स्त्री

- सत्या शर्मा 'कीर्ति'

सत्या शर्मा 'कीर्ति'
कल मेरी कविता से निकल
कहा स्त्री ने
अहा! कितना सुखद
आओ तोड़ दें बंदिशें
हो जाएं मुक्त
गायें आजादी के मधुर गीत

और नाच उठी स्त्री
उन्मुक्त बहती नदी में
धोये अपने बाल
बादलों का लगाया काजल
टाँक लिया जुड़े में
चाँद सितारों को
तेजस्वी स्त्री
दमकने लगी अपने
व्यक्तित्व और सौंदर्य की
आभा से

कुछ गीत गुनगुनाएं
मेरी  कानों में
आगोश में लिया और
डबडबाई आँखों से देखा मुझे
फिर पुनः समा गयी
पन्नों में ...

बन माँ , बहन, बेटी
और फिर से लुप्त हो गयी
स्वतंत्रता के गीत गाने वाली स्त्री ...