अपने ही घर में - सिंधी कहानियों का हिंदी अनुवाद

देवी नागरानी की पुस्तक की समीक्षा, डॉ. श्रीश पाठक द्वारा
देवी नागरानी
भाषा सेतु है विभिन्न व्यक्तियों के मध्य और अनुवाद सेतु है विभिन्न भाषाओं के व्यक्तियों के मध्य। अनुवाद एक लोकतान्त्रिक विधा है, जिससे भाषा का मूल उद्देश्य सधता है। विलगन में रहना संभव नहीं, सो अनुवाद की अपरिहार्यता भी स्पष्ट है, क्योंकि इससे संवाद की सम्भावना अधिकाधिक होती जाती है। ‘सहित भाव ’ का साहित्य संवेदनाओं की रस्सियां बांध सबके लिए दर्शन का उदात्त मचान खड़ा करता है ताकि विभिन्नता अक्षुण्ण रखते हुए भी मानवमात्र के ऐक्यभाव का स्पंदन स्पर्श होता रहे।

दो भाषाएं अपने साथ दो संस्कृतियों के आरोह-अवरोह भी लिए चलती हैं। उनमें संभव संवाद की गुंजायश अनुवाद टटोलते हैं और दोनों लहरें पारस्परिकता का ताप एवं संवेग साझा कर लेती हैं। अनुवाद का तनिक विचलन इन अन्यान्य सूक्ष्म प्रक्रियाओं को गहरे प्रभावित करती हैं, इसलिए अनुवाद का कार्य एक चुनौतीपूर्ण कार्य तो है ही, साथ ही यह बड़े ही सांस्कृतिक महत्त्व का अनुष्ठान है। दो भिन्न लिपियों का, दो भिन्न भाषाओँ का सम्यक ज्ञान, उनके अनेकानेक विविधताओं के संस्तर का बोध और फिर इनका संयत निर्वहन अनुवाद की प्राकृतिक मांग है। इन सहज कसौटियों पर जो थोड़े से लोग खरे उतर पाते हैं, उसमें पूरे विश्वास के साथ देवी नागरानी जी का नाम रखा जा सकता है। साहित्य की लगभग हर विधा में आप एक सशक्त हस्ताक्षर हैं, पर अनुवादकर्म आपका कालजयी महत्त्व का है। पाकिस्तान के कराची में जन्मीं लेखिका का सिन्धी, हिंदी, अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार है। सम्प्रति अमरीका में रहते हुए भी भारत की हिन्दी माटी पर जन्मस्थान की सोंधी सिन्धी रिमझिम और सिंधी जमीन पर हिंदी फुहारें आप सजाती रहती है। सिन्धी-हिंदी एवं हिंदी-सिन्धी अनुवाद की आप एक सशक्त प्रतिनिधि हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरातन सभ्यता सैन्धव सभ्यता है, उसे सिन्धु-सरस्वती सभ्यता भी कहते हैं। वह सिन्धु नदी पाकिस्तान के प्रमुख प्रान्त सिंध प्रान्त के बीचोबीच बहती है। इतिहास के सबसे पुराने हवा पानी से लबालब है सिंधी संस्कृति। इस संस्कृति का हर आयाम विशिष्ट है। रहन-सहन, भाषा, लिपि, कला, खान-पान, संगीत, नृत्य, सभी कुछ आज भी जीवंत हैं। हालांकि यह जीवन्तता सिन्धी लोगों की की जीवटता का द्योतक है क्योंकि समय की चुनौतियां कभी कुछ कम नहीं रहीं। विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा। तकरीबन बारह लाख से ऊपर सिन्धी समाज को अपनी मातृभूमि को छोड़ने को विवश होना पड़ा, सन सैतालिस की वें सिसकियाँ आज भी सिन्धी साहित्य शिद्दत से संजोये हुए है।

