव। 

जाने माने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी को जब दादा साहेब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो उनसे फोन पर बात करने का मौक़ा मिला। जब मैंने उनसे पूछा कि उनकी फिल्मों में रेडियो एक बैक-ग्राउंड ध्वनि की तरह हमेशा आता है। तो उनका जवाब था कि मैं ये मानता हूं कि विविध भारती मध्यमवर्गीय जीवन का जीवन-संगीत है। उसका बैकग्राउंड म्यूजिक है। इसीलिए मैंने जानबूझकर ऐसा किया है। इतना अच्‍छा लगा ये सुनकर कि पूछिए मत। 

अभी हाल ही में जाने माने निर्माता निर्देशक जे पी दत्ता से बातें हुईं। उन्होंने बताया कि किस तरह बचपन की स्मृति उनके लिए अपनी मां के स्पर्श और आकाशवाणी के सिग्नेचर म्यूजिक की ध्वनि से जुड़ी हुई है। आकाशवाणी की संकेत धुन, जिसे वॉल्टनर कॉफमैन ने बनाया था- उसकी आवाज़ उनके जीवन में कितनी मायने रखती है। फिर वो एकदम बचपन की यादों में खो गये। स्कूल का समय होना, रेडियो की आवाजों के साथ वक्त का अहसास। इसी तरह की यादें संजय लीला भंसाली ने भी बांटी थीं। उन्होंने तो बताया था कि उन्हें स‍िनेमा से जोड़ा ही विविध भारती ने था। अचरज होता है ये जानकर की ये सभी नामी हस्तियां किस कदर सादा मिजा़ज हैं। और किस तरह उनकी पुरानी यादें हममें से बहुत लोगों की यादों से अलग नहीं हैं। अभिनेता जैकी श्रॉफ से तो जब भी मुलाक़ात होती है तो पुराने गानों पर हमारा लंबा डिस्कशन होता है। जैकी बताते हैं कि बचपन में जब वो ‘चार रास्ता’ वाले इलाक़े की एक चॉल में रहते थे तो किस तरह मां रात को रेडियो लगाकर उन्हें बिस्तर पर लिटा देती थी। और किस तरह ‘छायागीत’ और ‘भूले बिसरे गीत’ उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गये। 

जब अभिनेत्री तब्बू से मुलाक़ा‍त का दिन आया तो रास्ते में ही ये अहसास हुआ कि उन्होंने प्रश्नावली लेकर आने को कहा था और आदतन मैंने प्रश्नावली लिखी नहीं है। वो तो मेरे ज़ेहन में है। मेरा मानना है कि काग़ज सामने रखने से इंटरव्यू् अकसर ही मेकेनिकल या यांत्रिक हो जाता है। बातचीत में वो सहजता और प्रवाह नहीं रहता। बहरहाल.. अब तो कोई तरीक़ा नहीं था। सीधे तब्बू के पास पहुंचे। पता चला कि वो वीडियो लाइब्रेरी वाले के साथ बैठी हैं और फुरसत के पलों के लिए DVD चुन रही हैं। बस बातों का सिलसिला चल पड़ा, पर उन्हें याद था कि उन्होंने सवाल लेकर आने को कहा था। मुझे लगा कि कहीं इंटरव्यू कैंसल ना हो जाए इस बात पर। मैंने उनसे बड़ी सहजता से कहा कि ऐसा कोई सवाल नहीं होगा, जिसका आप जवाब ना देना चाहें। फिर क्या। था बातों का सिलसिला चल पड़ा और तब्बू तो रेडियो की शौकीन निकलीं। उन्हो ने बताया किस तरह वो आज भी रेडियो सुनती हैं। हैदराबाद के उनके घर में लगातार रेडियो चलता ही रहता था। और विविध भारती उनका पसंदीदा चैनल हुआ करता था, आज भी है। बस फिर तो बातें बस चलती ही चली गयीं। 

इसी तरह एक और बड़ी मजेदार याद है। अभिनेत्री शबाना आज़मी और उनके भाई और मशहूर सिनेमेटोग्राफर बाबा आज़मी का इंटरव्यू किया जाना था। मौक़ा था दीवाली के दिनों में भाई दूज का और इंटरव्यू का मुद्दा था भाई बहन की बचपन की शरारतें। शबाना से पहले भी बातें हुई थीं। तब उन्होंने फिल्म संसार में अपने पच्चीस साल पूरे किये थे। और जाहिर है कि बातचीत काफी औपचारिक सी हुई थी। लेकिन भाई दूज के मौक़े पर सामने आया उनका शरारती रूप। उन्होंने बताया कि बचपन में एक बार नदीम ने चीकू खाते वक्त  उसका बीज भी खा लिया। अब शबाना उन्हें डराने लगीं कि तुम्हारे पेट में चीकू का पेड़ उग जायेगा। नदीम डर गये। किसी तरह सोए तो शबाना ने बाहर से चीकू की एक डाली तोड़कर उनके मुंह में लगा दी। सुबह जब नदीम उठे तो शबाना ने कहा, देखा कहा था ना कि चीकू का पेड़ उग जायेगा। नदीम का रोते रोते बुरा हाल हो गया और घर के सब लोग खूब हंसे। ये बात सुनकर जाहिर है कि हमारे श्रोता भी खूब हंसे होंगे। 

विविध भारती पर मेरे इंटरव्यूज़ से जुड़ी यादों का सिलसिला अंतहीन है। फिर कभी इसी तरह की कुछ और यादें आपसे बांटूंगा।  

(लेखक विविध भारती के जाने-माने उद्घोषक और श्रोताओं के चहेते प्रस्तोता हैं।)

                                                                                                      अनुक्रमणिका, जनवरी 2017