हरदीप सभरवाल की कविताएँ

हरदीप सभरवाल

1. अंतरिक्ष

अंतरिक्ष में वस्तुओं का भार नहीं होता,
वो तैरती है, इधर-उधर, बेखौफ
बिना किसी बंधन के दिशाविहीन ब्रह्माण्ड में,
अपने अपने पथ पर, अपनी नई दिशायें बनाती,
किसी और के अधिकारो का अतिक्रमण किये बिना,
सुना है, धरती पर भी कभी
आत्मायें भारहीन होती थी
परमात्मा का आधा भाग लिये,
उसके सदगुणो में विलीन होने को आतुर,
अंतरिक्ष में,
वस्तुऐं और आत्मायें एक जैसी हो जाती है,
या फिर
धरती पर ही आत्मायें अब
वस्तुओं सरीखी हो गई है
दबी हुई, अपनी अपनी लालसाओं के बोझ तले,
मरती हुई मानवता के माथे से रिसते
अश्वत्थामा के जैसे नासूर का तमाशा देखती
ये धरती की आत्मायें,
धरती से आगे बढ़ना चाहती है,
अंतरिक्ष में परचम फहराने,
शायद सोचती हों कि इस तरह से
वो पुनः वस्तुओं से आत्मायें बन जाऐं
अपनी सम्पूर्ण मानवता के साथ।

2. उम्मीद

आँखे, झाँकती हैं, जिज्ञासावश,
वह जो निश्चल है, निर्मल है,
मनोभावों की मौन स्वीकृति को देता है,
उम्मीद पूर्णता की,
टूटे हुऐ क्षणों की क्षतिपूर्ति का आभास भर,
गहराते मन को भरता है रंगों से,
कि सबसे सात्विक मन भी कभी ना कभी तो,
तलाशता होगा एक तामसिक जिस्म,
नहीं, यह कोई प्रतिस्पर्धा नहीं,
ना ही घट रहा है परिस्थितिवश,
परिणाम है ये उस दिव्यस्वपन का,
जो यथार्थ के टूटे हुऐ खंहडरों में,
ढूँढ रहा है सुनहरे कल को,
हर इक बिखरे हुऐ सहमे से पल से,
सहेज कर उस ज्ञान को ,
जो पूंजी है क्षण-भंगुर जीवन की,
सारांश यही है उस ज्ञान का,
मैं स्वयं ही उम्मीद हूँ, स्वयं के लिए।

3. ख्वाब

ढूँढते तो होंगे उहें वे गलियारे,
जहां कभी वे ख्वाब,
जागा करते थे, चाय की चुस्कियों में,
कभी उमंगों की जम्हाईयां भरते अलसाये,
कभी मेघदूत के पन्नों पर प्रणय का सफर करते,
और कभी समाजवाद की पंक्तियों में
लोगों को उनका हक़ दिलाते
अन्याय के खिलाफ बिगुल बजाते,
कभी बुद्ध की शिक्षाओं में पहुँच कर
आत्मदीप को ज्वलित करते,
अब शायद वे ख्वाब दबे पड़े हो
किसी राशन की दुकान में आटे और नमक के भाव के तले,
कहीं बच्चो की स्कूल की फीस की किसी रसीद के नीचे,
या सरकारी दफ्तरो में अपनी किसी फाईल को पास कराने के लिये दी गई रिश्वत का बोझ उठाते
अपनी मृत्युशय्या पर,
पर ये भी हो शायद
वो पुर्नजीवित हो रहे हों,
कहीं और, किन्हीं और गलियारो में
नन्हे हाथों की नयी आशाओं में।