रचने दो कविता शब्दों को- मार्टिन जॉन

मार्टिन जॉन 
- मार्टिन जॉन

बने रहने दो शब्दों को
फूलों सा नाज़ुक
ऐसे समय में जब आबो-हवा बारूद के गिरफ़्त में है
उसे महकने दो , गमकने दो !
बरकरार रहने दो
चांदनी से दोस्ती शब्दों की
तपती हवा को शीतलता की ज़रूरत है |

सितारों ने निकाली है बारात
झूमने दो उसे , गाने दो कोई गीत
दरख्तों के परिन्दें
उधार लेना चाहते हैं सुर और स्वर
बरसने दो शब्दों को बारिश की तरह
सूखते समय में तरावट की ज़रुरत है
कोई अलग सी कथा
कोई अलग सी कविता रचने दो शब्दों को
बंजर जिंदगी को सरसता की ज़रुरत है |

जब जब शब्द पत्थर बना
हवाओं के जिस्म से लहू रिसने लगा
जब जब शब्द खंजर बना
ताल-तलैया में अस्थियाँ दिखने लगीं
जब जब शब्द आतातायिओं के कब्ज़े में गया
रंग आसमां का धूसर हो गया |

शब्दों को शब्द रहने दिया जाए
खेलो मत शतरंज की बिसात पर शब्दों को मोहरा बनाकर |
गूँजने दो उसकी महिमा पूरे ब्रहमांड में
क्योंकि ,
*‘आदि में शब्द था
शब्द ईश्वर के साथ था
और शब्द ईश्वर था
वह आदि में ईश्वर के साथ था ......’
(*बाईबिल का पुराना नियम / योहन्ना रचित सुसमाचार का अध्याय 1 और पद संख्या 1से 3)

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