साहित्य की विधा कहानी में लम्हें ठहरकर उतरते हैं। इस विधा का कैनवस बहुत बड़ा नहीं होता और बहुत छोटा भी नहीं होता; इसलिए कहानीकार के पास हर मुकम्मल एहसास के लिए पर्याप्त अवकाश होता है और भावोगाहन के लिए अधिक प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ती। किस्सागोई करीने से होती है, भावनाएं तरतीब से बरतीं जा सकती हैं। कहानीकार जमीन से जुड़ा होता है तो कुछ कहने के लिए जो शब्द वह चुनता है और जैसे चुनता है, साथ-साथ काफी कुछ बयां होता जाता है। उस काफी कुछ में उस संस्कृति के अनगिन झरोखे भी खुल जाते हैं जिसकी जमीन से वह कथा जुड़ी होती है। देवी नागरानी जी द्वारा संकलित एवं अनुवादित सिंधी कहानियों का संग्रह ‘अपने ही घर में’  एक व्यापक फलक वाला संग्रह है जिसमें उन्होंने अठारह सिन्धी कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया है एवं संपादन किया है। कथा संग्रह की कहानियों का चयन एक गहरी दृष्टि की मांग करता है। इस कथा संग्रह में लगभग हर वय के लेखकों की कहानियां हैं जिसमें सिन्धी समाज के अनगिन स्तर उकेरे गए हैं। अधिकांश कथाकार साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं और सभी का जन्मस्थान अविभाजित भारत का सिंध प्रान्त है। सभी कथाकार सिन्धी साहित्य में सक्रिय रचनाकार रहे हैं और कुछ तो हिंदी और अंग्रेजी भाषा में भी रचनायें करते रहे और कर रहे हैं। संकलन के कथाकारों में आधुनिक सिन्धी कहानियों की पहली पीढ़ी से लेकर समकालीन कथाकार तक शामिल हैं। संकलन की कहानियों का चयन एक इग्नोरेंट अथवा रिलक्टेंट पाठक को भी सिन्धी भावभूमि का संस्पर्श करवा पाने में सक्षम है। कहानियों का संपादन इतना सम्यक है कि पाठक के मन में भावनाएं क्रमशः आकार पाती हैं और तुष्ट होती रहती हैं। यकीनन देवी नागरानी जी का व्यापक अनुभवलोक इसमें उनकी मदद करता है।

इस कथा संग्रह की आयोजना बेहद संतुलित है। इसकी आयोजना अपने आप में यह रेखांकित कर देती है कि यह अनुवाद हिंदी के व्यापक पाठक समूह को ध्यान में रखकर की गयी है। संकलन के प्रारंभ में चार सुचिंतित आलेख हैं, जिसमे एक आलेख अनुवादिका का भी है। इन आलेखों के माध्यम से पाठक को अनुवाद, भाषा, कहानी, सिंधी समाज, हिंदी पाठक आदि के बारे में समीचीन व सम्यक जानकारी मिल जाती है। संकलन के पहले आलेख में डॉ. जगदीश लछाड़ी, कहानी को मानव जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम बताते हैं और इसकी मानव के विकास में सहायक उपस्थिति का भान करवाते हैं। जगदीश जी ने चयनित कहानियों एवं कथाकारों का का संक्षिप्त विवरण भी दिया है। दूसरे आलेख में उषाराजे सक्सेना ने अनुवाद की महत्ता के विभिन्न आयामों को चर्चा के केंद्र में रखा है। उषाराजे ने अनुवादिका की उचित प्रशंसा करते हुए कहा है कि वह स्वयं एक सशक्त कहानीकार हैं और वह अनुवाद में ट्रांस्लिटरेशन और इंटरप्रेटेशन का भी सहारा लेती हैं। अगले आलेख में डॉ. रमाकांत शर्मा  बताते हैं कि अनुवाद एक महीन काम है, अनुवाद को अनुवाद सरीखा लगना ही नहीं चाहिए, उसे पढ़ते समय मूल रचना की तरह महसूस होना चाहिए। आखिरी आलेख स्वयं अनुवादिका का है और यह इस अनुवाद-विमर्श में आवश्यक हस्तक्षेप है। अनुवादिका इन शब्दों में अनुवाद की कसौटी स्वयं के लिए चुन लेती हैं, जिसमें वह अंततः खरी भी उतरती हैं :
“जब एक भाषा से दूसरी भाषा में एक लेखक दूसरे लेखक की सोच, कथानक व कलात्मक अभिव्यक्ति को साकार स्वरूप देकर दूसरी भाषा में उतारकर उन्हें क्षमतापूर्ण यथार्थ के क़रीब ले आता है तो उसे अनुवाद कहा जाता हैl

