कुछ कह रहा सम्पादक भी...

प्रिय साथी,

दीपक मशाल 
उम्मीद है आप स्वस्थ और व्यस्त होंगे। 
ब्रह्माण्ड के हर कण की अपनी एक ख़ास गति है, सूरज की, सौरमण्डल के अन्य ग्रहों की, उनके उपग्रहों की.. धरती की और उस पर बसी दुनिया की भी। और सब उसी गति से चलते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं। इस दौरान अपने ग्रह पर तमाम जरूरी- गैरजरूरी बदलाव होते रहे। जो जरूरी थे उन्हें प्रकृति ने अंजाम दिया और बाकियों को इंसान के लालच ने, तथाकथित आधुनिकता की चाह ने। 
इन बदलावों के बीच हमने कैसे-कैसे और क्या-क्या खो दिया और खो रहे हैं इसका हमें अभी तक भान नहीं। खैर बाकी सब गुमशुदा चीजों की पड़ताल बाद में कर लेंगे, अभी बात करते हैं होली के त्यौहार की। होली भारत की तमाम पहचानों में से एक है। सैकड़ों सालों से भारत को रंगों, रोशनी और खुशियों का देश माना जाता आ रहा है तो ऐसे ही नहीं बल्कि यह छवि बनाने में होली, दिवाली, ईद आदि की बड़ी भूमिका रही है। नतीजा यह है कि आज फाल्गुन के महीने में दुनिया के तमाम हिस्सों में रंग आसमान में उछाले जाते हैं, अबीर-गुलाल दोस्तों, परिचितों, करीबियों को लगाए जाते हैं। लेकिन यह परम्परा अब अपनी जन्मभूमि में ही टूटती नज़र आती है। गुझिया-पपरिया, सेव जैसे पकवान अब आधुनिकता की भेंट चढ़ चुके हैं। होली के दिन दिल मिल जाने की बातें कहानियों-किस्सों के हिस्से बनते जा रहे हैं। 
मजाक के रूप में ही सही पर हाल ही में किसी ने लिखा भी था कि एक स्कूल के बच्चे को इम्तिहान में जब होली पर निबंध लिखने को आया तो उसने कुछ इस तरह लिखा कि-
'होली के दिन स्कूल और दफ्तर बंद रहते हैं। यह बहुत खुशी का दिन होता है। उस दिन मामी-पापा, मैं और मेरे भाई-बहिन पिकनिक मनाने जाते हैं। पिकनिक में खूब सारा खाना जैसे केक, पिज़्ज़ा, बर्गर, कोल्डड्रिंक वगैरह खाने के ऑप्शंस होते हैं। पापा और उनके दोस्त ठण्डी बियर पीते हैं। हम खूब मौज-मस्ती करते हैं, मूवी देखने जाते हैं और शाम को घर वापस लौटते हैं।'
कहने का तात्पर्य यह कि अब होलिकादहन, नई फसल की खुशी, रंग, भंग, गुझिया, हँसी- ठिठोली होली के अपरिहार्य अंग नहीं रहे। स्वरुप बदल रहा है। यदि यह स्वरुप भी कुछ हटकर होता तब भी गनीमत थी, मगर अब हर खुशी एक मोनोटोनस रैपर में आ रही है। 
भारत से बाहर रह रहे हम लोग तो तब भी किसी तरह उस होली में डूब जाते हैं जिसको कि हम भारत में छोड़कर आये थे। यहाँ कहीं उसको लघु तो कहीं विराट रूप में मना लेते हैं, लेकिन एक डर है कि जब कभी लौटकर वह सब देखना चाहेंगे तो देख पाना उतना आसान नहीं होगा। 
फिलहाल इतना ही। 
रंगपर्व होली पर आप सभी को सात समुन्दर पार से सतरंगी शुभकामनायें। 

आपका-