इस आलेख में अनुवाद को वह एक सांस्कृतिक पुल की तरह देखती हैं जो विभिन्न लोगों को विभिन्न जीवन-शैलियों से रूबरू करवाता है। सिन्धी भाषा की उत्पत्ति वह संस्कृत से बताती हुई रेखांकित करना चाहती हैं कि माँ (संस्कृत) की सब बेटियों (भाषाएँ, जो संस्कृत से उपजीं) को आपस में संवाद करते रहना चाहिए, भले ही उनकी नियति भिन्न भिन्न हो। वह आगे स्पष्ट करती हैं कि जहाँ सिन्धी भाषा अपने शब्दों के धातुरूप के लिए संस्कृत पर निर्भर है, वहीं इसका उच्चारण पैटर्न अरबी, उर्दू, फ़ारसी से कहीं ज्यादा तकनीकी है। आगे की पंक्तियों में अनुवादिका सजग हैं अनुवाद की सीमाओं के बारे में भी और वह अंततः ‘स्वाभाविकता ’ को अनुवाद की परमावश्यक कसौटी कहती हैं तथा इसे ही अनुवाद की मौलिकता कहती हैं।

अनुवादिका के सजग संपादन ने यह जरुरी समझा कि संकलन के अंत में संकलित कथाकारों का संक्षिप्त परिचय भी दिया जाय। यह काफी उपयोगी है और कथाकारों की विशिष्टताएं उभर पायी है। पाठक के लिए यह तोषप्रद है कि उनके कथाकार व्यापक जीवन-अनुभवों वाले और सतत सक्रिय रचनाकार हैं।

संकलन की मुख्य भूमि की शुरुआत ‘माई-बाप ’ कहानी से होती है।  १९२१ में जन्में सुगन अहूजा ने कहानियां कम ही लिखी हैं, पर जितनी भी लिखी हैं, बेजोड़ लिखी हैं। मन के अनगिन उतार-चढ़ाव इनका रुचिकर विषय है। इस कहानी में भी भूख को लेकर क्षण-क्षण बदलते मनोभावों का सुक्ष्म विवरण है। ‘माई-बाप’ सरकार के लिए प्रयुक्त शब्द है। सरकार तो है, पर अन्न अब भी नहीं है। सरकार बस मुखिया की ही है, और अन्न का गोदाम मुखिया का। परम्पराओं का मन विधाता को ‘चीटी को कण और हाथी को मन देने वाला’ पुकारता है और रामू अब अन्न की फ़रियाद ऊपर आसमान से ही करता है। पर रोटी नसीब होती है उसकी बीवी गंगा को जो मुखिया के लड़के के पांव में मोच आ जाने की वज़ह से मालिश करने के लिए बुला ली जाती है और बदले में ‘जीवन-रस ’ मिल जाता है। रोटी पकाई जाती है, उतने से गोल चाँद में पूरा परिवार प्रकाश पा जाता है। यह पंक्ति कहीं बहुत भीतर तक भेद देती है जो रामू निवाले खाने के बाद सोचता है :
“दो दिन खाकर, दो हफ्ते और भी मौत का इंतजार किया जा सकता है। ”

परिवार की बुनियाद प्रेम से होती है और यह परवान चढ़ता है एक-दूसरे के लिए दी जाने वाली कुर्बानियों से। रामू अपनी बीवी को बची रोटियां खिलाता है और गंगा जो खाने के वक़्त ‘भूख नहीं है’ कह बाकी परिवार को खिलाने का संतोष मात्र चाहती है, सिसक पड़ती है। समझदार बेटा शामू, माई-बाप के आलिंगन को देख करवट बदल लेता है, और रो पड़ता है। इतनी बारीकी से बुनी गयी है यह कथा।

सिन्धी समाज की प्रख्यात पत्रिका ‘संगीता’ के संपादक आनंद टहलरामाणी जी प्रख्यात उपन्यासकार हैं। ‘बदनाम बस्ती ’ कहानी सामाजिक विभाजन को उकेरने वाली कथा है। उत्कट अंदाज में समाज का विकट दोमुंहापन बयां हुआ है, इस कहानी में। रेशमा उस बदनाम बस्ती की बंदी है जिसमे सभ्य शाही रास्ते से बाशिंदे आते तो हैं पर बस असभ्य मकसद से ही। समाज का रक्षक भी आता है। वर्दी वाला रेशमा को भी अबला समझता है पर रेशमा तो अपने बस्ती की बाकि औरतों को भी साहस देती रहती है। मुंहतोड़ जवाब देती है बस एक दिन फंस जाती है जब समाज के दोगलेपन से उसे धोखा मिलता है। खुद को बचा तो वह उस दिन भी लेती है पर सवाल जो मौजूं है वो यह कि-ऐसे ही रहा समाज तो कब तक बच पायेगी, रेशमा की आबरू?

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, ढाई सौ से भी अधिक कहानियों के प्रख्यात लेखक मोहन कल्पना  की कहानी ‘झलक, संकलन की तीसरी कहानी है। देश आजाद हुआ तुरत ही, पर बेरोजगारी से जार-जार युवा प्रेम कैसे निभाए? दरिद्रता, प्रेम की कसौटियां और भी तीखी कर देता है।  सर्दी की सर्द रात में पीपल तले नायिका, नायक के कोट की जेब में हाथ डालती है और पूछती है कि यह फटी क्यों है, नायक जवाब देता है –‘जैसी मेरी ज़िंदगी...’! नायक को फिर भी तसल्ली है कि नायिका साथ ना छोड़ेगी। प्रेमी प्रेम की कसौटी कसता है, कहता है- ‘ऊँचा रहना और गहरा सोचना चाहिए’, जबकि प्रेमिका तोषपूर्वक ‘सादा रहना चाहिए और ऊँचा सोचना चाहिए ’ का शांत-संयत जवाब देती है। कथाकार सफल हैं यह व्यक्त कर पाने में कि निश्छल प्रेम अभाव की मरुभूमि में भी हरी घास खोज ही लेता है। जिस नायक के पास अब पेन भी न बची हो, वह अपने आंसुओं की दो बूंदें पीपल के एक ठंडे पत्ते पर रख देना चाहता है, जो अमोल हैं; पर अभाव का संकोच है। यह अभाव का संकोच ही है कि पान की जगह वह किसी तरह लाये बिस्किट नहीं देना चाहता, हालाँकि जिसे पाकर भावप्रवण नायिका ने कहा-
“तुमने मुझे ये बिस्कुट देकर वो कुछ दिया है जो राजा हरिश्चंद्र ने ऋषि विश्वामित्र को भी नहीं दिया होगा।”

अगली कहानी ‘खंडहर’, गुनो सामताणी जी की है, जो पहली बार १९६८ में कूँज के ‘आजादी अंक’ में छपी थी। बेहद कम और बेहद उम्दा लिखते रहे गुनो जी। यह कहानी बहुत भीतर तक पालथी मारकर बैठ जाती है। हेमा बरसों बाद शंकर से मिलने आयी है। बरस ही नहीं बीते हैं, काफी कुछ बीता है। इतिहास विषय के दो विद्यार्थी। अब स्मृतियाँ ही इतिहास के पन्ने हैं। शंकर ने हेमा को तब हिमालय कहा था, सो हेमा ने हिमालय के शंकर को अपनाना चाहा था। पर अब जो है, वही सच है। इस पल का सच बहुत कुछ दूर का अलग सा है। इतिहास का प्रोफ़ेसर मलकानी प्यार पर कहता था :
It is not Aryan to love.

बहुमुखी साहित्यकार लखमी खिलाणी की कहानी ‘मै पत्थर नहीं बनना चाहती’ बेहद मार्मिक बन पड़ी है। रिसते रिश्ते की कहानियां मार्मिक तो होंगी ही। परिवार के भीतर पिता जुटा होता है, नेमतें जुटाने में और बेटी जुटी होती है ईज्जत संजोने में। परिवार में ईमानदार लाचार हो जाते हैं और लोभी सारे नाते बस स्वार्थ की आजमाइश में लगा देते हैं। अंततः बेटी पत्थर नहीं बनना चाहती, भले ही उसे कोई सांसारिक लाभ ना हो।
राष्ट्रपति से ‘बेस्ट टीचर अवार्ड ’ जीतने वाली इंदिरा वासवाणी की वही संजीदगी उनकी कहानी जुलूस में महसूस की जा सकती है। सियासत के फायदे गिनने की सनक में रिश्ते की अहमियत दांव पर रख दी जाती है। यह कहानी भीष्म साहनी की प्रसिद्ध कहानी चीफ की दावत की याद दिलाती है। यकीनन दोनों कहानियों में रिश्ते ताक पर रख दिए जाते हैं और दुनियादारी हाथ में ले ली जाती है।

कथाकार लाल पुष्प कहानियों में अपने अन्यान्य  प्रयोगों के लिए याद किये जाते हैं। विषयवस्तु का नयापन तुरत ही पाठक को अपने आगोश में ले लेता है। रिक्तता ही रिक्तता में एक अधूरापन, एक बेचैनी जो जमा होती जाती है भीतर और जब तब चेहरों से रिसती है, हर तरफ बिखरी पड़ी है। कथाकार समकालीन समय की बेतरतीबी बखूबी बयाँ करते हैं।

हरि हिमथाणी शास्त्रीय शैली के उम्दा कथाकार हैं। उनकी कहानी स्टीलकी थाली इस संकलन की सर्वाधिक मनोरंजक कहानी है। साधारण सी घटना का असाधारणपन सहसा उकेर देते हैं हरि जी। स्त्री मन की बारीक पड़ताल भी करते चलते हैं, साथ-साथ। फत्तू की अम्मा पहले तो मिरचू का गुणगान करती है, जब तक उसे फत्तू की शादी का आस है कि मिरचू करवाएगा शादी। पर जब वह थाली वाले की तरफदारी कर बैठता है तो उसे मिरचू तनिक भी नहीं भाता। फत्तू की अम्मा नयी थाली खरीदने में गजब मोल-तोल करती है। परिवार से इतर सामाजिक रिश्तों का भी मोल-तोल मानो वो कर लेना चाहती है। उसका पति पेरूमल उसे नुकसान का एहसास नहीं करवाना चाहता, वह जानता है कि असल फायदा ज़िन्दगी में क्या है और वह फत्तू की अम्मा को सीने से लगा लेता है।

गुरुदेव टैगोर के शान्तिनिकेतन से दीक्षित कृष्ण खटवाणी की कहानी ‘टूटी हुए जंजीरें’ संकलन की अगली कहानी है। यह एक वरिष्ठ साहित्यकार की परिपक्व दृष्टि वाली कथा है। नारी देहरी के भीतर ही रहे वरना पगड़ी उछल जावेगी। लड़की ने रिश्ते से इनकार किया तो परिजन नाराज और देखने को आये परिवार ने उसे बदचलन कहना शुरू किया। घर को सम्हालने के लिए दफ्तर जाना शुरू किया लड़की ने। शाम दफ्तर से आते उस लड़के से मुलाकात हो गयी और बस नारी ने प्रश्न कर लिया। पिता ने कहा इस्तीफ़ा लिख दो अब, दफ्तर तक मै दे आऊंगा। दहेज़ की जानलेवा मांग जैसे-तैसे पुरी करने को आतुर परिजनों के लिए यह जानलेवा था, लड़की ने साहस बटोरा था और बस बोल पड़ी थी :
“मुझे मंजूर नहीं, मुझे मंजूर नहीं यह रिश्ता ”

सिंध में बेहद लोकप्रिय रहीं रीटा शहाणी की कहानी विरोधाभास एक रोचक शैली में लिखी गयी यथार्थपरक कथा है। नारी बचपन से सबकी हिदायतें सुन-सुन थक गयी है। नारी ही क्यों सुने? पर पति की हिदायतें कैसे ना माने! एक शाश्वत विरोधाभास। पति स्वस्थ है, ख्याल रखता है। ज़िंदगी का एक विरोधाभास समक्ष आता है, स्वस्थ पति सहसा अपने बिस्तर पर मृत पाया जाता है। समाज को मुफ्त चुम्बकीय चिकित्सा की नेमतें बांटता उसका पति चुम्बक के गलत प्रयोग से खुद ही मारा जाता है। एक सशक्त विरोधाभास! जागरूकता और उचित शिक्षा इस कहानी के पाठ हैं।

खिमन मूलाणी ग़ज़लगो के साथ-साथ एक प्रसिद्ध कहानीकार एवं प्रभावी अनुवादक भी हैं। विश्वप्रसिद्ध ‘गीतांजली ’ का भी इन्होने अनुवाद किया है। इस संकलन की एक बेहद महत्वपूर्ण कहानी प्रतीक्षा इनकी लिखी है। सन सैतालिस के विभाजन का सतत दंश बयाँ है इस कहानी में। यह दंश रोज का है। केवल विभाजन भूगोल का हुआ हो तब तो सहनीय भी हो, पर यह विभाजन तो संस्कृति और परम्परों का भी था। तभी तो विभाजन के बाद केवल अस्तित्व का संकट नहीं था, अपितु अस्मिता की इयत्ता का संकट भी था। बड़े काका आज उदास थे, कितना कुछ पाया भी था ज़िंदगी में पर कितना अधिक गंवा भी दिया था। विभाजन के बाद हर सिन्धी का दर्द था यह-माटी गंवाने का दर्द। सिन्धु नदी की गोद गँवा देने का दर्द। इसीलिये तो मरने के बाद ही सही सिन्धु माँ की लहरों में समाने का आस जोह रहे थे सूरजमल काका।

सिन्धी कहानीकारों में ईश्वरचंद्र नयी पीढ़ी के चमकते सितारे कथाकार रहे। उनकी कहानी अपने ही घर में एक बेहद संवेदनशील कहानी है। अनुवादिका ने इसी कहानी के शीर्षक को समूचे संकलन का शीर्षक दिया है। यह एक प्रतीकात्मक तथ्य है। संभवतः अनुवादिका ने  इस कहानी की नायिका वसुधा की स्थिति को सिन्धी भाषा और सिन्धी लोगों की विभाजन के बाद की स्थिति से जोड़कर देखा है। ससुराल से अरसे बाद मायके लौटती वसुधा को पहले तो अपने पिता का ही व्यवहार रुखा-सूखा मालूम पड़ा। शहर भी कुछ बदला सा लगा। पर घर अपने उन पुराने दीवारों के भीतर कुछ बदला सा नहीं लगा। वही चीजें उन्हीं जगहों पर उसी तरहा। पड़ोस की चाची चहकते हुए आती हैं और शिकायत करती हैं कि वसुधा बड़े दिनों बाद क्यूँ आयी! माँ शिकायत करती है कि चिट्ठियां क्यों नहीं लिखती बराबर। बहन की शादी के लिए घर-वर देखा जा रहा हैं या नहीं, यह पूछने पर माँ कह ही पड़ी, कि उसी शादी के कर्ज अभी ख़तम नहीं हुए हैं। सहसा उसकी सहेली आती हैं, जो अब भी अविवाहित है, एक ही श्वांस में इंग्लिश में सब पूछ निकल जाती है। माँ, उसके बदलावों की वज़ह बताती है। सहेलियों से मिलकर वसुधा जब वापस घर आती है, घर में अजब सन्नाटा पसरा पाती है। वज़ह जानकार वही सन्नाटा उसमे पसर जाता है।

बकिट लिस्ट एक दार्शनिक पृष्ठभूमि की कहानी है। कथाकार बंसी खूबचंदाणी हॉलीवुड मूवी बकिट लिस्ट अपने जल्द ही रिटायर हो रहे कथानायक को दिखलाते हैं। और फिर दो दर्शनों में खींचतान शुरू हो जाती है। यकीनन बकिट लिस्ट एक शानदार फिल्म है, किन्तु उसका सार जीवन के पलों को अधिकाधिक जीने में ही है, वो भी मनचाहे पलों की वृद्धि करके ही। पाश्चात्य दर्शन ईच्छाओं का लिस्ट बनाकर उन्हें एक-एककर जीने का मकसद पैदा करती है। भारतीय दर्शन कथानायक के समक्ष आता है जब वह अपनी बकिट लिस्ट बनाने के बाद डायरी का एक पन्ना पलटता है और उसे वहां पहले से ही लिखा एक फार्मूला मिलता है। जिसका सार यों है :
“इस तरह अगर हम अपनी इच्छाएं बढ़ाएंगे और वे पूरी न होंगी तो हमारी खुशी की मात्रा घटती रहेगी।”

पोपटी हीरानंदाणी सिन्धी की जानी-मानी साहित्यकार थीं। सिन्धी की प्रोफ़ेसर थीं और साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत बेखटक लेखिका थीं। इन्हें सिन्धी का मंटो कहना गलत नहीं होगा। बकौल डॉ. जगदीश लछाड़ी वह बेधड़क भी थीं और उनमें लिखने का शऊर भी था। पोपटी जी की कहानी अब तो वह कुछ भी न थी में लेखिका ने दर्शाया है कि औरतों को महज भोगने का सामान समझने वाला समाज बस गालियां ही नवाजता है जब एक औरत के दामन से जवानी छूंटने लग जाती है। प्रेम में भी आत्मसम्मान का सौदा भारी पड़ सकता है। लिज उसी की कीमत चुकाती है। उसका प्रेमी उसे छोड़ देता है, तबसे उसका हर डेरा अस्थायी हो जाता है।
“जवानी और सौंदर्य देकर, उसके बदले में मुनाफ़ा लेकर एलिज़बेथ हंसती रही और जीती रही।”

पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार एवं समालोचक मोतीलाल जोतवाणी की कहानी  लेन-देन समाज में व्याप्त सियासत का विद्रूप चेहरा समक्ष रखती है। संपादक लाल बल्ब की आड़ में है, रिपोर्टर प्रतीक्षा में। मीडिया में आपसी मार-काट है, नेताजी इसका फायदा उठा रहे। यह एक नेक्सस बन पड़ा है जिसके सभी फिलहाल अभ्यस्त हैं, बस जनता बेहाल रहने को अभिशप्त है।

कैंसर सहसा सब कुछ ख़तम कर देता है। छाया भी नहीं बचती। ना ही बचते हैं उसके अरमान। थकी हुई मुस्कान के लेखक हरिकांत जेठवाणी एक बेहद मर्मस्पर्शी कथा कहते हैं। छाया को पता है, बचना नहीं है, पर नायक को पाकर खिलखिला उठती है। जिजीविषा कितनी अदम्य होती है। शायद जितना जीवन नहीं डरता होगा मृत्यु से उससे कहीं अधिक मृत्यु जद्दोजहद करती होगी जीवन से। छाया नायक से कहती है :
“तुम्हें पहाड़ अच्छे लगते हैं न? मैं दो-तीन जन्म लेकर किसी हिल स्टेशन पर पेड़ बन जाउंगी।  वहाँ तो आओगे न?’

अमर सिन्धी कहानी अदो अब्दुलरहमान के रचयिता अमरलाल हिंगोराणी आधुनिक सिन्धी कहानी के प्रवर्तकों में से थे। तीस के दशक की प्रारंभिक कहानियों में जो यथार्थ लबालब दिखता है, सुखद रूप से वही फिर से आज की सिन्धी कहानियों का मूल स्वर है। इस संकलन में अमरलाल जी की कहानी क़दीम की कृपा संकलित की गयी है। बड़े ही करीने से जिस नारी ने उम्र भर सभी परम्पराओं का निर्वहन किया है, वह सहसा अपनी बहु को आधुनिक होते देखकर नाराज नहीं होती। एक सामयिक समीक्षा का भाव है जो उसे नाराज होने से रोकता है। जीवन पल दो पल जीने का है। समय ही सब कुछ है पर जब लोग बिछड़ जाते हैं तो यही समय पहाड़ हो जाता है। लाल की माँ अब आबशार नहीं बहाना चाहती।

संकलन की अंतिम कहानी मुक्ति है। तीर्थ चाँदवाणी की यह कहानी सूक्ष्म मनोविश्लेषण वाली भावभूमि पर आगे बढ़ती है। पति-पत्नी ज़िंदगी की जद्दोजहद साथ-साथ पार कर रहे हैं। पति को कर्ज लेना पड़ता है। लेनदार घर आता है, भले कुछ कहता नहीं। नायक के मन में अनगिन तूफ़ान निकल पड़ते हैं। हो न हो यह उसकी खूबसूरत बीबी की संगत के लिये आया है। उसकी चाय की मांग पर वह दूध लाने जाता है। रास्ते में और भी तूफ़ान उसके मन में आते हैं। घर वापस आते-आते मन का तूफ़ान एक तार्किक परिणति पर पहुंच चूका होता है।

बेहतरीन कहानियों का यह एक बेहतरीन संकलन है। अनुभवी अनुवादक देवी नागरानी जी के कुशल संपादन का इसपर सांगोपांग प्रभाव है। एक अनुवादक के तौर पर नागरानी जी एक बार फिर बेहद सफल हुई हैं। ना केवल वे अपनी कसौटियों पर खरी उतरी हैं अपितु ट्रांस्लेतोलोजी के विभिन्न सिद्धांतों के निर्वहन की दृष्टि से भी उनका यह सुप्रयास अतुलनीय एवं सिन्धी साहित्य की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्त्व का है। अनुवाद में आपने इक्वीवैलेंस को भी साधा है और इंटरप्रेटेशन को भी। जब-तब सांस्कृतिक अनुवाद को आपने वरीयता दी है और स्कोपोज थ्योरी भी आपसे अछूती नहीं रही है। कुल मिलाकर अनुवादित साहित्य की श्रेणी में यह एक अनुपम उपलब्धि है जो हिंदी साहित्य को भी उतना ही समृद्ध करता है जितना कि सिन्धी साहित्य को।

इस संकलन में जहां स्त्री-पुरुष सम्बन्ध को सर्वाधिक वरीयता दी गयी है वहीँ, मानव जीवन के कुछ अन्य आयाम अछूते ही रहे। बच्चे कहानियों से लगभग अनुपस्थित रहे। समसामयिक दबावों में बस बेरोजगारी और गरीबी ही केंद्र में रही। भाषा को लेकर विमर्श नदारद है इन कहानियों में। एक बड़ी कमी जो मुझे जब तब अखरी वह यह कि इसमें एक भी कथाकार ऐसा नहीं है जिसका जन्म सिंध के बाहर हुआ हो, जो वर्तमान काल का सक्रिय युवा सिन्धी साहित्यकार हो, जिसने विभाजन के बाद जन्म लिया हो। इस वज़ह से ही संभवतः समसामयिक मुद्दे इस संकलन में अपनी जगह नहीं बना सके हैं। सिन्धी युवा पुरे विश्व में अपनी जड़ें बना रहा है, उसकी वह जद्दोजहद भी यदि संकलन में दर्ज होती तो तोषप्रद होता। संकलित कथाकारों का एक मोटा विभाजन सैतालिस का विभाजन ही है। इसमें विभाजन के तुरत पूर्व और विभाजन पश्चात् के तुरत बाद के सभी स्तरीय कथाकारों को स्थान मिला है। किन्तु आश्चर्य कि विभाजन और विस्थापन जैसी बड़ी त्रासदी पर बस एक ही कहानी को स्थान मिल पाया है संकलन में।


अनुवाद का काम बारीकी का है। बिना मिशनभाव के तो यह असंभव ही है। देवी नागरानी जी ने सश्रम यह तोष सतत कमाया है। उनका यह संकलन उन्हें सिन्धी अनुवाद के साहित्यिक इतिहास में उनके योगदानों को सर्वदा के लिए स्मरण रखेगा। एक जो अद्भुत बात रेखांकित की जा सकती है इस महत्वपूर्ण कथा-संकलन के अनुवाद में वह यह है कि नागरानी जी ने सिन्धी-हिंदी शब्दों का सहज प्रयोग किया है जिससे दोनों भाषाओँ में शब्द अपनी जगह बनायेंगे और भाषा पुल होने का अपना गुरुतर दायित्व निभाती रहेगी। शब्दों के पुल जब साझे होंगे, तो धीरे धीरे ही सही समुदायों की साझेदारियां भी खिलेंगी!